मुख्यपृष्ठनमस्ते सामना19 अगस्त के अंक नमस्ते सामना में प्रकाशित पाठकों की रचनाएं

19 अगस्त के अंक नमस्ते सामना में प्रकाशित पाठकों की रचनाएं

`मां की रसोई’
`चिकन करी’ बनी `चूहा करी’,
मुंबई के एक होटल ने हद करी।
न कुक ने देखा, न वेटर ने देखा।
`तले-पके’ चूहे को,
थाली में कस्टमर ने देखा।
अफरा-तफरी फौरन मची,
बात पुलिस तक जा पहुंची।
आरोप-प्रत्यारोप अब जारी है,
मामला संगीन है, जांच जारी है।
मां के हाथ की रसोई,
भूला है आज हर कोई।
तड़क-भड़क के पीछे भाग रहा हर कोई,
वैâसे फिर इन मंहगे रेस्तरांओं में इतनी सस्ती घटना हुई, जवाब है कोई।
-पंकज गुप्ता, मुंबई

बतियाना सीखो
खुद से ही बतियाना सीखो।
मन को बड़ा बनाना सीखो।।
सोचो-समझो सोचो-समझो।
गहराई में जाना सीखो।।
समय सांस लेता है हरदम।
उसका मान बढ़ाना सीखो।।
चलना रुकना और समझना।
आपस में बतियाना सीखो।।
सही आदमी कहां मिलेगा।
इस पर नजर गड़ाना सीखो।।
राजनीति जो देख रहे हो।
उसका सत्य बताना सीखो।।
भारत माता के सीने से।
सारा कर्ज हटाना सीखो।।
मौसम की रफ्तार देखकर।
आगे कदम बढ़ाना सीखो।।
सद्विचार पैदा होते ही।
तुम जुनून तक जाना सीखो।।
जीवन में बैलेंस बनाकर।
गाना और बजाना सीखो।।
मौसम को अनुकूल बनाकर।
अपनी चाल बढ़ाना सीखो।।
सीयाराम मय इस दुनिया में।
मन ही मन मुस्काना सीखो।।
मायूसी वाले चेहरों से।
गम को जरा हटाना सीखो।।
जीवन के इस कठिन सफर में।
सुंदर राह बनाना सीखो।।
मंजिल पर जाने से पहले।
अपना यश पैâलाना सीखो।।
जाते-जाते इस दुनिया में।
कुछ प्रकाश पैâलाना सीखो।।
खुद से ही बतियाना सीखो।
मन को बड़ा बनाना सीखो।।
– अन्वेषी

मैं आस्तिक हूं नास्तिक सा
मैं आस्तिक हूं नास्तिक सा
मैं प्रभु के होने को उतना ही स्वीकारता हूं
जितना कि वे नकारते हैं
आदत कहो या दुर्भाग्य
मैं नहीं जा पाता एक लोटा जल चढ़ाने
पर हां, अंतर्मन से चढ़ा देता हूं
अनगिनत नदियों का जल
कर्पूर और मंदार पुष्प
अपने निर्धारित स्थान से टस से मस नहीं हो पाते
मैं होना चाहता हूं मगर मन नहीं
वो कहता है उनको इसकी क्या जरूरत
उन्हें तो सिर्फ भाव चाहिए
भाव तो कूट-कूट के भरा है मुझमें
मानों जैसे भक्कू में भूसा
आंख बंद करते ही आ जाते हैं सम्मुख
हां वही..
जिन्हें न मानते हुए भी, उनके न होने को मानते हैं… नास्तिक
असल बात यही है के उन्हें प्रमाण चाहिए होता है
माना… प्रभु के होने का प्रमाण चाहिए
किंतु न होने का प्रमाण????
बेजान दरवाजे पर जीवंत स्वास्तिक सा
मैं आस्तिक हूं नास्तिक सा
-सिद्धार्थ गोरखपुरी, गोरखपुर

वृक्ष बचाओ
विश्व बचाओ
भारत भू के सपूत महान
ए पी जे अब्दुल कलाम,
जानते थे वृक्षों का महत्त्व
करते थे इन्हें रोज प्रणाम!
-डॉ. मुकेश गौतम, वरिष्ठ कवि

खोने का डर
उसे खोने का डर है
मुझे रोने का डर है
ऐसी जिंदगी में ये
क्या-क्या खबर है
धूम भी कड़ी है ये
सूरज भी नरम हैं ये
चांद के चकोरी से वो
दूध की कटोरी से वो
ये इश्क के चट्टानों पर
खूब दर्द तरबतर हैं
वैâसे न देखूं उन आंखों को
आखिर होश गवां बैठा हूं
वो सोचते हैं जुदा न हो
दिल चाहता है खफा न हो
– मनोज कुमार, गोेंडा, उत्तर प्रदेश

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