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पाठकों की रचनाएं : मुश्किल लगता है

जीवन में सबकुछ पा जाना मुश्किल लगता है।
अपना पूरा धर्म निभाना मुश्किल लगता है।।
राजनीति जो खड़ी हुई पूंजी के बल पर।
उससे उठ के टकरा जाना मुश्किल लगता है।।
फिर भी लगे हुए हैं क्रांतिवीर योद्धा भी।
जीत खींचकर ले आना मुश्किल लगता है।।
कमर तोड़ती आज सियासत जन जन की।
फिर भी उसको सबक सिखाना मुश्किल लगता है।।
क्रय-विक्रय सब देख रहे हैं आंखों से।
फिर भी जमकर आवाज उठाना मुश्किल लगता है।।
कटहे कुत्ते घूम रहे हैं बस्ती में।
उनको बस्ती से दूर भगाना मुश्किल लगता है।।
झुंड देख लो कौए,गिद्ध, सियारों का।
सोने की चिड़िया का बच पाना तो मुश्किल लगता है।।
सत्य भागता चला जा रहा जीवन से।
अब तो उसको पास बुलाना मुश्किल लगता है।।
जाग रहे हैं देश भक्त सेनानी भी।
लेकिन सारा बोझ उठाना मुश्किल लगता है।।
आज एकता कहां खड़ी है देखो तुम।
सरहद पर अब उसे बुलाना मुश्किल लगता है ।।
पागलपन सजता है जैसे राजा हो।
उसको तो अब समझा पाना मुश्किल लगता है ।।
जगद्गुरू का सपना हम सब देख रहे।
लेकिन उसके यश को पाना मुश्किल लगता है।।
-अन्वेषी

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