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पाठकों की रचनाएं : काशी ही मधुवन

  • काशी ही मधुवन हो जाए
    विश्वनाथ धड़कन हो जाए,
    नयनों में उज्जैन बसे तो
    संयासी ये मन हो जाए।
    सोमनाथ का करें स्मरण
    मल्लिकार्जुन तन हो जाए,
    ममलेश्वर का ध्यान करें
    वैद्यनाथ आंगन हो जाए
    भीमाशंकर के दर्शन हों
    नागेश्वर तपवन हो जाए।
    त्र्यंंबकेश्वर हो नयनों में
    घुश्मेश्वर अंजन बन जाए
    रामेश्वर में राम मिलें तो
    रज केदारवन की बन जाएं।
    -प्रज्ञा पांडेय, वापी
  • अभिलाषा!
    देश हमारा उन्नति करे, नित रचे नए आयाम
    सभी सुखी संपन्न हों, समृद्धि हो अविराम।
    रहें सुरक्षित देशवासी, विपत्ति कभी न आए
    भूकंप, सुनामी,चक्रवात, संक्रामक रोग न छाए।
    शिक्षा,तकनीक के क्षेत्र में,दुनियां में हों सबसे आगे
    विश्व गुरु की परंपरा, फिर से बढ़े विरासत आगे।
    माहौल हो सुख शांति का, अशांति हो कोसों दूर
    सभी को रोटी, कपड़ा, मकान, खुशियां हो भरपूर।
    उर्वरा शक्ति बढ़े खेतों की, भरी रहे हरियाली
    बेरोजगार युवा न हों, चारों ओर छाए खुशहाली।
    नदियां जलयुक्त रहें, सिंचन क्षमता का हो विकास
    खाद्यान्न की कमी न हो, हिंसा का हो विनाश।
    हिंदी भाषा का गौरव बढ़े, खेलों में बढ़े मान
    भारत की कीर्ति बढ़े, हो विश्व में इसका गुणगान।
    रामराज्य सी प्रजा सुखी हो, रहे प्राणियों में सद्भावना
    देश अनुकरण करे हमारा, समृद्ध हो विश्वबंधुत्व भावना।
    -चंद्रकांत पांडेय, मुंबई
  • लगाव दिख रहा है!
    बेशक तेरी जिंदगी में आज बदलाव दिख रहा हैं
    तेरी बातों में आज भी एक घाव दिख रहा है
    लाख दावे कर रहे हो तुम उसे भुला देने के
    तेरी आंखों में उसके लिए लगाव दिख रहा हैं
    सच जानती है दुनिया फिर भी छुपा रहे हो
    जाने किसका ये तुम पर दबाव दिख रहा है
    कहते हो कि खुश हो बगैर उसके जिंदगी में
    ये चेहरे पर तुम्हारे कैसा तनाव दिख रहा है।
    जिंदगी में भी वो लम्हा आएगा
    अजीब सी कशमकश है जिंदगी की
    आज क्या है और कल क्या हो जाएगी
    एक पल में बदल जाती है जिंदगी यहां
    जो है राहें वो कल कहां नजर आएगी।
    धुंधला-धुंधला सा है शमा आज यहां
    जो लम्हा है संग वो भी गुजर जाएगा
    पर थोड़ी उम्मीद तो अभी बाकी है
    ये जीवन मेरा भी संभल जाएगा
    कोई तो होगा मेरा भी जीवन में
    जो यहां मेरा सिर्फ मेरा कहलाएगा
    सहारा बनेगा मेरा वो इस जीवन में
    मेरी जिंदगी में भी वो लम्हा आएगा।
    -रूबी कुमारी
  • जिंदगी थमी सी हैं
    माना इक कमी सी है जिंदगी थमीं सी हैं
    जो छूट गया उसका क्या मलाल करें
    जो हासिल है चल उससे ही सवाल करें
    बहुत दूर तक जाते है यादों के काफिले
    फिर क्यों पुरानी यादों में सुबह से शाम करें
    माना इक कमी सी है जिंदगी थमीं सी हैं।
    क्यों दिल की धड़कनों को दर-किनार करें
    मिल ही जाएगा जीने का कोई नया बहाना
    जरा इत्मीनान से किसी खास का इंतजार करें
    जिंदगी के लिए एक खास सलीका रखना
    अपनी उम्मीद को हर हाल में जिंदा रखना
    उसने हर बार अंधेरे में जलाया खुद को
    उसकी आदत थी सरे-राह उजाला रखना
    आप क्या समझेंगे परराज किसे कहते हैं।
    आपका शौक है पिंजरे में परिंदा रखना
    बंद कमरे में बदल जाओगे एक दिन तुम
    मेरी मानो तो खुला कोई दरवाजा रखना
    क्या पता राख में जिंदा हो कोई चिंगारी
    जल्दबाजी में कभी पांव न अपना रखना
    वक्त अच्छा हो तो बन जाते हैं साथी लेकिन
    वक्त मुश्किल हो तो बस खुद पर भरोसा रखना।
    -हरि भाऊ ‘हरि’ लखनऊ
  • मंजिल!
    मंजिल पर जल्दी पहुंचने की कोशिश न कर
    तू जिंदगी को जी
    उसे समझने की कोशिश न कर
    सुंदर सपनों के ताने-बाने बुन
    उसमे उलझन की कोशिश न कर।
    चलते वक्त के साथ तू भी चल
    उसमें सिमटने की कोशिश न कर
    अपने हाथों को फैला  खुल कर सांस ले
    अंदर ही अंदर घुटने की कोशिश न कर
    मन में चल रहे युद्ध को विराम दे
    खुद से लड़ने की कोशिश न कर
    कुछ बातें भगवान पर छोड़ दे
    सब कुछ सुलझाने की कोशिश न कर।
    जो मिल गया उसी में खुश रह
    सूकून छीन ले वो पाने कोशिश न कर
    रास्ते की सुंदरता का लुफ्त उठा
    मंजिल पर जल्दी पहुंचने की कोशिश न कर।
    -अंकुर कुमार ‘पतझड़’
  • तन्हाई में बातें करती हैं तस्वीरें
    तन्हाई में तस्वीरें भी बातें करती हैं
    स्वीरों से निकलकर बातें करती हैं यादें
    लम्हें फर्सत के कहां नसीब हुए मुझे?
    तुम्हारी याद आती है दूर से आती हुई
    अजान की आलाप के साथ
    तो कभी मंदिरों में बजनेवाले
    मधुर घंटनाद के साथ
    वजूद पर छाए हो ऐऐ
    महकते हुए लोबान का धुआं जैसे
    मत पूछो तुुम्हारे बगैर
    तन्हाई में कैसे निकाली रातें?
    कितना भी भुलाने की कोशिश करूं
    फिर भी याद आती हैं यादे
    अब जिंदगी जीने का सीख लिया है मैंने
    एक छोटा-सा उसूल, अच्छा याद रखूं
    और बुरा भुलाने की हमेशा कोशिश करूं
    फिर भी अल्पविराम छोड़ देती है जिंदगी
    -स्वरूपरानी, पाटील
  • नाव भी जरूरी
    जिंदगी सीधे-साधे चलना ठीक नहीं
    उबड़-खाबड़ पड़ाव भी जरूरी है
    तैरते-तैरते बाजू थक जाएंगे
    एक पल के लिए नाव भी जरूरी है।
    बदलाव भी जरूरी घाव भी जरूरी है
    धूप अच्छी थोड़ी छांव भी जरूरी है
    हद-ए-शहर से निकली गांव-गांव चली
    कुछ यादें मेरे संग पांव-पांव चली।
    सफर जो धूप का किया तो तजुर्बा हुआ
    वो जिंदगी ही क्या जो छांव-छांव चली।
    -चंदन कुमार, मुंबई
  • जब तक चलेगी जिंदगी
    जब तक चलेगी जिंदगी की सांसें
    कहीं प्यार कहीं टकराव मिलेगा
    कहीं बनेंगे संबंध अंतर्मन से तो
    कहीं आत्मीयता का अभाव मिलेगा।
    कहीं मिलेगी जिंदगी में प्रशंसा तो
    कहीं नाराजगियों का बहाव मिलेगा
    कहीं मिलेगी सच्चे मन से दुआ तो
    कहीं भावनाओं में दुर्भाव मिलेगा।
    कहीं बनेंगे पराए रिश्तें भी अपने तो
    कहीं अपनों से ही खिंचाव मिलेगा
    कहीं होगी खुशामदें चेहरे पर तो
    कहीं पीठ पर बुराई का घाव मिलेगा।
    तू चलाचल राही अपने कर्मपथ पर
    जैसा तेरा भाव वैसा प्रभाव मिलेगा
    रख स्वभाव में शुद्धता का ‘स्पर्श’ तू
    अवश्य जिंदगी का पड़ाव मिलेगा।
    -विमलेश कुमार ‘विमल
  • एक झलक जिंदगी
    कल एक झलक जिंदगी को देखा
    वो राहों पे मेरी गुनगुना रही थी
    फिर ढूंढा उसे इधर-उधर
    वो आंख मिचौली कर मुस्कुरा रही थी।
    एक अरसे के बाद आया मुझे क़रार
    वो सहला के मुझे सुला रही थी
    हम दोनों क्यूं खफा हैं एक-दूसरे से
    मैं उसे और वो मुझे समझा रही थी।
    मैंने पूछ लिया क्यों इतना दर्द दिया
    कमबख्त तूने,
    वो हंसी और बोली मैं जिंदगी हूं पगले
    तुझे जीना सिखा रही थी।
    -रामनाथ ‘राम’ आजमगढ़
  • खुद में पहले इंसान ढूंढें
    खुद में पहले इंसान ढूंढें
    अब कौन रोज-रोज खुदा ढूंढें
    जिसको न मिले वही ढूंढें
    रात आई है सुबह भी होगी
    आधी रात में कौन सुबह ढूंढें।
    जिंदगी है जी खोल कर जियो
    रोज-रोज क्यों जीने की वजह ढूंढें चलते फिरते पत्थरों के शहर में
    पत्थर खुद पत्थरों में भगवान ढूंढें
    धरती को जन्नत बनाना है अगर
    हर शख्स खुद में पहले इंसान ढूंढें।
    -सावित्री देवी

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