मुख्यपृष्ठधर्म विशेषसुकून और ऊर्जा देनेवाली कलाकृतियां!

सुकून और ऊर्जा देनेवाली कलाकृतियां!

पंकज तिवारी।  कला में लोक भावना के साथ जो बड़ा ही व्यापक है, जिसके लिए कलाकार की दृष्टि भी व्यापक होनी चाहिए। अपनी प्रस्तुति रखना बिल्कुल भी आसान नहीं है बल्कि लोक के साथ प्रस्तुत होने हेतु विषद ज्ञान और समझ का होना जरूरी होता है। लोक शब्द असीम है। लोक शब्द सभी के जेहन के बहुत ही करीब होता है। लोक के प्रति सभी में एक विशेष आकर्षण होता है, लोक से विलग रह पाना शायद आसान नहीं है। लोक से बहुत कुछ ध्वनित होता है और उसी में हमारी परंपराएं हैं। हमारे रीति-रिवाज हमारे संस्कार हैं। जन्म से लेकर मृत्यु तक के बीच तमाम अनुष्ठान हैं, जहां लोक रस भरा पड़ा है या कह सकते हैं कि भारतीय थाती में पग-पग पर लोक रस की खान है और सभी के पीछे कोई न कोई रहस्य। ये अलग बात है कि हम वहां तक पहुंच पाते हैं या नहीं। कलाकार अवधेश मिश्र जो कला दीर्घा, बिजूका, चाइल्डहूड, लय सहित अब बिजूका रिटर्न्स हेतु भी पहचाने जाते हैं, की पहुंच भारतीय थाती के लोक तक बड़े गहरे में है, जो लगभग सभी कृतियों में दिख जाती है। उनमें बचपन से ही भावों को संवेदनशीलता के साथ समझने का हुनर है, जो अब बड़े ही व्यापक स्तर पर है। अवधेश मिश्र के अनुसार ग्रामीण परंपरा में सामूहिकता का विकास होता है, वहां व्यक्तिगत विकास को जगह नहीं है। हालांकि अब समय बदला है और वहां की परिस्थितियां भी, पर गांव, गांव ही है। सामाजिक उत्सव जैसे माहौल में पले-बढ़े होने का असर ये रहा कि उनकी कृतियां सकारात्मक सोचवाली हैं, रंग चटकीले एवं सुखदाई हैं, सुकून और ऊर्जा देने वाले हैं साथ ही संदेश भी। कृतियां कई परतों में बनी हैं और सभी में अपने साथ पूर्णता का भान है। परत-दर-परत यात्रा के बाद ही कृतियों को पूर्णत: पढ़ा जा सकता है। दर्शक इस परतीय यात्रा में क्रमश: कृति के साथ जुड़ता चला जाता है और अपना बचपन, बचपन की शरारत, गांव, समाज सब कुछ पा जाता है, उसको लगता है कि मैं भी तो इसी का एक भाग हूं। दर्शकों का उनकी कृतियों से अधिक जुड़ाव का एक प्रमुख कारण ये भी है, जो उनकी विशेषता भी है। मिश्र की कृतियों में हेंगा, सुग्गा, हर, चकरी, कलसा, आम की पत्तियां, दीवारों पर लगे पंजों के निशान, हवन कुंड आदि जो किसी-न-किसी अनुष्ठान में विशेष रूप से अपनी उपस्थिति रखते हैं, संकेतों के रूप में ही सही पर स्पष्टत: कृतियों में दिख जाते हैं। वे कहते हैं कि इन सभी के माध्यम से मैं समाज की सकारात्मकता और जन कल्याण की भावनाओं को दिखाना चाहता हूं, आप जड़ से कटकर नभ में उड़ान भरने वालों से दुखी भी हैं, निज को खोकर सब कुछ प्राप्त कर लेना, सबकुछ खो देने के बराबर है या यूं कहें सब कुछ प्राप्त कर लेने का भ्रम मात्र, खैर वे नकारात्मकता में भी सकारात्मक होने की उम्मीद रखते हैं। रही बात बिजूका की तो वो समाज और सिस्टम पर कटाक्ष तो करता है पर अपने दायरे में रहकर, अतिक्रमण जैसे भावों के साथ नहीं। स्पष्ट और चटकीला रंग, समाज कल्याण की भावना वहां भी शेष है जबकि अब जो बिजूका है, जिसे बिजूका रिटर्न्स के नाम से पहचाना जाता है वो हमारे-आपके साथ घुल-मिल गया है, हमारा आपका हिस्सा बनकर हमारे-आपके बीच रह रहा है। बिजूका जिसका संबंध खेतों से है जहां पशु-पक्षियों को सिर्फ डराना होता था, जिसके साथ तमाम कहानियां हैं और जो अब उन तमाम कहानियों के साथ उनकी कृतियों में है, का नित नए रूपों में हाजिर होना, उनकी कृतियों के प्रासंगिकता को और मजबूत बनाता है और ये सब कुछ संभव हो सका है तो इसके पीछे उनके लगन और मेहनत का परिणाम है। हर दिन विश्वविद्यालय के क्रिया-कलापों के बाद चित्र सृजित करना, आलेख लिखना और तमाम जिम्मेदारियों के साथ खुद को एकदम फिट रखना मुश्किल भरा काम है और उससे भी अधिक मुश्किल कृतियों के सृजन में निरंतरता है, जिसको आप बराबर संभाल कर रखे हुए हैं। कृतियां देखने के बाद मन चहक उठता है, खिल उठता है उपवन भीतर का, जैसे शांत और उदासीन पड़े परिवेश में अचानक से बहार आ गई हो। कागज के झालर, जहाज और गुब्बारों का चटख रंगों में संयोजन देखकर क्षणिक ही सही एक नए सफर पर निकल जाना होता है, जिसे आज के भागमभाग वाले दौर में सभी मिस कर रहे हैं पर कर कुछ नहीं पा रहे हैं, काश कि कृतियों में बदलाव कर पाने का दमखम होता। खैर कला स्रोत आर्ट गैलरी लखनऊ में २६ मार्च से इन सभी कृतियों को देखा जा सकता है।

(लेखक ‘बखार’ कला पत्रिका के संपादक व कवि, कलाकार एवं कला समीक्षक हैं।)

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