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पाठकों की रचनाएं : वो दौर

वो दौर कितना अच्छा था,
जब हमारा मकान कच्चा था।
घर में सुकून रहता था,
खुद में जुनून रहता था।
आपस में कितना प्यार था,
एक-दूसरे पर एतबार था।
पाने के चक्कर में खो दिया,
हंसने के चक्कर में रो दिया।
नीम के पेड़ को उजाड़ कर,
कूलर में ठंडक ढूंढ़ते हैं।
आगे जाने के चक्कर में,
सुकून हम छोड़ आए।
अब ये मुमकिन नहीं,
वो पुराना दौर आए।
-शोएब खान शिवली, कानपुर देहात, उत्तर प्रदेश साहित्य),एम.ए(समाजशास्त्र),बीएड

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