मुख्यपृष्ठनमस्ते सामनापाठकों की रचनाएं : रामेश्वरम तीर्थधाम!

पाठकों की रचनाएं : रामेश्वरम तीर्थधाम!

  • रामेश्वरम तीर्थधाम!
    रामेश्वरम तीर्थधाम एक ज्योतिर्लिंग
    चार धामों में एक धाम स्थित हैं
    एक सुंदर शंख आकार द्वीप पर
    जो है हिंद महासागर और बंगाल
    खाड़ी से चौतरफा घिरा हुआ।
    रामेश्वरम मंदिर द्रविण स्थापत्य
    शैली का है बेजोड़ नमूना
    विश्व का सबसे लंबा गलियारा
    और जिसके खंभों पर सजी हुई हैं
    महीन, बेहद सुंदर कलाकृतियां।
    रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग की है महिमा
    अपार मुख्य मंदिर में आज भी
    पूजित हैं दो शिवलिंग रामेश्वरम
    ज्योतिर्लिंग के साथ स्थापित काशी
    लिंंग कहलाते रामनाथ स्वामी।
    स्थल पर किया था मां दुर्गा
    महिषासुर का वध और यहीं से
    होती है समुद्र में नल एवम नील
    निर्मित सेतुबंध की शुरुआत।
    लंका विजय कर माता सीता
    साथ वापस जब आए प्रभु श्री
    राम करके पार समुद्र तब पहुंचे
    रामेश्वरम धाम, पहुंचे रामेश्वरम
    धाम करें शिव जी की पूजा।
    गुरु जी रामेश्वरम के मुख्य
    मंदिर में पूजा करने से पहले
    करते हैं कुंड स्नान समुद्र में
    डुबकी लगा फिर करते हैं
    बाइस स्रोत, बाइस कुंड स्नान।
    -वीरेंद्र कुमार, नई दिल्ली
  • मेघ आओ
    भाद्रपद के कजरारे मेघ आओ
    अपनी सांवरी घटा में लपेट लो
    गीली और कोमल मिट्टी से पोषित
    धरती की देह पर लपेट लो।
    कितनी फब रही मैके से आई हरी साड़ी
    जब तुम आओगे मकई के खेत में
    मचान पर बैठकर कुंभार के आवे में
    सबसे ज्यादा पकी मिट्टी वाली गगरी
    वंâकड़ियों से बजाते हुए गाऊंगा मल्हार।
    ओ लाल चोंच वाले सुग्गों आओ
    आओ की अमरूद के बाग में
    मेरी बहन ढूंढ रही है
    ललगुदिया फल वाला बिरुवा
    तुम आओगे तो तुम्हें बहकाएंगी जरूर
    तुम्हारे हरे पंखों पर उतर आया हो भादो।
    हरी ओ डार वाली जामुन
    तुम्हारे रंग से कसैली हो गई है
    पुलई से गिरे फरेंद को कैसे उठाऊं
    इस गीली मिट्टी पर पटे पड़े हैं रसगुल्ले
    यह भरभस बारिश के दिन हैं।
    अनंत वितान तक तनी हुई रातें
    ये कठोर कवच वाले कैथे और बेल
    टकरा रहीं हैं मेघमति तीखी बूंदें
    ऊसर भूमि की पगडंडी के ऊपर
    घेरे खड़े हैं चकवड़ और हुरहुर
    जैसे भादो की भद्रता ने दे दिया हो रास्ता।
    अरे ओ भादो के मेघ आओ
    आओ और उतरो धान के खेतों में
    जहां निकौनी कर रहीं हैं काकी
    करबी से लिपटकर बिलंगी जा रही है
    लोंबिया की बेल आओ की देर न हो
    सरपत की पत्तियों को धार दो।
    -शैलेंद्र कुमार शुक्ल
  • भाई थोड़ा सा
    प्यार देना
    रक्षा अपनी हम खुद कर लेंगे,
    बस भाई तुम थोड़ा सा प्यार देना।
    कभी-कभी जब मैं मायके आऊ,
    मां के जैसा दुलार देना।
    नहीं चाहिए वचन सुरक्षा का,
    न कोई मंहगा उपहार देना।
    थोड़ा सा अपना समय कभी कभी,
    भईया तुम मेरे साथ गुजार देना।
    सब जग के लिए हो गई बड़ी मैं,
    तुम मुझे बचपन के नाम से पुकार देना।
    तुम भी तो सौ-सौ जंजालों में घिरे हुए हो,
    सोच के मेरे कष्टों को मत बेकार देना।
    रक्षा अपनी हम खुद कर लेंगे,
    बस भाई तुम थोड़ा सा प्यार देना।
    -प्रज्ञा पांडेय (मनु) वापी, गुजरात
  • जिंदगी की शाम
    जिंदगी की शाम कब होगी
    तुमसे मुलाकात कब होगी
    सपने में देखा था जिस सूरत को
    उस सूरत का दीदार कब होगा।
    आईने में देखकर सूरत कभी-कभी
    हम भी थोड़ा-थोड़ा मुस्कुरा लेते हैं
    कदम-कदम पर ठोकरे लगती है
    फिर भी अपने आप को उठा लेते हैं।
    दिल में जज्बात कब नहीं थे अपने
    टूटे हुए ही सपने सजाए थे हमने
    हारने में भी खुशी मिलती है हमको
    उनकी खुशियों में ही खुशी है हमको।
    -लालजी पाल ‘सहज’
  • निर्मल जीवन!
    आओ जीवन को हम निष्पाप बनाएं
    अपने तन से दस पापों को दूर भगाएं।
    पहला पाप है चोरी करना मेरे भाई
    किसी के मूल्यवान वस्तु को समझें राई।
    बिना स्वीकृति के कोई चीज न ले जाएं
    आओ हर प्रकार की हिंसा से हम दूर रहें।
    हर छोटे से बड़े जीव का मान करें
    जीएं और जीने दे का सिद्धांत बनाएं
    आओ तृतीय पाप पर स्त्री-पुरुष गमन
    न हो व्यभिचारी रखे उज्ज्वल तन-मन।
    हैं निषिद्ध मैथुन पाप इससे बच जाएं
    आओ वाणी का है प्रथम पाप असत्य बचन
    इससे बढ़ता व्यभिचार और पाप लगन।
    सदाचार को जीवन का आधार बनाएं
    कटु वचन है झगड़ों का मानों कारण
    इससे बनते शत्रु अपने भी अकारण।
    कटु बचन को वाणी से बस दूर भगाएं
    आओ बृथा बैठकर जो हम करते परिचर्चा
    बिना अर्थ के बकवास पर हम करते चर्चा।
    यह वाणी का तृतीय पाप इससे बच जाएं
    आओ वाणी का है चतुर्थ पाप बस पर निंदा
    इससे रहता वैर सदा जीवन में जिंदा।
    निंदा से बचें वचन को स्वच्छ बनाएं
    परद्रोह यह मन का पहला पाप।
    मन ही मन देना दूजो को सदा श्राप
    ईश्वर देता दंड यह खुद समझें-समझाएं
    आओ पर धन इच्छा बिना श्रम के न रखना।
    घूस मत लेना न पर धन को हरना
    पर द्रव्य हरण की मनसा को बस दूर भगाएं
    आओ न करें किसी के अहित का चिंतन।
    इससे कलुषित होता है अपना अंतर्मन
    जीवन में परहित सेवा का बस गुण अपनाएं
    आओ जीवन को हम निष्पाप बनाएं
    अपने से दस पापों को बस दूर भगाएं।
    -डॉ. डी.आर. विश्वकर्मा, वाराणसी
  • वक्त की चंचलता
    ये वक्त बड़ा ही चंचल है
    इसकी चंचलता को रोको
    वरना तुमको एक दिन ये
    अचंचल बना देगा।
    वक्त की सी चंचलता
    तुम भी अपना लो
    वरना चंचल वक्त से
    तुम पीछे रह जाओगे।
    प्रायश्चित करने को भी
    तुम्हारे पास वक्त नहीं होगा
    इसलिए इस वक्त के साथ
    तुम भी चंचल बनो।
    -प्रिया वर्मा
  • वाह-वाह नेताजी!
    नेताजी बने धीर गंभीर
    जनता मध्य आज पधारे
    आप ही मेरे भाग्य विधाता
    अब हम आप के सहारे।
    चाची-चाचा, भाई-बंधु
    मेरी नौका अब आपके हाथ
    आपके बीच खड़ा यह नेता
    आज दीजिए अपना साथ।
    हर मांग पूरी अब होगी
    अवसर एक बार तो दीजिए
    भाई बिरादर हम आपके
    मेरा अब उद्धार तो कीजिए।
    सड़कें पक्की बनवा देंगे हम
    हर गली-गली होगी रोशन
    प्राथमिक विद्यालय १०वीं बनेगा
    रोजगार पा खुश होंगे सब जन
    क्षेत्र में अपने अस्पताल खुलेगा
    बच्चों हेतु अब वाचनालय
    किसी को कोई दिक्कत न होगी
    अनाथों हेतु अब अनाथालय।
    बस एक बार कृपा कीजिए
    प्रतिनिधि मुझे चुनिए श्रीमान
    क्षेत्र को इस स्वर्ग बनाएंगे
    आप सब तो बड़े महान
    सारी चिंताएं मुझ पर छोड़िए
    आपकी मेहनत सफल कर दूंगा।
    आपकी सारी बड़ी समस्या
    बजा चुटकी मैं हल कर दूंगा
    जनता बोली वाह-वाह नेताजी।
    आप तो सच में बड़े महान
    वोट हमारे बिल्कुल आपके
    कीजिए आप सबका कल्याण।
    – चंद्रकांत पांडेय, मुंबई
  • मौसम की अंगड़ाई
    करवट बदली है मौसम ने और ली है एक अंगड़ाई
    उमस भरी गर्मी से राहत है जन-जन तक पहुंचाई।
    गर्मी से बारिश का मौसम बदल रहा है अब पल-पल
    प्यास बुझाने शुष्कधरा की बादल लेकर आते हैं जल।
    इस बारिश के मौसम में अब होगा लुका-छुपी का खेल
    सूरज और बादल मिलजुल कर खेलेंगे बर्षा का खेल।
    लाते बादल भर-भर पानी और बर्षा कर वापस जाते
    देकर धरती को बर्षा जल तृप्ति धरा को हैं पहुंचाते।
    घिर-घिर के घनघोर घटाएं लाते बादल अपने साथ
    छुपता सूरज दूर कहीं जा लगता है दिन में रात।
    लुका-छुपी के इसी खेल में निकला सूरज चमकी धूप
    पीछे से फिर झुंड में बादल आ पहुंचे धरे अनेकों रूप।
    गुरु जी हरियाली जल से होती जीव सुरक्षा
    संरक्षण जल का सब करें सुनिश्चित जीवन रक्षा।
    -चंदन कुमार, मुंबई
  • भादो का महीना
    गजब भागमानी हे बहिनी भादो के महीना
    मइके में जुरियाही डोकरी नेवरनिन कइना
    खुसयाली बर मनाथे गांव-गांव में पोरा परब
    दुज के करू भात खाके तिज में राखे बरत
    मइके के सुख बर निर्जला उपास हे रहिना
    गजब भागमानी हे बहिनी भादो के महीना।
    नंदीया बइला निकाल के देव धामी में घुमाय
    पोरा चुकिया बिसा के नान्हे लइका ले धराय।
    खेल-खेल में सीखे नोनी घर संसार में रहिना
    गजब भागमानी हे बहिनी भादो के महीना।
    हरहिंछा के चार दिन ससुरार के नइहे संसो
    लुगरा पोल्खा साया रूंग-रूंग के लेवा ले सबो
    फरहार में पाबे सरी खुसी महतारी के कहिना
    गजब भागमानी हे बहिनी भादो के महीना।
    पचपन के दिन लहुटे ठट्ठा दिल्लगी में पोहाय बेरा
    जनम डेहरी छोड़के चल देथे नोनी धरम के डेरा
    नता ले नता नइ छुटे आते-जाते हे रहिना
    गजब भागमानी हे बहिनी भादो के महीना।
    -हेमलाल कुर्रे,बागबाहरा (छत्तीसगढ़)

अन्य समाचार