मुख्यपृष्ठनमस्ते सामना6 अगस्त के अंक नमस्ते सामना में प्रकाशित पाठकों की रचनाएं

6 अगस्त के अंक नमस्ते सामना में प्रकाशित पाठकों की रचनाएं

गांव का कुआं
अब तो मृतप्राय हो चला
जो सदियों तक जीता था
गांव का वो प्यारा सा कुआं
जहां हर कोई पानी पीता था
पैदल चलने वाले राही
देख कुआं रुक जाते थे
दस-बीस हाथ रस्सी खींचे
फिर शीतल जल को पाते थे
इसी कुएं पर पुरखे हमारे
सुबह चौपाल लगाते थे
अपने जमाने के किस्से को
बैठे जन को बतलाते थे
अब कुएं में न शीतल जल है
कूड़ा करकट है भरा हुआ
कुछ में मिट्टी मुहाने तक है
लगता है कुआं अब मरा-मरा
काश पुरखों की परम निशानी
अपने रूप में आ जाए
वर्षों से सूखे पड़े कुएं में
फिर से पानी आ जाए…
-सिद्धार्थ गोरखपुरी

दोस्ती
वक्त रहते थोड़ी-सी फिकर और कदर कर लो वरना ऐ दोस्ती,
भरी महफिल में भी,अकेला छोड़ जाएगी।
बारिश तो होगी पर भीगने का मन न होगा
मौसम तो हसीन होगा पर घूमने का मन न होगा
घर से तो रोज निकलोगे पर पैदल चलने का मन न होगा
ऑफिस में क्लासरूम नजर आएगा पर
बगल में आपका दोस्त न बैठा होगा।
पैसे तो बहुत होंगे पर खर्च करने के लम्हे गुजर जाएंगे
जी भर के जी लो इस पल को मेरे दोस्तों क्योंकि
जिंदगी इस पल को फिर न दोहराएंगी।
बिती बातें रह जाएंगी कहानी बनकर फिर
दोस्त याद आएंगे कभी मुस्कान तो कभी आंखों का पानी बनकर।
– शेजल यादव, नालासोपारा (पूर्व)

सवनवा
रिमझिम बरसेला सवनवा,
सखियां मारे लागली तनवा,
कहिया जाबू तू गवनवा,
हे बताई द ननदी।।
घरवां नाही मोर सजनवा,
दिल्ली गए खोजै कमवा,
अईहै तब जाबई गवनवा,
हम बताई भऊजी।।
पनिया बरसे घर अंगनवा,
नाही लागल अबहीं धनवा,
फूटल बाटल मोर करमवा,
का बताई ननदी।।
रुपिया नाही एको घरवा,
कैसे बनी फिर गहनवा,
का लेइ जाबू अपने संघवा,
तनी बताई दा ननदी।।
सासू मरिहै हमके तनवा,
नाही आए मोर बिरनवा,
नाही जाबै हम गवनवा,
हम बताई भौजी।।
– सत्यभामा सिंह

बातें…
जिसे झूठ भी
बोलने नहीं आता
वह हाहाकारी सत्य का
सामना वैâसे करेगा
वैâसे करेगा
मशालों के सामने खड़ा होकर
जलने से बचा लेने की बातें!
कैसे करेगा वह
सन-सन चल रहे पत्थरों से
शीश महल में बैठकर
कांच को टूट कर
बिखरने से बचा लेने की बातें!
जिसके गले में
प्रत्यावर्ती शब्दों की कर्कशता नहीं
वह विष-बुझे आवर्ती शब्द-बाणों से
कैसे करेगा मन को
आखेट होने से बचा लेने की बातें!
कहां गर्इं
जिनके दम पर
उसकी ताजपोशी हुई थी
झूठ के जादुई डोर में बंधी बातें!
– डॉ. एम.डी. सिंह

दीप जलाया जाए
चलो मिल-जुल कर इक दीप जलाया जाए
घना अंधेरा है दूर भगाया जाए
जो रास्ता दीन-ईमान तक ले जाता हो
राह भटकते को रास्ता दिखाया जाए
सद्कर्मों से महके शहर का हर कोना
अमन चैन की बस्ती फिर बसाया जाए
अमन चैन लुटा है क्यों समझने के लिए
अंधेरे को उजाले में बुलाया जाए
हमारे घर का चूल्हा अगर ठंडा हो
फिक्र तुम्हें ऐसा भाव जगाया जाए
झुलस रहा है क्यों कश्मीर से केरल तक
प्रभु श्रीराम के आदर्श जगाया जाए
एक होके भी हम बंटें हैं खानों में
दिल में एकता का भाव जगाया जाए
दिशाएं चुप हैं, हवा नाराज, खतरा है
ऐसे दौर में गैरत को जगाया जाए
ईमान के साथ खड़ा लिखता है उमेश
चलो करोड़ों कंठों को जगाया जाए
– डॉ. उमेश चंद्र शुक्ल

वृक्ष बचाओ
विश्व बचाओ
माना कड़वे होते बहुत
यहां अमराइयों के नीम,
बीमारी के समय ये ही तो
बन जाते हैं वैद्य-हकीम!
-डॉ. मुकेश गौतम, वरिष्ठ कवि

पुष्पों की सीख
कई पुष्प ऐसे देखे
जो उगते हैं पहाड़ों पर
कठोर सीने को चीरकर
खिलते हैं चट्टानों पर।।
चक्रवात भरे तूफान भी
इन्हें झुका न पाते हैं।।
सावन-भादों की बारिश भी
इन्हें बहा न पाती है।।
कठोर चट्टानों से उत्पत्ति इनकी
पर पुष्प अत्यंत कोमल हैं
जितनी तपती चट्टानें हैं
पुष्प उतने ही शीतल हैं।।
कई पुष्प ऐसे देखे
जो कांटों में खिला करते हैं
होते अत्यंत मनोहर हैं
पर कांटो से घिरे रहते हैं।।
कांटों में रहकर भी
ये चुभना नहीं जानते
कांटे जहां जख्म देते
फूल वही मरहम सा काम करते हैं।।
कांटो के बीच रहकर भी पुष्प
मुस्कुराना जानता है
बिन कांटे से बैर किए
खिलना संवरना जानता है।।
पुष्प की विनम्रता देख
कांटा भी मददगार बनता है
उसे तोड़ने आता माली तो
कई बार चुभता है।।
एक पुष्प ऐसा देखा
जो कीचड़ में खिला करता है
पर होता इतना सुहावन है कि
भंवरा उस पर विचरण करता है।।
सत्यपारखी पक्षी हंस
इसके पास ही निवास करता है
मंत्रमुग्ध करनेवाली खुशबू ऐसी
स्वर्ग का आभास होता है।।
कीचड़ में रहते हुए भी इसका
प्रभाव न पड़ता है
कीचड़ यदि इस पर गिर जाए तो
स्वयं फिसल गिर जाता है।।
कीचड़ को अशुद्ध मानकर
उसे तिरस्कृत करते हैं
कमल पुष्प इतना शुद्ध कि
ईश्वर को समर्पित करते हैं।।
– पूजा पांडेय ‘गार्गी’

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