मुख्यपृष्ठनमस्ते सामना22 अगस्त के अंक नमस्ते सामना में प्रकाशित पाठकों की रचनाएं

22 अगस्त के अंक नमस्ते सामना में प्रकाशित पाठकों की रचनाएं

ख्वाबों में
मैंने तुमको ख्वाबों में आते-जाते देखा है
दिल ने मुझे बतलाया है तू किस्मत की रेखा है
ख्वाब में तुम आती हो जब-जब
चैन कहीं खो जाता है
क्या तुम मुझको बतलाओगी
क्या मुझको हो जाता है
मन मेरा भरता ही नहीं जी भर के तो परखा है
मैंने तुमको ख्वाबों में आते-जाते देखा है
दिल ने मुझे बतलाया है तू किस्मत की रेखा है
चाहे से भी नजर हटे ना
ऐसी सूरत तेरी है
अल्हड़ होकर मस्त निगाहें
करतीं तेरी फेरी हैं
देखो झांक के दिल में जरा उसमें एक झरोखा है
मैंने तुमको ख्वाबों में आते-जाते देखा है
दिल ने मुझे बतलाया है तू किस्मत की रेखा है
कौन हो तुम? और नाम है क्या?
जी चाहे तो बतलाना
मैं, मेरा तन-मन-दिल
सब चाहे तेरा हो जाना
मन न करे तो बतला देना किसने तुमको रोका है
मैंने तुमको ख्वाबों में आते-जाते देखा है
दिल ने मुझे बतलाया है तू किस्मत की रेखा है
– सिद्धार्थ गोरखपुरी

जीने की कला
एक दिन घर में बैठे-बैठे
जीने की कला का अर्थ
सोचने लगा।
तभी घर का सबसे छोटा बालक
संभलते-संभलते दौड़ कर आया
मेरी गोद में बैठ गया,
वो मुस्कुराकर मेरी ओर निहारने लगा
उसकी मुस्कुराहट देख, मुझे लगा
मेरे प्रश्न का उत्तर मिल गया।
शायद वो कह रहा था,
सकारात्मकता और मुस्कुराहट
जीवन की एक ऐसी सपाट राह है,
जिसमें कहीं-कहीं उदासी,
हताशा, हीनता और कंगाली जैसे
गति अवरोधक आते रहते हैं।
आप को एक राहगीर की भांति
इसे पार करना होगा।
– पूरन ठाकुर `जबलपुरी’, कल्याण

मेरे खामोश इरादे
रफ्ता-रफ्ता सांसें मेरी महक उठीं इन बागों में
ऐसा तब ही मुमकिन होता जब तुम होतीं बाहों में।
कभी `तन्हा’ मैं नहीं रहता तुम जो बसती यादों में
दिल की मल्लिका बनके `हमदम’ तुम जो सजती ख्वाबों में।
क्यों मैं `पगला’ झूमूं नाचूं औरों की बारातों में
आरजू तुझको पाने की, दिन में भी और रातों में।
तोहफे में, तेरे दिए फूल महक रहे किताबों में
खूशबू का मैं लुत्फ उठाऊंं तेरे किए उन वादों में।
बढ़ते कदम तेरे मंजिल तक रुक गए क्यों राहों में
तेरा ठिकाना और कहां है, बस जा मेरी निगाहों में।
`रस्म वस्म’ मैं कुछ न जानूं धोखा है रिवाजों में
एक हकीकत बनके आजा मेरे `खामोश इरादों में।’
– त्रिलोचन सिंह अरोरा

चंद्र-खिलौना
चंद्र खिलौना पाने की,
श्रीकृष्ण ने जब बाल हठ की,
मां यशोदा ने मनाने की,
कोशिशें अपनी तमाम कीं।
माखन के लालच की मां यशोदा की,
कोशिश भी कान्हा ने फौरन नाकाम की।
आंगन में लोट-पोट की,
मैय्या की नाक में दम किया।
थाली में चांद की,
छवि दिखलाने की।
तरकीब आखिरकार काम आई।
माखन न छूने की जिद की,
कन्हैया ने अपनी कसम की,
अंत में घोषणा की।
श्रीकृष्ण की ऐसी कथाएं,
मनमोहक अनंत लीलाएं।
आज तक अजर-अमर हैं,
`कृष्ण-भक्ति’ की सच्ची डगर हैं।
– पंकज गुप्ता मुंबई

प्यार तुम्हारा गहरा देखा
प्यार तुम्हारा गहरा देखा
पर दिल को अपने बहरा देखा
जब-जब सोचा सोचूं तुमको
जज्बातों पर मर्यादा का पहरा देखा।
वैसे तो सदियां बीत गई
बचपन की सखियां छूट गई
पर देख के तुमको एहसास हुआ
वक्त को हमने ठहरा देखा
सब खुश हैं सब सुख है
मौसम का जब बदला रुख है
फिर हरे-भरे उपवन में
एक कोना सहरा देखा
बालों में आई चांदी
बीत गई जिंदगानी आधी
पर झांका जब तेरी आंखों में
अपना रूप सुनहरा देखा
याचक बनकर जब आए तुम
रुक गए कदम बढ़ते-बढ़ते
मन की कुटिया के आगे
खिची हुई एक लक्ष्मण रेखा देखी।
– प्रज्ञा पांडेय मनु, वापी

अन्य समाचार