मुख्यपृष्ठनमस्ते सामना5 अगस्त के अंक नमस्ते सामना में प्रकाशित पाठकों की रचनाएं

5 अगस्त के अंक नमस्ते सामना में प्रकाशित पाठकों की रचनाएं

बेरंग है ये दुनिया
बेरंग है ये दुनिया बेरंग हैं हम सभी
कोई किसी को जानता नहीं यहां
क्या है कोई माजरा तल्खकामी-सी
जो टिके नहीं ख्वाब किसी के यहां
क्या डर थे साखों से उसके पेड़ों से
या खून के रिश्ते अजीब दिखे यहां
क्यूं शख्स उकता हैं हर कोई यहां
इंसानियत को बर्बाद करके छुपाता है
जानवर के खाल को लिबास बताता है
इश्क के कोई निशां तक नहीं
वैâसा अजीब है ये दर्द जो बेरंग हो चलें
हम भी किसी के थे कल आज संग हो चलें
अब तो मतलब से दिल नहीं किसी के दरमियां
खोई हुई चीज है यहां सभी खोए हुए लोग हैं
दो टूक बातें भी सरकाएं तो कहां, वैâसे भी
जो मकान राख हैं और आंखों में पट्टियां
कोई वैâसे बुलाएं हमें, सभी तो चुप हैं
राग गुमशुदा है तो ईमान चुप है
भोले-भाले चेहरे यहां हैं अपनों से दूर
तो यहां के हर उम्मीद के अंदाज चुप है
मिलाऊं किससे नजर बुलाऊं वैâसे यहां
जो बेमानियों के चेहरे पर गर्दिश है उड़े
किसी के डगमगाते पांव यहां,
कोई बेड़ियां उधेड़ चल पड़े
सब अपने लिए हैं यहां
– मनोज कुमार, गोंडा, उ.प्र.

झूठ की कलई खुल रही है,
सच्चाई बाहर निकल रही है,
नफरतों के साए में आज भी,
वो देखो मुहब्बत पल रही है!
-राशिद मुरादाबादी

शिव नाच रहे
डमरू बजा डम डमक डम डम
शिव नाच रहे छम छमक छम छम
शिखर पर चांद की मटकी
लटों में गंगा हैं लटकी
गले में सर्पों की माला
कटि पर बाघंबरी अटकी
त्रिशूल ले चम चमक चम चम
शिव नाच रहे छम छमक छम छम
भरकर भभूत भर झोली
चल पड़ी अड़भंगी टोली
नंदी बैल पर चढ़े शंभू
नहीं रथ पर नहीं डोली
कर रहे सब बम बमक बम बम
शिव नाच रहे छम छमक छम छम
करके ब्याह वैâलाशपति
बनेंगे पार्वती के पति
ठिठक देखेगा ब्रह्मांड
रुकेगी काल की भी गति
बरसे मेघ झम झमक झम झम
शिव नाच रहे छम छमक छम छम
– डॉ. एमडी सिंह

वृक्ष बचाओ
विश्व बचाओ
जग ने जिसको दुःख दिए है
किया अपनो ने भी तिरस्कार,
उसको भी तो वृक्षों ने सदा ही
दिया सुंदर पुष्पों का उपहार!
-डॉ. मुकेश गौतम, वरिष्ठ कवि

करें प्रकृति का संरक्षण
घुटन में सबका जीवन है, दुनिया में प्रदूषण,
बच्चों से भी अधिक जरूरी, धरती मां का आभूषण,
आओ अब आदत में डालें, पेड़ लगाएं और दूर करें प्रदूषण,
प्रकृति का सौंदर्य सजाएं, हो पर्यावरण का रक्षण,
जीव-जंतु भी नहीं दिखते अब पेड़ ही थे प्रतिरक्षण,
पेड़ काट कर छीना हमने चहचहाते वो भूषण,
फलों घास की खातिर पक्षी-जंतु रहते भूखे भक्षण?
असंतुलन प्रकृति का हुआ, बंद हुए बरसा-वर्षण,
बंद करो प्रदूषण, करो पर्यावरण संरक्षण,
ना काटो पेड़ों को, जीव-जंतुओं का करो रक्षण,
इससे मानव जीवन के सांसों का अभिरक्षण,
धरती मां की पूजा कर, लौटा दो प्रेम आकर्षण!
संकल्प हमारा यही रहे, हो प्रकृति का संरक्षण
मानव जीवन तभी बचेगा मिटेगा जब प्रदूषण!
न भूगोल-इतिहास बचेगा, बंद करो धरा का शोषण!
प्रकृति की हरियाली मे छिपा है, मानव जीवन का पोषण!
– संजय सिंह `चन्दन’

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