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पाठकों की रचनाएं : बहना, तू राखी पे मत आना

  • बहना, तू राखी पे मत आना
    बहना, तू राखी पे मत आना
    तेरी भाभी को है मायके जाना।
    मां होती तो और बात थी
    एक डोर ही तो बांधने हैं आना
    क्यूं कर इतनी परेशानी उठाना
    बहना तू राखी पर…..
    इस धागे की महिमा न्यारी
    इस पर है भारी जिम्मेदारी
    मजहब न आ सके इसके आड़े
    जज्बातों की डोर ने तोड़े पहरे सारे,
    पहुंचा हुमायूं रक्षाबंधन निभाने
    कर दिए डोर ने वारे-न्यारे।
    भाई तुम इस डोर को कम न आंको
    न खोना भवसागर में इस बंधन को।
    बहना तू इस युग में रहती?
    यू जज्बातों में क्यूं बहती?
    आजकल कौन है राखियां बांधता?
    इनसे जुड़ा न कोई भी फायदा।
    आना-जाना है अब मुश्किल
    क्यूं बढ़ाए तू अपना यूं खर्च?
    असलियत तुझसे छुपी नहीं है,
    आगे बढ़ गया है अब जमाना
    बस बहना तू मान ले कहना
    अब तू राखी पर मत आना।
    -नैंसी कौर, दिल्ली
  • सावन में पड़ गए झूले
    सावन में पड़ गए झूले।
    संग मोर-पपीहा बोले।।
    सावन में पड़ गए झूले।
    अमवां की डार रे।।
    कि आया सावन झूम के…।
    सखियां मंदिर-मंदिर डोले।
    पर भोले नहीं बोले।।
    बागों में फूल  है फूले।
    वन-उपवन मस्ती में झूले।।
    सावन में पड़ गए झूले।
    अमवां की डार रे।।
    कि आया सावन झूम के।
    सखियां कजरी गाएं।
    मनवां को हर्षाए।।
    आई सावन की बेला।
    सखियां गाएं मंगलबेला।।
    सावन में पड़ गए झूले।
    अमवां की डार रे।।
    कि आया सावन झूम के।
    सावन में पूरवाई आई।
    मन में शीतलता छाई।।
    सावन में हरियाली छाए।
    संग धरती-अंबर गाए।।
    सावन में पड़ गए झूले।
    अमवां की डार रे।।
    कि आया सावन झूम के।
    जब सावन की पड़े फुहार।
    मनवां हर्षित अपरंपार।।
    सावन तीजों का त्यौहार।
    मनवां में आई बहार।।
    सावन में पड़ गए झूले।
    अमवां की डार रे।।
    कि आया सावन झूम के।
    -कविता सिंह, सतना (म.प्र.)
  • सावन मास सुहावन
    आया सावन माह सुहावन
    प्यासी धरती तृप्त हुई
    मन हर्षित खुशहाल धरा
    झूमे वन की डाली
    सर-सर चली हवाएं
    मोर, पपीहा गीत सुनाएं
    रिमझिम बूंदों से महकी
    वसुधा की हरियाली
    भोले बाबा की जयकार
    भक्त चलें हैं शिव के द्वार
    सावन माह सुहावन
    मास बड़ा है पावन
    घिर-घिर आए काली बदरिया
    चहुं दिस होत मल्हार
    पिया की याद सताए देखो
    विरहन करें पुकार
    बिन साजन तन मन को
    झुलसाती अगन फुहार
    जिया जलाए
    रिमझिम सावन की रसधार।
    – दिवाकर सिंह, लखनऊ
  • मन की मनमानी
    भुलाना पड़ता है कभी-कभी गुजरी यादें पुरानी
    हर वक्त नही चलती है जिद्दी, मन की मनमानी
    होता नहीं है ख्वाबों का हकीकत से वास्ता
    बड़ा ही मुश्किलों भरा है, ये इश्क का रास्ता
    उसे पाने की चाह में यूं जिंदगी निकल गई
    अपनी सुबह न आई हर शाम, होके ढल गई
    अपनी चाहतों का दौर बनके रह गया कहानी
    हर वक्त नहीं चलती है जिद्दी…
    हर एक जुस्तजू दिल की, लड़खड़ा के रह गईं
    ख्वाहिशों की कश्तियां आंसुओं में बह गईं
    ठंडी पड़ गई है अब तो जज्बातों की आग भी
    सुबक रही है बुझे अरमानों की खाक भी
    दफन हो गई है अपनी उल्फत की हर निशानी
    हर वक्त नहीं चलती है जिद्दी…
    -रीता अमर कुशवाहा, मुंबई
  • इश्क
    सभी को है पता तेरी गली में क्यूं मैं आता हूं।
    मुझे है इश्क तुझसे राज ये फिर भी छिपाता हूं।।
    भले तू मुस्कुराती है नजर औरों पे रहती है।
    तसल्ली है कि तेरा हंसता चेहरा देख पाता हूं।।
    झलक दिख जाए जो तेरी, गली के मोड़ से मुड़ के।
    तो बतलाऊं कि मन ही मन नहीं फूले समाता हूं।।
    तू जिस खिड़की पे आती है नजर उस पर ही जाती है।
    बहुत मायूस होता हूं नहीं जब देख पाता हूं।।
    लगा रहता है डर `शिब्बू’, कोई ये पूछ न बैठे।
    वजह क्या है कि मैं इस गली के चक्कर लगाता हूं।।
    -`शिब्बू’, गाजीपुरी
  • हाथ की रेखा
    जीवन अब तक कैसा  बीता बता रही है,
    आने वाले वक्त का प्रारूप जता रही है,
    भूत-भविष्य का लेखा-जोखा,
    तेरे हाथ की रेखा सब कुछ दिखा रही है।
    कुछ गम थे कुछ खुशियां भी साथ लगीं,
    कुछ समय की भेंट चढ़ गए कुछ तेरे हाथ लगीं,
    समय का पहिया घूमता रहता बता रही है,
    तेरे हाथ की रेखा सब कुछ दिखा रही है।
    मैं तेरे अंदर हूं या तू मेरे अंदर है,
    मैं तो बस किनारा हूं तू पूरा समंदर है,
    किनारे पहुंचने का रास्ता बता रही है,
    तेरे हाथ की रेखा सब कुछ दिखा रही है।
    बिगड़े चाल तो बिगड़ गई,
    संभल के चले तो ये भी संभल गई,
    कर्म ही असली धर्म का गुण सिखा रही है,
    तेरे हाथ की रेखा सब कुछ दिखा रही है।
    -अनिल `अंकित’, गुरुग्राम
  • चलता चल

आपस में बतियाता चल।
प्रेम सुधा बरसाता चल।।
स्वार्थ बीच में आ जाए तो।
थोड़ा त्याग दिखाता चल।।
थोड़ा लेकर थोड़ा देकर।
तालमेल बैठाता चल।।
रुकनेवाली हर गाड़ी को।
धक्का मार चलाता चल ।।
खुद विकास की तरफ देखकर।
कुछ रफ्तार बढ़ाता चल।।
दाएं-बाएं मुड़ना हो तो।
थोड़ी अकल लगाता चल।।
सबको अपने साथ मिलाकर।
हरदम काम बनाता चल।।
उलझन वाली राह छोड़कर।
पगडंडी पर गाता चल।
आगे तुमको राह मिलेगी।
यह विश्वास जगाता चल।।
उलझ गए तो उलझ गए तुम।
खुद को ही सुलझाता चल।।
जीवन के इस सुखद सफर में।
सुख को गले लगाता चल ।।
दुख आने पर धैर्य बुलाकर।
उसका साथ निभाता चल।।
फिर आएगी नई रोशनी।
मन को यह समझाता चल।।
नफरत के पैदा होने पर।
अपना ज्ञान बढ़ाता चल।।
बड़ा काम करना है तुमको।
ऐसा अलख जगाता चल ।।
शांति तुम्हारा परम लक्ष्य है।
इसको ही अपनाता चल।।
-अन्वेषी

  • ईश्वर
    तुम्हीं गिरजातुम्हीं मस्जिद, शिवाला हो।
    तुम्हीं कान्हा तुम्हीं तो नंदलाला हो।।
    उदासी से भरे मन के दुआरे पर।
    दिया सा तुम अंधेरे में उजाला हो।।
    जरा सोचो उसे अब कौन मारेगा।
    जमाने में जिसे रब ने संभाला हो।।
    है पापी मन मेरा पावन करो प्रभु तुम।
    कि हर पल प्रेम का होठों पे हाला हो।
    बुरे हैं कर्म सच में पर दया करना
    कि भूखे पेट को भगवान निवाला हो।
    उसे डर क्या हृदय जिसके वो मूरत है।
    अधर पर नाम रखता मुरली वाला हो।।
    लगे सुंदर हमेशा हीर मन उपवन।
    खुशी छलके नजर उसकी दुशाला हो।।
    -ममता राजपूत `हीर’
  • हम बदनाम हुए
    गली-गली में उनके नए मुकाम हुए
    दोस्तों बेवजह हम बदनाम हुए।।
    हर जुबां पर चर्चा नए-नए किस्से
    हम महफिलों में चर्चा ए आम हुए।।
    जमाने भर की फितरतों से वाकिफ
    तवज्जो इतना हम बेकाम हुए।।
    सपनों पर लगा पहरा हथकड़ी बेड़ी
    दिल के अरमां यूं ही सब तमाम हुए।।
    जरा भी चैन नहीं मचलता है दिल
    कराह निकली जब मेरे दर्द आम हुए।।
    हुआ वही है जो मालिक की इच्छा
    तेरी बगैर मर्जी के कोई न काम हुए।।
    भरी महफिल में दस्तक दे रहा `उमेश’
    अवरुद्ध कंठ, अश्रुपूरित गुलाम हुए।।
    – डॉ. उमेश चंद्र शुक्ल, मुंबई
  • `बेरंग तस्वीर’
    हिङ्का के रंगों से उनकी तस्वीर बनाई है।
    अश्क ए गम के मोतियों से उसे सजाई है।।
    कारोबार ए इश्क में आशिक हुए मकबूल।
    क्या करें हमारे हिस्से तो बस रुसवाई है।।
    हमें भूलकर वो हैं बुलंदियों पर काबिज।
    हमने उनकी यादों की दौलत कमाई है।।
    जमाने के हिस्से में उनकी वफाएं हैं।
    हमारी किस्मत में उनकी बेवफाई है।।
    था मंजूर किस्मत को तड़पाना मुहब्बत में।
    हाथों से तभी हमनें लकीरें भी मिटाई है।।
    ख्वाहिश थी फकत आशियाने बनाने की।
    `काजी’ अब तलक जिंदगी में तन्हाई है।।
    -डॉ. वासिफ काजी, इंदौर (मध्यप्रदेश)

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