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पाठकों की रचनाएं : मां ने मुझे जन्म दिया

पाठकों की रचनाएं : मां ने मुझे जन्म दिया
मां ने मुझे जन्म दिया जीवन के सुपुर्द कर दिया
पिता ने शब्द दिए और सड़क पर छोड़कर
आकाश की तरफ देखने लगे
मैंने अपने को कविता के हवाले किया
पिता आकाश में क्या ढूंढ़ रहे सोचते
हवा की सीढ़ी पर चढ़ने लगे कानों में आवाज आई
मां की थी धरती पर धरती पर ढूंढ़ों
दु:ख की जड़ें यहीं हैं जिससे घबराए बाप तुम्हारे
ताकते हैं आसमान तो उतरने लगा नीचे
दरारों और पत्थरों वाली धरती पर पांव रखते ही
सुना मैंने सीढ़ी मत गिरना सीढ़ी मत गिरना
धरती ही की फुस-फुसाहट थी
जब मांस चढ़ जाएगा मेरी हड्डियों पर
गाने लग जाएंगी मेरी बेटियां
नहीं होंगे ये तंबू ये गुंबद जुल्म ज्यादती के
तब तक काम आएंगी ये सीढ़ियां
अपनी मां की दुनिया के आगे भी है नक्षत्रों की सुंदर दुनिया
अब मेरी दाढ़ी सफेद हो चुकी है मैं एक गंजा कवि
नाराज कुत्ते की तरह सूंघता-भौंकता रहता हूं
सांसत घर पुराने जैसे नहीं रहा
बहुत भव्य है और उतना ही पुख्ता
पर वैसी ही चीखें वैसी ही सिसकियां
अंधेरा पहले से भी तेज रोशनी में घना
कब से पन्ने चिपका रहा हूं पाट रहा हूं दरारें
सी रहा हूं उधड़ी हुई कथड़ी बीच-बीच में टोहता रहता हूं
कहीं खिसक तो नहीं गई वह सीढ़ी खड़ी है शान से अब भी
जैसे चुनौती देती प्रतीक्षा करती पर मैं तो नहीं
मैं वैâसे चढ़ पाऊंगा मुझसे नहीं हुआ कुछ भी
बीत गई आधी सदी नदी सूख गई बचपन की
अब तो उड़ती हुई रेत है और थकी हुई आंखें इतना ही।
-चंद्रकांत देवताले

झरोखे की आवाज
हर जिंदगी के अंदर है इक झरोखा
तुम अपना झरोखा खोलो
इक महक-सी आए
अगर तुम बंद कर दो
सुगंध न जाने कहां गुम हो जाए।
कानों के झरोखों को खोलें
हवा की सनसनाती संगीत सुनाई पड़े
पवन के हलके-हलके झोंके आए
मन के झरोखों को खोलें
इक आवाज-सी आए
तुम भी किसी से बतिया लो
कहीं अंतर्मुखी न बन जाए।
खुशी अपने झरोखे से देखकर आवाज दे
मुझे देखा कि नहीं देखा मुझे सुना कि नहीं सुना
खुशी जब रूठ जाए
अपने झरोखे भी बंद कर जाए।
छुपती जाए भागती जाए
कहीं मुझे देख न ले, कहीं मुझे सुन न ले
आंखों के झरोखों ने सुंदर सपने सजाए हैं
आंखों के झरोखे तो इंतजार भी कहलाए हैं
झरोखे पे बैठे हैं
झरोखे से अंदर आती बारिश की रिम-झिम बूंदें
तन-मन को छू के जाती बारिश की नन्हीं बूंदें।
– अन्नपूर्णा कौल (एम.फिल), नोएडा

हवा ही जैसी
हवा है जैसी भी सीने में भर रहे हैं हम,
हवा के बारे में कहने से डर रहे हैं हम।
कहा सरकार ने ये अहद-ए-मसाइल है,
लोग आराम करें फिकर कर रहे हैं हम।
जिक्र-ए-वादा कोई करने पर समझाते हैं,
शुक्रिया बोलिए वादा तो कर रहे हैं हम।
ध्यान मुद्दे पे खींचता हूं तो फरमाते हैं,
इसी मुद्दे पे कल से बहस कर रहे हैं हम।
समय तो लगता है इमदाद के पहुंचने में,
अभी हालात का शुमार कर रहे हैं हम।
वो रहम-दिल चला गया है गंगाजल लाने,
उससे नाहक कहा बे-आब मर रहे हैं हम।
आप क्या सोच-समझकर हैं मुकर्रर कहते,
मुझे माफ करिए शिकायत ही कर रहे हैं हम।
दिलासा दे रहे हैं समझदार वाले ‘गौतम’,
हादसा गुजरा है जो कवर कर रहे हैं हम।
-डॉ. कुंवर वीरेंद्र विक्रम सिंह ‘गौतम’

अमानत
अगर जिंदगी खुदा की बख्शी अमानत है
फिर इससे ये खयानत क्यूं है?
यदि ईश्वर निराकार प्रेम में है
तो फिर ये बगावत क्यूं है?
अगर नफरत और हथियार से ही
जीती जाती ये दुनिया
तो ये मोहब्बत और इबादत क्यूं है?
जिंदगी मिलती है तो चली जाती
चंद्रगुप्त, सिकंदर चले गए पर
मीरा जिंदा देखी जाती है।
यूं तो भगवान कुरुक्षेत्र में भी थे
किंतु देवघर में महाभारत नहीं
‘मानस’ रखी जाती है।
-कुमार ललित

जीवन की अभिलाषा
खुलेगी गांठ मन के साथ हो न
छूटेगा हृदय की धड़कन
चढ़ेगा आंखों पर प्यार का नशा
फिर खड़े होकर सहना होगा अपनापन।
आज प्राणों से हुआ हाथ धोना
क्या तुम मेरे साथ हो न
बातों–बातों में कुछ गांठ पड़ेगी
खंजर की तरह गड़ेगी कुंहलाएगी कली न।
पाना ही जीवन की बस एक अभिलाषा
खोना पड़े तो साथ तुम मेरे हो न
हाथ कटे या माथ कटे अब जीवन में
अपने को सदा के लिए तुम बचा लेना।
कहीं कोना अधूरा न रह जाय हृदय का
हृदय की पीड़ा को विष समझ पी लेना।
-सतीश शेखर श्रीवास्तव, मध्य प्रदेश

इंडिया लॉकडाउन
जीते थे जीते हैं जीता ही करेंगे
हम जवान जान को थामा करेंगे
दिन दुनिया थम गई तो क्या हम न डरेंगे
फिल्म कहानी की इसे रुपहले पर्दे पे दिखाएंगे
संघर्ष के सिपाही हैं हम, हम दमभर लड़ेंगे
राह सूना राही सूना-सूना हर एक नजारा
न जाने क्यों लगता है अब कोई नहीं है प्यारा
इस विधिविधान को हम बदलकर रहेंगे
फिल्म कहानी की इसे रुपहले पर्दे पे दिखाएंगे।
मास्क से आस लगा बैठे ये कौन-सी महामारी
सबने देखो कर लिया तन्हाई से ही यारी
कोरोना काल के गाल से हम निकलकर रहेंगे
फिल्म कहानी की इसे रुपहले पर्दे पे दिखाएंगे।
ये कैसी विपदा आई जो हर कोई घबराए
राजा और रंक देखो एक डगर पे आए
इस डर को हम भगाकर रहेंगे
फिल्म कहानी की इसे रुपहले पर्दे पे दिखाएंगे।
-संजीव कुमार पांडेय, नालंदा

काश! एक बहन भी होती
सगी न सही परायी होती काश एक बहन भी होती
दो बातें कर लिया करता थोडा हंस थोडा रो लिया करता
कभी थक कर सो लिया करता सगी न सही परायी होती
काश एक बहन मेरी भी होती।
थोडा मस्ती करते थोडा लड़ते झगड़ते
वो एक-दूसरे से रूठते एक-दूसरे को मानते
एक-दूसरे के कान पकड़वा माफी मंगवाते
सगी न सही परायी होतीकाश एक बहन मेरी भी होती।
मैं कोई गलती करता तो सामने आकर मां से लड़ती
मेरी गलती को अपने सर लेकर मेरी पैरवी करती
किसी काम को करवाने को पिता से इजाजत दिलाती
सगी न सही परायी होती काश एक बहन मेरी भी होती।
आता रक्षा बंधन का त्योहार वो रहती भूखी मेरे वास्ते
वो राखी बांध हाथ में मेरे मुझसे मांगती उपहार
मैं उससे करके मजाक कहता इस बार नहीं अगली बार
वो रूठकर कमरे मैं चली जाती मां से डांट मुझे पड़ती ।
मानाने को उसे मैं देता कई उपहार
क्योंकि बहन की ख़ुशी के आगे फीका है सारा संसार।
सगी न सही परायी होती काश एक बहन मेरी भी होती।
लड़के वाले मांगने आते उसका हाथ वो थोड़ा शर्माती
सगी न सही परायी होती काश एक बहन मेरी भी होती।
शादी में मैं नाचता सारी रात सबसे आगे खड़ा होता
स्वागत को जब दूल्हा लेकर आता बारात।
सगी न सही परायी होती काश एक बहन मेरी भी होती
आता पल विदाई का मैं खुद को करके बंद एक कमरे मैं रोता
बहन आती ढूंढती हुई मैं खुद को संभाल कर बोलता
वो मेरे गले लग कर कहती अपना ख्याल रखना
सगी न सही परायी होती काश एक बहन मेरी भी होती।
-आंसू कुमार प्रजापति, लखनऊ

ठहरूं कैसे
जरा बताओ?
ठहरूं कैसे जरा बताओ हमें,
जब हमें है चलते रहना।
ठहरी हवा भी है क्या कभी कहीं,
उसको तो है बहते रहना।
कल-कल करते जल को देखा है,
उसको तो सागर से नभ,
नभ से धरती, धरती से झरने,
नदियों से फिर सागर में है मिलना।
फिर ठहर जाऊं मैं कैसे बता हमारी
सफर-ए-जिंदगी का
मंजर ही है चलते रहना।
– वेद प्रकाश गुप्ता ‘निलेश’

खुशियां
निहारता सवेरा
कभी जीवन की खुशियां निहारता सवेरा
कभी दूर से मंजिलों को पुकारता सवेरा,
कभी बारिश में पलकों को सुखाता सवेरा
कभी चिटकनी खोल करीब बुलाता सवेरा।
कभी मंदिर की घंटियों में गूंजता सवेरा
कभी भाड़ में चने सा दर्द भूजता सवेरा,
कभी ख्वाहिशों के मर्म में सिमटा सवेरा
कभी उमंग भरे कर्म में लिपटा सवेरा।
कभी नई उलझनों को समेटता सवेरा
कभी उम्मीदें तिकल्ले पे लपेटता सवेरा,
कभी झीनी चादर से पसीना पोंछता सवेरा
कभी घर से निकलने पर टोकता सवेरा।
उठकर फिर नई उम्मीदें दिखाता सवेरा
मुड़कर गुजरे दिन को मुंह चिढ़ाता सवेरा,
सूखते गले की प्यास सवेरा
फिर एक नई आस सवेरा।
रोज उगते-ढलते जीवन में
आज का फिर खास सवेरा।
-तरुण बिष्ट, उत्तराखंड

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