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पाठकों की रचनाएं :  मैं तेरा ही हूं मगर

 मैं तेरा ही हूं मगर
तेरा हो सकता नहीं!!
हाथ मेहंदी का था, जब मेरे हाथ में,
नजर झुकी थी मगर, कोई इशारा नहीं!
तुम तो सजती हो लेकर के अंगड़ाइयां,
बनकर जाओ दुल्हन ये गंवारा नहीं!!
मैं तेरा ही हूं मगर,
तेरा हो सकता नहीं!!
याद आती है रातें मुलाकात की,
बंद कमरे का कोई नजारा नहीं!
मानता हूं गलती, सजा दो हमें,
मांग सकूं मैं तुझे दोबारा नहीं!!
मैं तेरा ही हूं मगर,
तेरा हो सकता नहीं!!
वो तुम पायल की झनकार क्या जानोगी,
जिसने कभी भी प्यार से पुकारा नहीं!
जल रहा हूं मैं अपने ही जज्बात में,
नजर भरके मैंने जिसे निहारा नहीं!!
मैं तेरा ही हूं मगर,
तेरा हो सकता नहीं!!
तेरी हर दीवानगी का मैं कर्जदार हूं,
प्यार कम था, तुम्हारा हमारा नहीं!
एक प्यार है ये, एक प्यार थी तुम,
फर्क बस इतना ये `तिवारी’ तुम्हारा नहीं!!
तुझे भूल जाना मेरे,
बस की बात नहीं!
मैं तेरा ही हूं मगर,
तेरा हो सकता नहीं!!
-शशिधर तिवारी `राजकुमार’, मुंबई

`तेरी मुस्कुराहट ही है मेरी खुशियां’
मुहब्बत नशा है संभलना जरा,
ये लत बेवफा है ताउम्र गहरा,
न हम ही ठहरते, न उम्र ही ठहरी,
नशा हो जिसे भी वो हो जाए बहरा,
जगी जब जवानी या हो कड़ा पहरा,
रोके न ये रुकती ख्वाब दिल के हो गहरा,
मेरा प्यार उसके भी दिल में हो ठहरा,
ये अंधी मुहब्बत है दिखता सुनहरा,
है इश्क का जादू चढ़ाता है कुहरा,
सिसकते-सिसकते दिखाता अंधेरा,
तरसते हैं यौवन न दिखता सवेरा,
तुम बेदर्द हो, लूटते खुशी सारा मेरा,
पागल बनाकर आंसुओं ने है घेरा,
न तेरा घरौंदा न घर मेरा तेरा,
बस चाहत के आफत ने हमको है घेरा,
तुम्हीं मेरी पूजा, तुम्हीं मेरे मंदिर ये जज्बातों ने हमको बनाया है तेरा,
न है कोई मंजिल न जहान अपने काबिल,
तेरा है मेरा दिल, मेरा है तेरा दिल,
अभी तू यहां मिल, सहेजूं तेरा दिल,
नजरबंद हो के न तू बन यूं कातिल,
तेरे पर फिदा है ये तेरा ही कातिल,
उठा अपनी पलकें मिला अपनी आंखें,
करेंगे मुलाकात बस आंखें ही आंखें,
मैं चाहा था तुमको गिराकर निगाहें,
तेरे शर्म से चढ़ी मेरी बेशर्म निगाहें,
न हम ही बचे हैं न बेदर्द आहें,
घायल हैं तेरी वफाओं में बांहें,
तेरी मुस्कुराहट ही है मेरी खुशियां,
तुम्हीं मेरी यारी तुम्हीं मेरी रसिया,
-संजय सिंह `चंदन’

उम्मीदों का सूरज (नज्म)
नई उमंग जाग जाती है,
हीन भावना भाग जाती है,
जिस ओर देखो उस ओर,
अब नई राह नजर आती है,
उम्मीदों का सूरज जरूर निकलता है।
उम्मीद है तो मानो जीवित हो,
खुलकर उड़ो न तुम सीमित हो,
सारा जहां है मानो तुम्हारा,
क्यों तुम अपने पथ से भ्रमित हो,
उम्मीदों का सूरज जरूर निकलता है।
बहो जैसे जल बहता है,
बता तू निराश क्यों रहता है,
रुकने को तुझसे कौन कहता है,
कठिनाइयों को कौन नहीं सहता है,
उम्मीदों का सूरज जरूर निकलता है।
-शोएब खान शिवली, कानपुर देहात, उत्तर प्रदेश

`जिंदगी’ अनजाना सफर
जिंदगी जिसकी मंजिल हो वो जिंदगी नहीं
जब दो और दो चार ही हो, वो जिंदगी नहीं
जिसका परिणाम तय हो वो जिंदगी नहीं!
जिंदगी तो वो अनजाना सफर है
जिसकी कोई मंजिल ही नहीं,
वो सवाल है जिसका कोई जवाब नहीं।
प्रश्न का परिणाम प्रश्न भी हो सकता है दोस्त,
ये वो कोरा कागज है
जिस पर विषयों का कोई हिसाब ही नहीं।
ये वो रंगमंच है जहां महज अभिनय की कला है
आए किरदार, निभाए किरदार
खूब तालियां बटोर, अपनी छाप छोड़ जाए किरदार।
जहां सब `कथित सच’ हो, वो जिंदगी ही नहीं
जिंदगी कोई किताब, कोई खैरात, कोई सौगात नहीं,
दर्द से पूछकर देखो
झूठ, फरेब,धोखा, बेमुराद है ये जिंदगी।
महज माौके पे चौका है ये अवसरवादी जिंदगी
जब अपने ही वश में नहीं है जिंदगी
फिर क्यों गम खाना? क्यों आंसू बहाना?
सेहत के लिए अच्छा होता है `नैंसी’ मुस्कुराना।
उठो,गम भुलाई, मंद-मंद मुस्कुराओ
ये न सोचो की क्या है जिंदगी?
जो भी है अपनी ये जिंदगी यारा
ढंग से जियो, खुशी से जियो
कोई भी कीमत भले चुका लो
ये जिंदगी न मिलेगी दोबारा।
-नैंसी कौर, नई दिल्ली

हां यह मेरा शहर है..
आज के अखबार की सुर्खियों में छाया
काली सर्प सी स्याही में लिपटा और शरमाया,
हां यह मेरा ही तो शहर है!
कभी जब मैं रहता था वहां,
सुबह-शाम घूमता था जहां,
मेरा स्कूल और कॉलेज है वहां,
बेशुमार यादों का खजाना है जहां!
अभी-अभी अखबार में उस नाम को पहचाना,
और अकेले में यह माना कि इस शहर की एक गली में था कभी मेरा भी आशियाना,
करा बचपन व जवानी का फौरन पंचनामा
हां माना…यह शहर है बहुत अपना और जाना पहचाना!
किसी की काली करतूतों का हवाला,
जिसने मेरे शहर के नाम को है यूं उछाला,
और हलक में मेरे…अटका जिसके नाम का निवाला,
दिलों दिमाग को हिला डाला,
आंखों को नम कर डाला,
आज मुझे फिर से मेरे शहर का बना डाला!!
-पंकज गुप्ता

आजादी
यह उन दिनों की बात थी,
जब पूरी मुल्क एक साथ थी।।

फिर ब्रिटिशों की आगम आई,
और भारत में मातम छाई।।

चुनौतियों से भरी रात थी,
घनजंबाल बरसात थी ।।

एक तरफ थीं गैरमुल्की हमलों की मार,
दूसरी तरफ दे रहे थे कुछ अपने ही अपनों को घात।।

यह देख वीरों ने हलफ खाई,
जम्बूद्वीप उनसे आजाद कराई।।
-नमन तिवारी, पश्चिमी चंपारण (बिहार)

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