मुख्यपृष्ठनमस्ते सामना2 अगस्त के अंक नमस्ते सामना में प्रकाशित पाठकों की रचनाएं

2 अगस्त के अंक नमस्ते सामना में प्रकाशित पाठकों की रचनाएं

मुस्कुराइए आप भारतीय हैं
हमारे-आपके आस की डोर,
चंद्रायान-३ उड़ चला चांद की ओर।
हर दिल में घर कर गया,
चंद्रायान-३ सबको एक कर गया।
१४० क‌रोड़ भारतीय,
मुस्कुरा रहे हैं आज माननीय।
वैâलेंडर की `२३ अगस्त’ तारीख पर,
नजरें टिकी हैं सबकी अब वहीं पर।
एक-एक पल की खबर रख रहे,
चंद्रायान-३ की शुभ-यात्रा की दुआ कर रहे।
सारे जग ने की हौसला अफजाई,
यहां तक कि पाकिस्तान से भी बधाई आई।
`इसरो’ की सबने है पीठ थपथपाई,
हम-आप भी दे रहे हैं बधाई।
जिस चंद्रमा पर दूर से ही सबका हक था,
जिसकी खूबसूरती का `किताबों-कविताओं’
में ही जिक्र था।
३,८४,४०० कि.मी. की दूरी तय कर,
उस को छू लेना अंतरिक्ष में करीब पंहुचकर।
आज एक मानवीय सच्चाई है,
कोशिश यह मानव की करिश्माई है।
तिरंगे की इतनी ऊंची शान पर,
हर भारतवासी है आज सातवें आसमान पर।
– पंकज गुप्ता, मुंबई

मणिपुर
द्रौपदी भीड़ में है नग्न हमारी
कौरव कुल करता यह नर्तन है
सत्ता की मौन साधना करता
धृतराष्ट्र बांध आंखों पर पट्टी
मध्यसभा में बिखल रहीं द्रौपदी
क्या सब गूंगे-बहरे और अंधे हैं
कुल श्रेष्ठ पितामह, आचार्य द्रोण
सब हारे हैं बेचारे बन मौन खड़े
दुर्योधन का दंभ करता अट्टहास
मर्यादा का यह सब वैâसा परिहास
दुशासन खुद को अजेय समझता है
देखो कपटी शकुनी की चालों में
पांडवों का बल भी गिरवी रखा है
कपटी मामा की चौसर चालों पर
धर्म और कर्म के द्वंद्व में उलझा
धर्मराज का न्याय भी न सुलझा
अर्जुन फिर तू क्या अब आएगा
लाज बचाने गांडीव तू लाएगा
शायद द्वापर अब तो बीत गया
कलयुग में तो कृष्ण नहीं आएगा
– प्रभुनाथ शुक्ल

आओ मिलकर
पेड़ लगाएं
आओ हम सब मिलकर पेड़ लगाएं
वसुंधरा को प्रदूषित होने से बचाएं
खाद, पानी देकर आओ हरा-भरा इसे बनाएं
फल, फूल, हवा मिलेंगे, न देखो इनको गिराएं
सूर्य निकलते ही शीतल हवा इनसे पाएं
पत्तों की आहट से पंक्षी भी मधुर गीत गाएं
खुशबू कुसुम की चहु ओर हवा में पैâलाएं
पंक्षी भी नित नए नीड हरदम इस पर बनाएं
वर्षा, धूप से वृक्ष की ओट में मानव भी छिप जाएं
दवा,मेज,पलंग हमें पेड़ से ही मिल जाएं
आओ हम सब मिलकर पेड़ लगाएं
डॉ. निशा सतीश चंद्र मिश्रा, मीरा रोड

इंसानियत छोड़ रहा इंसान
इंसानियत छोड़ रहा यह क्यों इंसान
फितरत छोड़के, बन रहा क्यों हैवान।
दर-दर ठोकरें खा रहा है यहां इंसान
इंसान तो इंसान, दर्द भी है हलाकान।
दर्द से चीखता और कराहता इंसान
आंखें रो रही हैं पर जुबां है बेजुबान।
हो गए हैं अब मूक दर्शक यह इंसान
नीति-नियति से, शून्य हो गई जहान।
कितना दर्द झेलेगा और सहेगा इंसान
यहां तो ये आंखें गड़ाए बैठा है शैतान।
क्यों बन गया है अब बेबस यह इंसान
कितनी लूटी जाएगी ये अस्मत ईमान।
दुष्ट-दुराचारियों की भेंट चढ़ता इंसान
खत्म हुई इंसानियत, जा रही है जान।
– अशोक पटेल ‘आशु’ (छत्तीसगढ़)

चलना
चलो जरूर चलो
बीच में नहीं दाएं या बाएं
दाएं चलना गैरकानूनी है
अपराध है इसलिए बाएं चलो
निश्चिंत रहो और सुरक्षित भी
यह वह रास्ता है जहां चलना
इंसानियत है और वक्त की जरूरत भी
जिसपर टिका है हमारा भविष्य
हमारा जीवन जो जाता है
खुशहाली की ओर गीत गाते हुए सदैव
– अन्वेषी

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