मुख्यपृष्ठनमस्ते सामना20 अगस्त के अंक नमस्ते सामना में प्रकाशित पाठकों की रचनाएं

20 अगस्त के अंक नमस्ते सामना में प्रकाशित पाठकों की रचनाएं

मातृभूमि के रखवाले

हम मातृभूमि के रखवाले
इस पर जीना मरना जाने
यह जन्मभूमि हमारा है
हम भारत मां के राजदुलारे।।
ना किसी से डरने वाले
ना किसी से दब के रहनेवाले
शौर्य-वीरता देखकर
दंग रह जाते दुनिया वाले।।
यह प्यारा देश हमारा है
इसकी रक्षा का दायित्व हमारा है
अपने पथ से ना डिगने वाले
प्राणों से अपने खेलना जाने।।
दोस्ती, दुश्मनी हमारी दुनिया पहचाने
दिल के साथ दिमाग भी रखनेवाले
जंग युद्ध का हो या खेल का
हर मैदान को जीतना जाने।।
हर क्षेत्र में हमने अपना
कौशल, हुनर दिखाया है
रियो ओलंपिक हो या हॉकी, क्रिकेट
हर जगह भारत का मान बढ़ाया है
ज्ञान मंदिरों के विध्वंस के बावजूद
अपनी संस्कृति का वजूद बचाया है
नृत्य, कला, विज्ञान, टेक्नोलॉजी
हर क्षेत्र में भारत का परचम लहराया है।।
भारत पर हंसने वालों को
सच का आईना दिखाया है
अब सिर्फ धरती ही नहीं बल्कि
मंगल, चांद पर भी तिरंगा लहराया है।।
– पूजा पांडेय ‘गार्गी’, मुंबई

झूठी कथाएं
तुम लिखो झूठी कथाएं देश के अपकर्ष की!
मैं लिखूंगा सर्वदा समृद्धि, भारतवर्ष की।
तुम लिखो दुर्विध, दुखी संपूर्ण हिन्दुस्थान को।
विश्व में नीलाम कर दो देश के सम्मान को।
देश में संपन्नता तुमको कहीं दिखती नहीं?
वास्तविकता को तुम्हारी लेखनी लिखती नहीं?
हो रही बातें चतुर्दिक राष्ट्र के उत्कर्ष की!
मैं लिखूंगा सर्वदा समृद्धि, भारतवर्ष की।
सत्य है, उन्मादियों का जोर थोड़ा बढ़ रहा।
एक भारत ही नहीं संसार इनसे लड़ रहा।
क्रूरता जिनमें भरी सबको पता, वे कौन हैं?
देशद्रोही तूलिकाएं इस विषय पर मौन हैं।
हो रही शायद परीक्षा आज मेरे मर्ष की।
मैं लिखूंगा सर्वदा समृद्धि, भारतवर्ष की।
तुम लिखोगे देश में निर्दोष जनता मर रही।
भूख से मजबूर होकर आत्महत्या कर रही।
कुछ कहो! क्या सत्य है? तुम आज भूखे मर रहे?
यदि नहीं, तो स्वांग क्यों निज हीनता का कर रहे?
देशहित प्रज्ज्वलित मेरी एषणा संघर्ष की।
मैं लिखूंगा सर्वदा समृद्धि, भारतवर्ष की।
– संगम मिश्र ‘संगम’, गोरखपुर (उ.प्र.)

एक दिन
पत्थरों की दहलीज पर
ऐसे ही कटती रहीं
इंसानी नस्लें
कभी मुल्क
तो कभी
मजहब के नाम पर
तो एक रोज
बचेगें
सिर्फ कातिल
और बचेंगे
महल पत्थरों के
और लहूलुहान दहलीजें
– हूबनाथ

हमारी पहचान तिरंगा
हमारी आन बान शान है सम्मान तिरंगा
कोटि कोटि कंठों का अभिमान तिरंगा।।
गुजरात से बंगाल, कश्मीर से कन्याकुमारी
हिंदुस्तान की जमीं का है पहचान तिरंगा।।
मंगल, भगत, बिस्मिल, आजाद का जूनून
तिलक, लाला, वल्लभ, सावरकर तिरंगा।।
गांधी, मोती, नेहरू, लाल, इंदिरा की पहचान
नरसिंह, नरेंद्र कोटि कंठों की आवाज तिरंगा।।
नगराज हिमालय मुकुट, देवों का दुर्लभ देश,
सागर पखारता पांव, हमारी पहचान तिरंगा।।
लहरा रहा मगन है गगन सा लिए विस्तार
शहीदों की आन बान शान सम्मान तिरंगा।।
कोटि कोटि कंठों भुजाओं से सज्जित राष्ट्र
हमारी एकता अखंडता है विश्वास तिरंगा।।
वेदों की ऋचाएं गूंजती, दिनकर का पूरब है
विश्व बंधुत्व की आवाज है, नगराज तिरंगा।।
भारत कृष्ण, राम, भरत की जन्मभूमि है उमेश
बोलो जय हिंद, वंदेमातरम जयघोष तिरंगा।।
– डॉ. उमेश चंद्र शुक्ल

तस्वीर छोड़ जाऊंगा…
अपनों से मिले दर्द का, कफन ओढ़ जाऊंगा।
मुस्कुराती हुई तस्वीर, दीवारों पर छोड़ जाऊंगा।।
सौ दर्द दबाकर खुश रहने का अभिनय कर रहा मैं
पल में जिंदगी जी रहा तो पल में मर रहा मैं।
किसी की चाहत और मुहब्बत
तो किसी की साजिश की आग में जल रहा मैं।।
आज हूं तो चुभता सभी को कांटों सा
कल गुलाबों सी महक छोड़ जाऊंगा।
नासमझों ने अब तक समझा नहीं मुझे
बेजान सीने में कसक छोड़ जाऊंगा।।
थक-हार कर समझौता कर लिया मैंने
गम छुपाकर आखिर कब तक मुस्कराऊंगा।
अब और नहीं सह सकता बोझ जिंदगी का
ऐ मौत तुझसे मिलने जल्द ही आऊंगा।।
बहुत जल्द किसी की आंखों में आंसू
तो किसी चेहरे पर मुस्कान छोड़ जाऊंगा।
अपनों से मिले दर्द की, कफन ओढ़ जाऊंगा।
मुस्कुराती हुई तस्वीर, दीवारों पर छोड़ जाऊंगा।।
– विनोद कुमार ‘विक्की’, खगड़िया, बिहार

अनुशासन
जीवन में रखिए अनुशासन
विद्या अर्जन या सेवा में
या चाहे हो सामान्य जीवन
हर जगह जरूरी अनुशासन
नियम बनाकर जीवन जीना
संयम संग रहे अनुशासन
होता है सचमुच फलदायक
दोस्ती यारी भले करें खूब
पर रखे केवल अच्छी संगत
सच्चरित्र और सदाचार से
बने सार्थक अपना जीवन।
– नागेंद्रनाथ गुप्ता,
ठाणे (मुंबई)

वृक्ष बचाओ
विश्व बचाओ
प्रण करें सब मिल करके
बच्चे, युवा, अधेड़, वृद्ध,
एक भी वृक्ष कटने न देंगे
करेंगे वन-उपवन समृद्ध!
-डॉ. मुकेश गौतम, वरिष्ठ कवि

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