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पाठकों की रचनाएं : मुझे तलाश है

मुझे तलाश है उस `ज्ञान’ की
जो मुझे इंसानियत से जोड़ दे।
मुझे तलाश है उस `बहार’ की
जो `खिजा’ को `फिजा’ की ओर मोड़ दे।
मुझे तलाश है उस `अंबर’ की
जो तप रही धरती पर बरखा कर दे।
मुझे तलाश है उन हाथों की
जो बेसहारों का `सहारा’ बन साथ दे।
मुझे तलाश है उस `बरगद’ की
जो `मुश्किल की धूप’ में, `राहत की छांव’ कर दे।
मुझे तलाश है उस `मुबारक वक्त’ की
जो खुश्क आंखों में `उम्मीद’ भर दे…
जाने कब पूरी होगी ये `मेरी तलाश’
जो मुझे, मेरे मकसद की ओर मोड़ दे
टूट रही `आस’ को फिर से जोड़ दें।
-नैंसी कौर, नई दिल्ली

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