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पाठकों  की रचनाएं : कोई मेरा बचपन फिर से लौटाना!

कोई मेरा बचपन फिर से लौटाना!
दादाजी की उंगली को
पकड़ के मेला घूमना
हिंडोले में झेूला झूलना
और बर्फ का गोला चखना
खुली छतवाली टॉकीज में
पिक्चर देखना
कोई मेरा बचपन!
भाई से वा लड़खड़ाते
कैंची  चलाके किराए से
ली हुई साइकिल सीखना
सीखते हुए गिर पड़े तो
शरमा के जल्दी से उठना
गिरकर फिर संभलना
कोई मेरा बचपन!…
गर्मियों की छुट्यिों में
दोस्तों के संग हुड़दग मचाना
दादी मां की वो
प्यारी सी डां सुनना
बचपन की वो सहेलियां
छुप-छुप के वो लुका-छिपी खेलना
कोई मेरा बचपन!…
गुड़ियों की शादी में
झूठ-मूठ के बाराती बनना
मेरा दूल्हा-मेरी दुल्हन करके
फिर वो झगड़ा करना
शादी तोड़कर अपना दूल्हा-दुल्हन
लेकर दुब दबा के भाग जाना
कोई मेरा बचपन!…
पड़ोसी के दरवाजे की
घंटी बजा के भाग जाना
फिर छुपकर उसक मजा देखना
हमने कुछ किया ही नहीं वाला
वो मासूम भोलापन दिखाना
याद आता है बचपन का वो गुजरा जमाना
कोई मेरा बचपन!…
-सौ. स्वरूपरानी, ठाणे

इजहारे मुहब्बत!
हमने रातों को पाला ‘उजालों’ की तरह
दिन में बहस छिड़ गई ‘सवालों’ की तरह।
कब?… क्यों?… कैसे ?
कहने को वो हम पर जान छिड़कते थे
मगर दाग देते रहे वो नए छालों की तरह।
दावा था उनका हम तुम पर मरते हैं
नित बदलते रहे वो खयालों की तरह।
जरूरत क्या थी दिल को तौलने-टटोलने की
हमने चाहा उनको जीभर दिलवालों की तरह
नाहक अपनी वफा का सबूत क्यों मैं देता
हमारा दिल है नरम भी है गालों की तरह।
‘इजहारे मुहब्बत’ मैं कभी कर न सका
हरदम खामोश रहा मैं बेदम दीवारों की तरह।
गुजर गई बहुत थोड़ी बाकी है ‘त्रिलोचन’
हर लम्हा जीए जा तू मिसालों की तरह।
– त्रिलोचन सिंह आरोरा, नई मुंबई

डर
डर जब तक बाहर हो
लड़ने की हिम्मत बनी रहती है
डर जब बैठ जाए भीतर
जीवित पर आत्मा मर जाती है।
वही सबसे डरावना होता है
जो सबसे ज्यादा डरा होता है
जो सबसे ज्यादा डरा होता है
वही सबसे अधिक डराता भी है।
डरने और डराने का खेल
मानव सभ्यता का सबसे पुराना
सबसे आकर्षक खेल है।
इस खेल में कभी कोई जीतता नहीं
डरानेवाला भी हारता ही है।
फिर भी खेल ऐसा कि
मजा कम ही नहीं होता
कई डर बड़े खूबसूरत होते हैं
मसलन मौत का डर
ईश्वर का डर, पाप का डर

नर्क का डर, कुछ डर

मजेदार भी होते हैं।
बिछड़ने का डर, गरीrबी का डर
बेइज्जती का डर, कुर्सी का डर
डर की जिंदगी बड़ी व्यस्त होती है
डर फुरसत   नहीं देता फंसाए रखता है
डर से निकलो तो दूसरा चौखट पर
तीसरा सड़क पर होता है।
डरनेवाला हर डर के बाद
यही सोचता है कि डर से मुक्ति मिले
तो थोड़ी देर खुलकर जी लिया जाए
किंतु डर से मुक्ति संभव ही नहीं
उसने हमें थोड़े ही जकड़ा है।
सच तो यह है कि डर को
हमने ही पकड़ा है और छोड़ नहीं रहे
क्योंकि एक डर ही नहीं रहा
तो इतनी बड़ी जिंदगी कटे भी तो कैसे ।
-हूबनाथ

बारिश का मौसम आया

फिर से बारिश का मौसम आया,
सबके चेहरों पर मुस्कान है लाया।
वर्षा में हवा चल रही मंद-मंद,
बच्चे ,बूढ़े सब लेते इसका आनंद।
चारो ओर फैली अद्भुत हरियाली,
मनमोहक छंटा है सबसे निराली।
देखो इस मौसम के गुण गाता,
बारिश है सबके मन को भाता।
मेरे मित्रों तुम भी लो आनंद,
वर्षा को जो नही हो रही बंद।
बच्चे कागज की नाव दौड़ाते है,
ऐसे नजारे दिल को बहलाते है।
आओ सब संग झूमे गाए,
मनभावी ऋतु का आनंद उठाए।
-रामनाथ पांडे, प्रतापगढ़

बरसात अश्कों की!
मुझसे काम की अब बात नहीं होती
जिंदगी में अमावस की रात नहीं होती,
बेशकीमतीr हैं उनकी याद के मोती
आंखों से अश्कों की बरसात नहीं होती।
भीड़ में भी मुझको पहचान गए वो
इससे बेहतर कोई सौगात नहीं होती,
चांद भी निकलता है तारों को साथ लेकर
तन्हा कभी कोई बारात नहीं होती।
मुहब्बत नहीं रहम कर रहे हैं मुझ पर
‘काजी’ इससे बढ़कर कोई खैरात नहीं होती।
-डॉक्टर वासिफ काजी, इंदौर

बरसात का मौसम!
प्यारी प्यासे हो तुम प्यासे हैं हम
बड़ा बेदर्द है बरसात का मौसम
यादें बहुत आती तुम बरसात में
आस हमारी भीगें दोनों साथ में
बरसात में मिलने का करो रहम
बड़ा बेदर्द है बरसात का मौसम।
बादल से बरसते पानी के बूंदें
प्यासा मन मेरा तुम्हें बूंदो में ढूंढे
भींग के बाहों में आ जा सनम
बड़ा बेदर्द है बरसात का मौसम
भींगी-भींगी रिमझिम बरसात है
तन्हा नहीं कटती काली रात है
पानी में जवानी लगाती है आग
बड़ा बेदर्द है बरसात का मौसम
तुमसे जुदा रहना है मुश्किल।
बदन भींगा प्यासा है मेरा दिल
तेरे प्यार से मेरा जीवन रोशन
बड़ा बेदर्द है बरसात का मौसम।
-घूरण राय ‘गौतम’ मधुबनी (बिहार)

पानी
बचा लो!
धरा की ये सुंदर निशानी बचा लो
मैं कहता हूं तुमसे ये पानी बचा लो
रहेगा ये जीवन रहोेगे तभी तुम
रहेगी ये धरती जो धानी बचा लो।
ये बादल ये बिजली ये बारिश की बुदें
ये झरने ये नदियां रवानी बचा लो
वो जंगल के किस्से वो राजा की बातें
वो बचपन की सुंदर कहानी बचा लो।
अभी भी हैं ताजी वो बातें पुरानी
नई बात छो़ड़ों पुरानी बचा लो।
सभी पर है छाया अलग ही नशा है
ये बचपन बुढ़ापा जवानी बचा लो।
उठाकर तो हाथों में देखो ये गंगा
भगीरथ की आंखों का पानी बचा लो
चलो आज खाओ धरा की कसम तुम
ये पानी की तुम जिंदगानी बचा लो।
-प्रशांत सिंह, मुंबई

माता का आंचल!
शतरंज के मोहरे बिछाए जा रहे हैं
माता के आंचल जलाए जा रहे हैं।
कुर्सियों के पांवों को मजबूत करते
गरीबों की दुनिया उजा़ड़े जा रहे है।
पत्थरों का हाथ में आना है घातक
वो देश की नींव दरकाए जा रहे हैं।
चंद सिक्कों में यहां बिकती जवानी
अंधेरे में न‌ई पीढ़ी ढकेले जा रहे हैं।
गुलिस्तां की तितलियों में छटपटाहट
नोच इनके पर, जलाए जा रहे हैं।
गुलिस्तां तहजीब गंगा जमुनी उमेश
संस्कृतियों की बलि चढ़ाए जा रहे हैं।
– डॉ. उमेश चंद्र शुक्ल

शून्य से शून्य तक!
शून्य से शुरू शून्य पे खतम
कुछ रहा बीच में
तो क्या सोचे हम?
गुनाह गुणा और पुण्य हुए
अव्वल आनेवाले दूर हुए
हम शून्य से शुरू शून्य में हो जाएंगे
जीरो बनकर खुश हैं
पीछे रहकर ताकत बढ़ाएंगे।
दुनियादारी की कतार में पीछे ही भले
उसकी नजर में हीरो कहलाएंगे।
न मैला मन न मैला कर्म करें
झुकेंगे अदब से दुआएं ही पाएंगे
झुककर चलने में क्यू करें शर्म
आंधी में झुकोगे जीवन बचाओगे।
झुकने की कला कोई है अपनाता
सिकंदरी मिजाज नहीं
बुद्ध का त्याग जीवन का सार है सिखाता।
अकड़-अकड़ के रहने में क्या शान है भाई
टूट के चूर होने से झुकने में ही है भलाई!
-नैंसी कौर, दिल्ली 

 

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