मुख्यपृष्ठनमस्ते सामना30 जुलाई के अंक नमस्ते सामना में प्रकाशित पाठकों की रचनाएं

30 जुलाई के अंक नमस्ते सामना में प्रकाशित पाठकों की रचनाएं

महाराष्ट्र दुलारे हो
हे महाराष्ट्र के जननायक,
स्वागत शत बार तुम्हारा है।
ईश्वर तुमको दीर्घायु करे,
जन-जन ने यही पुकारा है।
तुम महाराष्ट्र के आराधक,
तुम हो जन-जन के पालक।
तुम्हें मुबारक जन्मदिवस हो,
तुम महाराष्ट्र दुलारे हो।
तुम डटे रहे तुम हटे नहीं,
तुम खड़े रहे, तुम झुके नहीं।
आए कितने और चले गए,
पर झंडा बुलंद तुम्हारा है।
जन-जन का है आशीष तुम्हें
तुम जन-जन के आधार बनो
जनता का विश्वास लिए
अनवरत बढ़ो, अनवरत चलो
जन्मदिवस के शुभअवसर पर
यह आशीष हमारा है।
– सुरेश चंद्र मिश्रा,
जौनपुरी

भारी बारिश का कहर
क्रोधित आसमान ने बनाया धरती को निशाना
उसका कहीं और नहीं था आना-जाना
उसकी नजर में यहीं पर था ठिकाना
वैâसा है भूमि का यह जमीर
काश इसे कोई बचा पाता
अंबर भी कहर नहीं ढह पाता
भारी बारिश आती है
उछल-उछल कर पानी बरसाती है
गांव तो गांव अब तो शहर वालों का भी हाल बुरा है
चारों तरफ बाढ़ का नजारा है
कोई काम पर वैâसे जाए
पैदल चलना भी मुश्किल है
पानी का कीड़ा न काट जाए
पेड़ कटे बिजली गुल रेल भी ठप पड़ी है
खेतों में फसलें रो रही हैं
उनको नष्ट होने से कौन बचाए
उनकी तो जान चली जाए
पक्षी तो आसमान में उड़-उड़ के थक गए हैं
उनके घोंसले भी टूट गए हैं
पशुओं का भी कोई ठिकाना नहीं
वो भी डर के मारे जान बचाएं
सारा जीवन उथल-पुथल हो जाए
– अन्नपूर्णा कौल, नोएडा

तुझे कैसे बताऊं?
मां, कैसे बताऊं तुझे कि क्या हाल है मेरा?
बिन बताए समझने वाली नहीं है,
इसीलिए शब्दों की तलाश में हैं दिल मेरा।
कभी-कभी बोझिल-सी तो कभी
तेरी सीख पर जिंदा है अस्तित्व मेरा।
तुझे कैसे बताऊं क्या हाल है मेरा?
ना गम का अहसास ना खुशी का अब,
साथ तेरे बिताए पलों पर अब बसेरा है मेरा।
ना दिन में चैन ना रात में आराम,
बस बेचैनियों पर अब पहरा है मेरा।
तुझे कैसे बताऊं क्या हाल है मेरा?
खुद में ही उलझती हूं और सुलझती हूं,
मेरी नादानियों पर अब समझदारी का घाव
गहरा है।
मां, तुझे कैसे बताऊं क्या हाल है मेरा?
– गायत्री शर्मा, कालेहर

वक्त गुजर जाएगा
ये भी बदल जाएगा ये वक्त गुजर जाएगा
अंधेरा है आज तो क्या हुआ कल सवेरा आएगा
कालका सूरज जिंदगी में नई रोशनी लाएगा
हौसले बुलंद रखना हारी बाजी जीत जाएगा
खोकर अपना पंख भी तू उड़ान भर पाएगा
ये भी बदल जाएगा ये वक्त गुजर जाएगा
अंधेरा है आज तो क्या हुआ कल सवेरा आएगा
रोते-रोते एक दिन तू मुस्कुराना सीख जाएगा
फिर हर काली सी रात में चमकता सितारा पाएगा
नई रोशनी नया सवेरा नई उम्मीद जाएगा
ये भी बदल जाएगा ये वक्त गुजर जाएगा
अंधेरा है आज तो क्या हुआ कल सवेरा आएगा
गिर पर परिंदा जमीन पर वापस पंख पैâलाएगा
हौसलों से उड़ान भर कर आसमान चूम जाएगा
ये भी बदल जाएगा ये वक्त गुजर जाएगा
– संस्कार राजेश सिंह

कजरी

लक्ष्मण कहां जानकी होइहैं
बड़ी बिकट अंधियरिया ना।।
उमड़ घुमड़ के बदरा बरसे
अवनी पेड़ पपीहा हरसे
तड़ तड़ तड़के गहन बिजुलिया
बड़ी विकट अंधियरिया ना।।
लक्ष्मण कहां जानकी होइहै
बड़ी विकट अंधियरिया ना।।
अशोक वृक्ष के नीचे,
सीता मैया की है बसेरा
त्रिजटा मातु सिया से बोले
मैया होने देहु सवेरा
हनुमत ऐहैं लेन खबरिया
बड़ी बिकट अंधियरिया ना
लक्ष्मण कहां जानकी…
ले कृपाण रावण तह आवा
भली-भांति सीता धमकावा
भय से भाग खड़ा भा देखि
सिया की टेढ़ी नजरिया ना।।
लक्ष्मण कहां जानकी हुइहैं
बड़ी विकट…
हुए द्रवित मारुति नंदन
देखि सिया का करुण रुदन
पहचान राम की खातिर
हनुमत छोड़े मुदरिया ना।।
लक्ष्मण कहां जानकी होइहैं
बड़ी विकट अंधियरिया ना
– सत्यभामा सिंह, कल्याण, मुंबई

वृक्ष बचाओ
विश्व बचाओ
हर प्राणी का दुख हरते ये
हर लेते ये सबके क्रंदन है,
सबकी सांसों के आधार वृक्षों
तुम्हे मेरे शत-शत वंदन है!
-डॉ. मुकेश गौतम, वरिष्ठ कवि

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