मुख्यपृष्ठनमस्ते सामना27 अगस्त के अंक `नमस्ते सामना' में प्रकाशित पाठकों की रचनाएं

27 अगस्त के अंक `नमस्ते सामना’ में प्रकाशित पाठकों की रचनाएं

बने हुए हैं खास
गांवों में जो परधानों के,
बने हुए हैं खास।
बंजर में वो काट रहें हैं,
मनरेगा की घास।
चकरोटों से तालाबों तक,
हुई योजना पूरी,
चच्चा चाची भईया भौजी,
सबकी बनी मजूरी,
सबके विश्वासों के दम पर,
सबका हुआ विकास,
गांवों में जो परधानों…
नहीं पढ़े दसवीं से आगे,
बैठे थे बेकार,
होनहार बिरवान वही अब
हो गए ठेकेदार,
दो सौ तीस लिखे कागज पर,
देते मगर पचास,
गांवों में जो परधानों…
भ्रष्टाचार मुक्त हो भारत
लिखें जहां पर नारे,
उसी जगह पर जनसेवक,
बैठे हैं हाथ पसारे,
बोतल से गिरते गांधीजी,
चटके वहीं गिलास,
गांवों में जो परधानों…
– एड. राजीव मिश्र, मुंबई

जिंदगी ढूंढ लें
बहुत जी लिए जिंदगी इन आंसुओं में
चलो निकलकर एक नई खुशी ढूंढ लें
क्या पता कल जिंदगी रहेगी कि नहीं
जहां गम न हो एक नई जिंदगी ढूंढ ले
बहुत जी लिए जिंदगी इन आंसुओं में
चलो निकलकर एक नई खुशी ढूंढ लें
गम-ए-जिंदगी न हो वहां लेकर चल
जहां गम-ए-तन्हाई न हो वो जिंदगी ढूंढ लें
जहां पर खुशी ही खुशी बरसती है
वहां पर मौजूद न रहे कोई आशियाना ढूंढ लें
बहुत जी लिए जिंदगी इन आंसुओं में
चलो निकलकर एक नई खुशी ढूंढ लें
जहां पर कोई परछाईं पीछा न करती है
जहां मोहब्बत की बारिश वो जिंदगी ढूंढ लें
जहां गम-ए-तन्हाई पीछा न करे वो खुशी ढूंढ लें
जहां गम न हो एक नई कहानी ढूंढ लें
बहुत जी लिए जिंदगी इन आंसुओं में
चलो निकलकर एक नई खुशी ढूंढ लें
– जयप्रकाश सोनकर

मानवीय बिंब
मानवता का बिंब धराशायी
तांडव नृत्य करते आततायी
भाई-चारा बिलकुल गायब
दुनिया स्वार्थ का अजायब
जब मन में छाई घोर उदासी
हर कोई विलासिता की दासी
सुख की इच्छा में हृदय भारी
भई! भोग की वस्तु नहीं नारी
वासनाओं के बीहड़ में खोया
तभी तो मानव दु:ख से रोया
विषपायी फुफकार शब्द तेरा
हुआ भीतर से मन आहत मेरा
– सूर्यदीप कुशवाहा, वाराणसी

रिश्ते
रिश्ते निभाना चाहता है
खुद को आजमाना चाहता है
यकीनन सच बताना चाहता है।।
किसी को समझाने जा रहा है
अपना दिल जलाना चाहता है।।
तुम शहर भर में मुनादी करा दो
एक आदमी मुस्कुराना चाहता है।।
आईना साथ लेकर घूमता है
जान की बाजी लगाना चाहता है।।
रिश्तों में गलतफहमियां ठीक नहीं
यार रूठा है मनाना चाहता है।।
हंसी होंठों पे हरदम खेलती है
हंस के आंसू छिपाना चाहता है।।
जमीर गवारा नहीं करता फिर भी
उमेश रिश्ते निभाना चाहता है।।
– डॉ. उमेश चन्द्र शुक्ल

रोम एक शहर नहीं
नीरो एक शासक नहीं
बांसुरी एक वाद्य नहीं
जलना एक क्रिया नहीं
ये सब एक कहानी के हिस्से हैं
कहानियां मरती नहीं
रूप बदल बदलकर
विभिन्न देश-काल में
अवतरित होती रहती हैं
दुनिया का कोई मुल्क़ नहीं
जहां यह कहानी दुहराई न गई हो
बदलते हैं सिर्फ किस्सागो
और बदल जाते हैं
कहानियां सुननेवाले
हुंकारी भरनेवाले
रोम उसी तरह जलता है
चीखें खला में खो जाती हैं
मांस जलने की गंध
अफवाहों के इत्र में
दबा दी जाती हैं
नए आकर्षक खूबसूरत लिबास में
मंद मंद मुस्कुराता नीरो
खो जाता है
बेसुरी बांसुरी की मधुर तान में
राख झाड़कर किस्सागो चल देता है
किसी और शहर की ओर
सुनने वाले शुक्रिया अदा करते हैं
परवरदिगार का कि वे रोम में नहीं रहते
पर वे भोले-भाले लोग नहीं जानते कि
रोम कोई एक शहर नहीं…
– हूबनाथ

वृक्ष बचाओ
विश्व बचाओ
गरीब-अमीर, छोटा या बड़ा
दुकानदार हो या कि संत,
बिना भेद सबके जीवन में
वृक्ष हमेशा लाते हैं वसंत!
-डॉ. मुकेश गौतम, वरिष्ठ कवि

तभी नई पौध आएगी
खिलें पुष्प मुरझाएं, सूख के बिखर जाएं
जा मिलें मिट्टी में तभी नई पौध आएगी
यही पौध पल्लवित व पुष्पित होकर के पुन:
बसंती बयार संग, बगिया महकाएगी
कूंकेगी कोयलिया तभी, प्रमुदित प्रफुल्लित हो
भंवरों की टोली मिलन राग गुनगुनाएगी
आएगी बहार, प्यार की बयार संग लिए
धरती को चहुंदिश अलंकृत कर जाएगी
ऐसी छटा मनमोहक नयनों को सुहाएगी
जिनके नहीं नयन होंगे उन्हें कैसे भाएगी
बिना त्याग, साधना सफल कैसे होगी प्यारे
त्यागे बीज जीवन तभी फसल लहलहाएगी
– शिब्बू गाजीपुरी

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