मुख्यपृष्ठनमस्ते सामनापाठकों की रचनाएं : आत्मा का घर

पाठकों की रचनाएं : आत्मा का घर

जिस तरह शरीर का घर चार- दिवारी का मकान है।
उसी तरह आत्मा का भी घर है, और वह है- `ह्दय’।
मकान की साफ-सफाई तो करते हैं,लेकिन ह्दय की तरफ देखते भी नहीं हैं।
सर्वप्रथम हृदय को रोशन करना है- अंतर्दीप जलाकर।
जिससे सब स्पष्ट दिखाई देगा कि-कई प्रकार के जालें बिछे हुए हैं जैसे बेकार की आदतें-विचार, अंधविश्वास के जालें।
और क्रोध-ईर्ष्या, द्वेष-नफरत की गंदगी। तथा काम-वासना, लोभ-लालच, मोह-माया रुपी कूड़ा-करकट जमा हो रखा है।
अर्थात आत्मा का घर चारों ओर से मैला-कुचैला हो रखा है। इसलिए हमारी आत्मा परेशान, दुखी और व्याकुल है।
तो मित्रों। आओ हम सभी इस घर की साफ-सफाई करें, कैसे?
ज्ञान के साबुन से, सेवा के पानी से और सत्संग की झाडू से अच्छी तरह सफाई करने का प्रयास करें।
प्रेम-प्यार और आनंद के रंग से रंगाई करें।
इससे स्वच्छ वातावरण निर्माण होगा और जीवन सुखमय, खुशहाल होगा।
आर.डी. अग्रवाल `प्रेमी’, मुंबई

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