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पाठकों की रचनाएं : भारतवासी

भारतवासी
कोई मनाए ईद तो कई दीवाली
कोई मनाए बैसाखी, क्रिसमस
तो कोई नवरोज हम सबकी
खाक एक है सब है भारतवासी।
कोई गाए भजन तो कोई गुरुबानी
कोई करे प्रार्थना तो किसी की अजान
का स्वर गूंजे आकाश में
हम सबकी खाक एक है
सब हैं भारतवासी।
कोई खाए पूरियां ईद वाली
और कोई पूरनपोली कोई नाचे
गणपति में तो कोई लोहड़ी में
हम सबकी खाक एक है
सब हैं भारतवासी।
किसी का भरे कुंभ मेला
किसी की फेयर तो किसी का उर्स
हम सबकी खाक एक है
सब हैं भारतवासी।
किसी का भरे कुंभ मेला
किसी की फेयर
तो किसी का उर्स
हम सबकी खाक एक है
सब हैं भारतवासी।
जब कभी सीमा पर वीर शहीद हुआ
सबकी रूह कांप उठी मन में आक्रोश
उठा और सबकी आंखों में पानी
हम सबकी खाक एक है
सब हैं भारतवासी।
-स्वरूपरानी, पाटिल

बचपन की बारिश
खिड़की से जब देखा मैने
मौसम की पहली बरसात को,
काले बादल के गरज पर
नाचती बूंदों की बारात को।
एक बच्चा मुझसे निकालकर
भागा था भीगने बाहर,
रोका बड़प्पन ने मेरे
पकड़ के उसके हाथ को।
मेरे बचपने के बीच एक
उम्र की दीवार खड़ी हो गई,
लगता है मेरे बचपन की
बारिश भी बड़ी हो गई।
वो बूंदें कांच की दीवार,
पर खटखटा रही थी
मैं उनके संग खेलता था।
कभी इसीलिए बुला रही थी
पर तब मैं छोटा था और,
यह बातें बड़ी थी।
तब घर वक्त पर
पहुंचने की किसे पड़ी थी,
अब बारिश पहले राहत
फिर आफत बन जाती है।
जो गरज पहले लुभाती थी
वही अब डराती है,
मैं डरपोक हो गया और
सावन की झड़ी हो गई।
लगता है मेरे बचपन की
बारिश भी बड़ी हो गई।
जिस पानी में छपाके लगाते
उसमे कीटाणु दिखने लगा,
खुद से ज्याद फिक्र की
लॅपटॉप भीगने लगा।
स्कूल में दुआ करते की
बरसे बेहिसाब छुट्टी हो जाए,
भीगें तो डरें कि कल कहीं
ऑफिस की छुट्टी न हो जाए।
लगता है मेरे बचपन की
बारिश भी बड़ी हो गई।
-अभिनव नागर

आंचल लहराया
मौसम की पहली बारिश
जब तेरा आंचल लहराया
सारी दुनिया चहक उठी
बूंदों की सरगोशी तो
सोंधी मिट्टी महक उठी
रौनक तुझसे बाजारों में।
चहल पहल है गलियों में
फूलों में मुस्कान है तुझसे
और तबस्सुम कलियों में
पेड़-परिंदें, सड़कें, राही
गर्मी से बेहाल थे कल
सबके ऊपर मेहरबान हैं।
आज घटाएं और बादल
आंगन के पानी में मिलकर
बच्चे नाव चलाते हैं
छत से पानी टपक रहा है
फिर भी सब मुस्काते हैं।
सरक गया रात का घूंघट
चांद अचानक मुस्काया
उस पल हमदम तेरा चेहरा
याद बहुत हमको आया।
-देवमणि पांडे

दिशाएं खो गईं!
दिशाएं खो गईं तम में
धरा का व्योम से चुपचाप आलिंगन
धरा ऐसी कि जिसने नव
सितारों से जड़ित साड़ी उतारी है।
सिहर कर गौर-वर्णी स्वस्थ
बाहें गोद में आने पसारी हैं
समाई जा रही बनकर
सुहागिन और बेसुध तन।
लहरों के उठे शीतल
अजाना मन मचलता है
चतुर्दिक घुल रहा उन्माद
छवि पर छा रही सरलता है।
खिंचे जाते हृदय के तार
स्वर्ग-सम अविराम आकर्षण
बुझाने छटपटाती प्यास
युग-युग का अनमोल संगम।
जलद नभ से विरह-ज्वाला
बुझाने को सघन झरे झमझम
निरंतर बह रहा है स्रोत
जीवन का उमड़ता है यौवन।
-महेंद्र भटनागर

पानी आया-पानी आया
गरज रहे बादल घनघोर
ठमक-ठमक कर नाचे मोर
पी-पी रटने लगा पपीहा
झन-झन-झन झींगुर का शोर
दूर कहीं मेंढक टर्राया
पानी आया-पानी आया।
रिमझिम-रिमझिम बूंदें आईं
खुशियों की सौगातें लाईं
पेड़ों के पत्तों ने भर-भर
झूम-झूमकर तालियां बजाईं
गर्मी का हो गया सफाया
पानी आया-पानी आया।
भीग रहे कुछ छाता ताने
रानू-मोनू लगे नहाने
छप-छप-छप करते फिरते
सपने जैसे हुए सयाने
बच्चों का मन है हर्षाया।
-अंशिका कुमारी,आजमगढ़

दुनियां में ऐसा मंजर क्यों है?
मेरे मालिक तेरी दुनियां में ऐसा मंजर क्यों है
कहीं लहलहाते खेत तो कहीं बंजर क्यों है।
कोई खामोश इस कदर है अपनी सफाई में
तो कोई लगता इल्जाम मुसलसल क्यों है।
जब हर बंदे की किस्मत तूने ही लिखी है
तो फिर कहीं मोती तो कही कंकर क्यों है।
इक सुकून की तलाश में भटकते हैं सभी
आखिर दर्द का दरिया सबके अंदर क्यों है।
नहीं हासिल कुछ भी अपनी चाहतों से
जब लगे प्यास फिर दूर समंदर क्यों है।
जब दोनों को बनाया तूने एक ही पानी से
फिर झील मीठी और खारा समंदर क्यों है।
इंसान सभी एक जैसे रंग लहू का लाल सबके
फिर हर एक की फितरत में इतना अंतर क्यों है।
-प्रज्ञा पांडेय ‘मनु’, वापी

हरियाली लहलहाती!
देखो वर्षा के ये मनमोहक बादल,
जो लाते है बारिश का यह जल।
देख मन इन्हें होता प्रफुल्लित,
वर्षा न होती तो हो जाता विचलित।
किसानों को यह देती सिंचाई की सुविधा,
यदि वर्षा न होती तो हो जाती बड़ी दुविधा।
इस ऋतु में चारों ओर हरियाली लहलहाती,
इसकी मनोरम छंटा सबके मन को भाती।
वर्षा ऋतु की यह छंटा निराली,
सबके लिए लाती खुशियों की झोली।
आओ संग मिलकर झूमे गाएं,
वर्षा ऋतु का मिलकर लुप्त उठाए।
-कौशल ‘कौर’

मेघ आए
मेघ आए बड़े बन-ठन के, संवर के।
आगे-आगे नाचती–गाती बयार चली
दरवाजे-खिड़कियां खुलने लगी गली-गली
पवन ज्यों आए हो गेंव में शहर के।
पेड़ झुक झांकने लगे गरदन उचकाए
आंधी चली, धूल भागी घाघरा उठाए।
चितवन उठी नदी, ठिठकी, घूंघट सरके
बूढ़े पीपल ने आगे बढ़कर जुहार की
‘बरस बाद सुधि लीन्ही’।
बोली अकुलाई लता ओट हो किवार की
हरसाया ताल लाया पानी परात भर के
क्षितिज अटारी गदराई दामिनि दमकी
क्षमा करो गांठ खुल गई अब भरम की
बांध टूटा झर-झर मिलन अश्रु ढरके
मेघ आए बड़े बन-ठन के, संवर के।
-अमरनाथ, कल्याण

वर्षा ऋतु का आनंद उठाए!
देखो एक बार फिर से बारिश का मौसम आया,
अपने साथ सबके चेहरों पर मुस्कान है लाया।
देखो वर्षा में हवा कैसी चल रही मंद-मंद,
क्या बच्चे क्या बूढ़े सब लेते इसका आनंद।
देखो चारो ओर फैली यह अद्भुत हरियाली,
जिसकी मनमोहक छटा है सबसे निराली।
जिसको देखो वह इस मौसम में गुनगुनाता,
बारिश का मौसम ऐसा जो सबके मन को भाता।
मेरे मित्रों तुम भी बाहर निकलो लो वर्षा का आनंद,
देखो इस मनमोहक वर्षा को जो नहीं हो रही बंद।
छोटे बच्चे कागज की नाव बनाकर पानी में दौड़ाते है,
वर्षा ऋतु में ऐसे नजारे नित्य दिल को बहलाते है।
तो आओ हम सब संग मिलकर झूमे गाए,
इस मनभावी वर्षा ऋतु का आनंद उठाए।
-अजय कुमार मिश्र

 

 

 

 

 

 

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