मुख्यपृष्ठनमस्ते सामना23 अगस्त के अंक नमस्ते सामना में प्रकाशित पाठकों की रचनाएं

23 अगस्त के अंक नमस्ते सामना में प्रकाशित पाठकों की रचनाएं

समय की बात
एक समय की बात है
हुई छोटी-सी मुलाकात है
नयनां हमारे भिड़े अवश्य
होंठों से निकली नहीं कोई बात है
साहस जुटा न पाई थी मैं
न ही उसने स्वर उचारा
मैं समझ गई कुछ कहना चाह रहा
पर कह नहीं पा रहा है
मैं भी कब कुछ बोल सकी थी
बात सच्ची है, सुन सखी री
तू ही बता तब मैं क्या करती
या तू होती तो तू क्या करती?
दिल गवाही देता रहा जी भर
रह-रहकर मैं रही दम भरती
`पहल’ करती भी तो वैâसे करती
समाज की पहरेदारी से रही डरती
तब मन को कुछ सूझा नहीं
बाद उसके भाया कोई दूजा नहीं
ढूंढ़ रही हैं `बेकल आंखें’ उस सूरत को
एक समय की बात सखी ये, हुई पुरानी
क्या पहचान पाऊंगी मैं अब उस मूरत को?
या वो ही मुझे तलाश पाएगा अभी कहीं?
वक्त गुजर गया यही बस सोचते-सोचते
साथ समय के खप गई खासी उमरिया
नसीब न हुआ मुझे वो `मेरा सांवरिया’
अब पछताए क्या कीजै सखी
एक समय की बात है, भूल नहीं पाई मैं
आज भी उस `क्षणभर की मुलाकात’ को
`वो स्वर्णिम स्मृति’ हृदय में
अब तक संजोये है रखी मैं
तुझसे ना कहूं तो किससे
`शेयर’ करूं सखी मैं… काश!!!
– त्रिलोचन सिंह अरोरा, नई मुंबई

मेरे बाद
मेरे बाद कौन तुम्हें चाहेगा
मेरे बाद कौन तुम्हें देखेगा
तुम लड़ोगी अपनों से
तुम खेलोगी अपनों से
कभी हंसोगी मेरे जज्बातों से
कभी इन तन्हाइयों में रो लोगी
मेरे बाद कौन तुम्हें चाहेगा
वादें भी याद रहेंगे,
ढूंढ़ोगी मुझे फिर कहीं न पाओगी
खोई-खोई सी रहोगी
– मनोज कुमार, गोंडा

जागो यारो
जागो और जगाओ यारो
भारत पर इतराओ यारो
प्रगतिशील है देश हमारा
इसको और बढ़ाओ यारो
पहन मुखौटा जो बैठे हैं
उनको मार भगाओ यारो
भारत को जो कोस रहे हैं
उनको धूल चटाओ यारो
जहर बांटते जो कविता में
उनको सबक सिखाओ यारो
जागो और जगाओ यारो
भारत पर इतराओ यारो
– एड. राजीव मिश्र, मुंबई

जहान
हिंदुस्तान अलग न पाकिस्तान,
ये तो बस प्यार का जहान है।
क्यूं धर्म के नाम पर लड़ना,
क्यूं खतरे में लानी जान है।
क्यूं किसी को कहना,
मैं हिंदू तू मुसलमान है।
ना राम अलग ना अल्लाह ना ईसा,
सब एक ही भगवान हैं।
क्यूं किसी को जाति के नाम पर नीचा दिखाना,
सबके कर्म ही महान हैं।
खुदा बना के इंसान,
खुद धर्म से अनजान है।
भाईचारे से जीवन में करो मंगल,
क्यूं बनाना मंगलयान है।
जो हिंदू में दिवाली,
वो ही मुस्लिम में रमजान है।
क्यूं किसी को ठेस पहुंचाना,
अच्छे रिश्ते बनाना ये ही इंसान की पहचान है।
वैसे तो कई कवि करते हैं कविता
पर ‘लिली’ की अलग ही शान है।
– के.के. लिली

वर्दी के वेश में
ये जंग है एलान की जो कर रहा हूं मैं
सौगंध है इस मिट्टी की जो लड़ रहा हूं मैं
बस एक ही अरमान है जीत हो मेरे देश की
मैं बढ़ चलूं थोड़ा लड़ चलूं वर्दी के वेश में
जला बहुत है दिल ये मेरा फिर भी चलेंगे सीना तान के
जब तक रहेगा दिल में वतन हम कहेंगे ये अभिमान से
वंदे मातरम वंदे मातरम वंदे मातरम जय हो
कुछ भी हो जंजीरे सौ मैं तोड़ के निकलूंगा
वादे हैं जो मेरी मां से ये तिरंगा मैं लहराऊंगा
बस एक ही जज्बा मेरी खुशबू रहे मेरे देश में
मैं बढ़ चलूं थोड़ा लड़ चलूं वर्दी के वेश में
ये अमन की डाली कभी झुकने नहीं देंगे
जब तक रहें सांसें मेरी मिटने नहीं देंगे
हम वो सिपाही हैं जो वतन के राही हैं
डरते नहीं गद्दार से जो खुद इलाही हैं
हम डरके क्यों हट जाएं ये जो साए हैं
ये जंग है एलान की जो कर रहा हूं मैं
सौगंध हैं इस मिट्टी की जो लड़ रहा हूं मैं
बस एक ही अरमान है जीत हो मेरे देश की
मैं बढ़ चलूं थोड़ा लड़ चलूं वर्दी के वेश में
– मनोज कुमार, गोंडा, उ.प्र.

कल सवेरा आएगा
ये भी बदल जाएगा, ये वक्त गुजर जाएगा
अंधेरा है आज तो क्या हुआ, कल सवेरा आएगा
कल का सूरज जिंदगी में नई रोशनी लाएगा
हौसले बुलंद रखना हारी बाजी जीत जाएगा
खोकर अपना पंख भी तू उड़ान भर पाएगा
ये भी बदल जाएगा, ये वक्त गुजर जाएगा
अंधेरा है आज तो क्या हुआ, कल सवेरा आएगा
रोते-रोते एक दिन तू मुस्कुराना सीख जाएगा
फिर हर काली-सी रात में चमकता सितारा पाएगा
नई रोशनी, नया सवेरा नई उम्मीद पाएगा
ये भी बदल जाएगा, ये वक्त गुजर जाएगा
अंधेरा है आज तो क्या हुआ, कल सवेरा आएगा
गिर कर परिंदा जमीन पर वापस पंख पैâलाएगा
हौसलों से उड़ान भर कर आसमान चूम जाएगा
ये भी बदल जाएगा, ये वक्त गुजर जाएगा
– संस्कार राजेश सिंह, मुंबई

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