मुख्यपृष्ठनमस्ते सामना18 अगस्त के अंक नमस्ते सामना में प्रकाशित पाठकों की रचनाएं

18 अगस्त के अंक नमस्ते सामना में प्रकाशित पाठकों की रचनाएं

कल, आज और कल
भोर होते ही,
पक्षियों की चहचहाहट के साथ,
आंख खुलते ही,सोचने लगा
आज क्या करे,
तभी गली से निकलते पाव वाले ने
आवाज लगाई, पाव लेलो पाव
वो कह रहा था, कल नहीं
आज का ताजा पाव है,
उसकी आवाज और शब्दों ने,
मुझे पूर्णत: जगा दिया,
मैं मन ही मन सोचने लगा
वाह क्या फर्क है,
कल और आज में,
वो आज का पाव कहते,
अगली गली में मुड़ गया
और मुझे शायद ये कह गया
यारा आज के समक्ष कल
बेमूल्य होता है।
हां उसमें अनुभव का रस
जरूर होता है।
तभी मेरे मन ने कहा चल
आज के आसमान में
परिंदों की भांति,
अपने लक्ष्य को पाने,
हौसलों के पंख लगा
उड़ान तो भर, फिर देख
उस दौरान तेरी सच्ची लगन का
सुखद होगा प्रतिफल,
तू कोशिश तो कर
इंतजार कर तेरा, आनेवाला कल
– पूरन ठाकुर
`जबलपुरी’, कल्याण

चरित्र
चरित्र इंसान का
विचित्र हो चला है,
ईश्वर के वजूद पर तो
करता है संदेह,
किंतु इंसान में
इंसानियत की
गैर मौजूदगी पर,
मौन हो रहा है।
बेशर्मी रगों में
मचल गई चहुंओर,
लालच और द्वेष
पनप रहा मानस में,
दिखावे की खातिर,
मचाये वो भी शोर,
स्वयं चक्रव्यूह में
उलझा सा है।
दुख कहनेवाले तो
मिल जाते यहां,
दौर कुछ आया
खुदगर्जी का भयावह,
दुख कोई बांट सके
वो मिलना तो आज,
नामुमकिन सा हो चला है।
अपनी है डफली सबकी
अपना अपना है राग,
परोपकार का हुआ
अभाव इस कदर,
कर्तव्य से विमुख,
स्वार्थ में खोया मानव,
बेपरवाह रवैये से उसके
डूब रही तभी तो नैया।
– मुनीष भाटिया, मोहाली

नए दौर की नई कहानी
रोता है ईमान
कितना गिरा हुआ इंसान।।
बाहर से खुद्दारी दिखती
पर अंदर गद्दारी है।
देशभक्त अपने को कहते
अंदर लूटा-मारी है।
भूल गए ईमान-धरम और
भूल गए भगवान।
कितना गिरा हुआ इंसान।।
राजनीति के स्वार्थ भंवर में,
आज फंसी है नइया।
कर दो प्रभु अब पार इसे,
दिखता नहीं खेवइया।
खाते खुद काजू-बादाम पर
जनता हुई कंगाल,
कितना गिरा हुआ इंसान।।
भूल गए बापू का भजन,
और भूल गए सब ज्ञान।
गर पढ़ लेते अच्छे से गीता और कुरान,
दुनिया फिर से हार मानकर कहती जय जय हिंदुस्तान।
कितना गिरा हुआ इंसान।।
संवेदनता शून्य हो गई,
बेटी-बहू लाचार।
बीच सड़क दुर्योधन का,
होता अत्याचार।
कहां गया गांडीव पार्थ का,
कहां कृष्ण का ज्ञान।
चीरहरण रोकने दयानिधि
ले लो फिर अवतार।।
कितना गिरा हुआ इंसान।।
– सुरेश चंद्र मिश्रा, जौनपुरी

हाय महंगाई
हाय महंगाई,
तुझे लाज न आई।
हर तरफ वैâसी यह आग ‌है लगाई,
जल रहा आम आदमी है दुहाई।
रोटी-कपड़ा-मकान छू रहे एक नई ऊंचाई,
घर-घर तूने आग है यह वैâसी जलाई।
बच्चों का पेट वैâसे भरें पूछ रही है लुगाई।
खाली है फिर आज उसकी रसोई,
चिंता में रात भर न मैं और न वो सोई।
आंसू भरे थे आंखों में
पर गनीमत है कि वह नहीं रोई,
आज का दिन देखो शायद कुछ कमाल हो जाए
शाम तक अगर कमाई कुछ अच्छी हो जाए
यह वैâसी कमर-तोड़ महंगाई।
`आलू-प्याज-टमाटर’
हर घर बांटो भाई,
आम आदमी तभी मुस्काई।
– पंकज गुप्ता, मुंबई

दिल का हाल
दिल का सब हाल हम उनसे कह बैठे
जिन्होंने हर बात हमसे छिपाई
सच मैं भी था, सच तुम भी थे
फिर क्यूं हर एक सच पर देते थे तुम सफाई
कुछ ऐसा भी गुजरा है
मेरे दिल के साथ ऐ `रवि’
ये उनकी दोस्ती का दम भरता रहा
जिन्होंने आखिरी दम तक दुश्मनी निभाई!
– डॉ़ रवींद्र कुमार

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