मुख्यपृष्ठखबरें3 अगस्त के अंक नमस्ते सामना में प्रकाशित पाठकों की रचनाएं

3 अगस्त के अंक नमस्ते सामना में प्रकाशित पाठकों की रचनाएं

तुम मेरे हो शिव…
मेरे शिव तुम ही मेरे हो
यह दुनिया एक छलावा है
झूठी सांसों का चढ़ावा है
मन मंदिर के हर कोने में
तुम मेरे हो तुम मेरे हो
हर नजरों में कुछ स्वार्थ बसाए
हर चेहरे पर लकीरें हैं
किसको मानू, किसको जानू
मुझको न कोई जान सका
दिल की धड़कन के चितेरे हो
तुम मेरे हो…
सागर की गहराई में भी
लहरें हिचकोले लेती हैं
संशय की चोटे मिलती हैं
खूनों से लथपथ सीने में
जीवन ज्योति बिखेरे हो
मेरे शिव…
इस भूल-भुलैया दुनिया में
मैंने भी जीना चाहा है
हर रंग मिलाना चाहा है
चाहत ही मेरा सपना है
चाहत ही मेरा गहना है
हर राह में साथी तुम ही हो
मेरे शिव…
लेना मैंने सोचा न कभी
देने की चाह रही हर दम
देती ही रही देती ही गई
जब भी लेने की चाह उठी
बस दर्द मिले बस दर्द मिले
हर दर्द के जन्मेजय तुम ही
हर दर्द के कष्ट निवारक तुम ही
मेरे शिव…
– सत्यभामा सिंह,
कल्याण, मुंबई

सत्ता
एक दिन सपने में आकर
सत्ता ने मुझसे कहा
हे, मेरे देश के वोटर
देश में बेटियों के नाम पर
ये सब क्या चल रहा
हर दिन शब्दों की मर्यादा लांघ
देश के जनों के सम्मुख
ये राजनैतिक पार्टियां लगा रही
आरोप-प्रत्यारोपण की झड़ी
समाधान और निदान से दूर
अपने-अपने तर्कों पर अड़ी
मुझे तो लग रहा कि
मुझको पाने की लालच में
झूठ के निकट सत्य से परे
दिन-रात कोशिशें जारी हैं
वो देशसेवा थोड़ा नहीं चिंतित है
मैनें कहा आप बेप्रिâक रहें
हम भी निश्चिंत हैं
आप देखना
जब भी चुनाव आएंगे
झूठे मुंह की खाएंगे
हम सत्य, देशप्रेम सेवाभाव
व्यक्तित्व को आप तक पहुंचाएंगे
– पूरन ठाकुर `जबलपुरी’, कल्याण

काश रबड़ बन जाती
काश मैं रबड़ होती
जिंदगी की सारी गलतियां मिटा पाती
मेरे साथ जो हुआ उसे भुला पाती
लड़की होने के कारण समाज ने
जो कुछ भी गलत किया उसे मिटा पाती
जिंदगी को झिंझोड़कर रख देनेवाली घटनाएं
याद आते ही दर्द देते हैं
उन दर्दभरी यादों को मिटा पाती
काश मैं रबड़ होती
तो थोड़ा और नए से इसे लिख पाती
खुद को सचेत कर पाती
गलतियों के पहले रबड़ बनकर ही न
रबड़ की जरूरत असलियत में उन मासूम बच्चों को नहीं
हम बड़े लोगों को ज्यादा है
जिंदगी की गलतियां तो बस लगता है
एक पेन सा वादा है जिसे कभी मिटा नहीं सकते
पेंसिल तो मुझसे भी खुशकिस्मत है
कि गलतियां करके मिटा तो सकती है
आखिरकार हम इंसान हैं
ज्यादा से ज्यादा भुला सकते हैं
भूल को किंतु मिटा नहीं सकते
मुझे भी लोगों की मदद करनेवाला वही रबड़ बनना है
यहां संसार में जीना आसान नहीं
गम में भी हंसकर जीना पड़ता है
इसलिए यदि भगवान मुझसे मेरी एक इच्छा पूरी करने को कहें
तो कह दूंगी मुझे रबड़ बना दीजिए
इस जिंदगी को आसान बना दीजिए
जिससे मैं इंसानों में भरे इस घृणा, भेदभाव, द्वेष को मिटा सकूं
मुझसे काश मैं भी अपनी कापी रखती जिस पर
गलतियों को लिखते ही मिटा देती
क्यों मेरे भगवान मुझसे पूछते नहीं कि क्या चाहती हो बोलो
मैं झट से बोल देती एक छोटी सी तो इच्छा है
रबड़ बना दो मुझे
ये दुनिया कुछ खास नहीं भाती मुझे
वो सुकून वाली दुनिया दे दो मुझे
क्या मैं खुलकर कभी खुद के लिए भी जी पाऊंगी?
क्या मैं भी पेंसिल की तरह कभी साथी पाऊंगी
क्या मैं भी कभी रबड़ बन पाऊंगी
लोगों को एक नया अध्याय सीखा पाती
रबड़ बनकर ही मैं पेंसिल सा साथ निभा पाती
झूठ, अन्याय को दूर करके कुछ लग कर पाती
फिर भी क्यों नहीं मैं रबड़ बन पाती
यही सोचते-सोचते रोज शाम गुजर जाती
की काश मैं भी रबड़ बन पाती
मेरे तथा दुनिया के सारे माता-पिता के लिए श्रवण बन पाती
यदि मां-पिता दुखी होते तभी मैं रबड़ बन जाती
जीना नहीं छोड़ सकती भगवान की इस खूबसूरत दुनिया में
लेकिन क्या दरिंदे जीने देंगे
मुझे एक परिंदे की तरह समाज में
रोजमर्रा के इस अशांति से तो वो कोरा कागज ही अच्छा है
जो कुछ लिखा न होकर भी सुकून से जीता तो है
कौन कहता है कि हमारी जिंदगी आसान है
हर इंसान यहां कुछ न कुछ गम पिता तो है
पेंसिल जितनी भाग्यशाली नहीं मैं
बस रबड़ जितनी मददगार बनना चाहती हूं
काश मैं रबड़ बन पाती
– मनीषा जोशी, ठाणे

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