मुख्यपृष्ठनमस्ते सामना24 सितंबर के अंक नमस्ते सामना में प्रकाशित पाठकों की रचनाएं

24 सितंबर के अंक नमस्ते सामना में प्रकाशित पाठकों की रचनाएं

श्री गणेश हमारे
प्रथम पूज्य हैं गणेश हमारे
दयावंत को जो भी पुकारे
दौड़े आते भक्तों के द्वारे
प्रेम-श्रद्धा के अद्भुत न्यारे
मां पार्वती के बड़े दुलारे
देव लोक भी इन्हीं सहारे
पहली पूजा आप स्वीकारें
गूंजती आपकी जय हुंकारें
छप्पन भोग हैं आपको प्यारे
कष्ट, विपत्ति, दु:ख, दरिद्र संहारे
बप्पा मोरया जय जयकारे
रिद्धि-सिद्धि के प्रियतम प्यारे
गणेश चतुर्थी जन्म तुम्हारे
महादेव ब्रम्हांड हैं सारे
आपकी बुद्धि चतुराई से हारे
मैया पार्वती के पुत्र हैं प्यारे
मूसक वाहन बैठ विचारे
विघ्न विनाशक भक्त सहारे
जय गणेश मेरे घर में पधारें
आज ही पहुंचें हर घर द्वारे
– संजय सिंह ‘चंदन’

मां का होना
साथ में सारी दुनिया हो
सुख-सुविधा की बगिया हो
खुशी दर पर दस्तक दे
चाहे उससे गलबहियां हो
जीवन में लोगों की भीड़ लगे पर
जहां का होना एक तरफ
मां का होना एक तरफ
बचपन वाली अब बात कहां
रात में मां का साथ कहां
खरीद सके बचपन कोई
धरती पर किसी की औकात कहां
आज का हंसना एक तरफ
बचपन का रोना एक तरफ
जहां का होना एक तरफ
मां का होना एक तरफ
खेल-खेल में बचपन बीता
अब अलग तरह से जीवन जीता
मोह-माया से विरत हुआ मन
खोज रहा है भगवतगीता
मां के मोह में लिपटे थे ऐसे के
तकिया-बिछौना एक तरफ
मां की गोदी में सोना एक तरफ
जहां का होना एक तरफ
मां का होना एक तरफ
काश के कोई दिन लौटा दे
मां डंडा लेकर थोड़ा दौड़ा दे
जबरन कुछ निवाले खिला दे
बात-बात में शिवाले दिखा दे
परियों से मेल कराती मां
सब मनचाहा दिखलाती मां
थी दुनियादारी एक तरफ
और मेरा रोना एक तरफ
जहां का होना एक तरफ
मां का होना एक तरफ
– सिद्धार्थ गोरखपुरी

मेरे घरौंदे में जहर
दीमक की तरह जड़ों को काट रहा कोई
रंगों की बात करके हमें बांट रहा कोई।।
धधकते चमन को देखकर बिसूरती है मां
तुलसी के नन्हे बिरवों को छांट रहा कोई।।
सारी उमर खपा दी, आंगन में रोशनी हो
बेटा जिद किए बैठा, घर बांट रहा कोई।।
बाप ने बच्चों को हसरत से पाला-पोसा
बेटे खड़े है सामने, हमें डांट रहा कोई।।
यहां छोटी-छोटी बातों में तू तू मैं मैं है
मेरे घरौंदे में क्यों जहर घोंट रहा कोई।।
मन का हाल मत पूछो, हर फन में माहिर है
दुश्मनों का साथ, आंखें चुरा रहा कोई।।
जिसे देखते ही सहम जाता था घर ‘उमेश’
बेटों के सामने खड़ा, कांप रहा कोई।।
– डॉ. उमेश चंद्र शुक्ल

वृक्ष बचाओ
विश्व बचाओ
प्रकृति के साथ में रहकर
कवि शायर पाते हैं आनंद,
रोज-रोज रचते हैं फिर वे
गीत, गजल, मुक्तक व छंद!
-डॉ. मुकेश गौतम, वरिष्ठ कवि

खामोशी
बढ़ती उम्र के साथ
झुकते हुए दरख्त का
साया भी झुकने लगा है
तेज हवा में खामोश रहते हैं
शाख पर बचे
कुछ सूखे जर्द पत्ते भी
बेसब्र सी है
हर सब्ज शाख
जाने क्यों पनपने को
किसी और मकां पर
नादां हैं, बोझ लगने लगा है
उन्हे दरख्त भी
अपनी बेबसी पर ‘सुधीर’
खामोश है दरख्त
– सुधीर केवलिया,
बीकानेर (राज.)

शब्द
शब्द बस! शब्द हैं
कभी नि:शब्द कर जाते हैं
कभी निस्पंद कर जाते हैं
कभी दिल पर चोट कर जाते हैं
और कभी दिल जीत जाते हैं
शब्द बस! शब्द हैं
कभी मधुबन से लगते हैं
कभी जेठ से तपते हैं
कभी माघ बन जाते हैं
और कभी सावन सा बरसते हैं
शब्द बस! शब्द हैं
कभी गुदगुदाते हैं
कभी सहलाते हैं
कभी हंसाते हैं
और कभी रुला जाते हैं
शब्द बस! शब्द हैं
कभी तनहाइयां बन जाते हैं
कभी रुसवाइयां बन जाते हैं
कभी जुदाइयां बन जाते हैं
और कभी परछाइयां बन जाते हैं
शब्द बस! शब्द हैं
कभी दिल तोड़ जाते हैं
कभी दिल जोड़ जाते हैं
कभी यादों में बस जाते हैं
और कभी दिल में उतर जाते हैं
– प्रभुनाथ शुक्ला

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