मुख्यपृष्ठस्तंभअर्थार्थ: रेपो रेट स्थिर किश्त स्थिर!

अर्थार्थ: रेपो रेट स्थिर किश्त स्थिर!

पी. जायसवाल
मुंबई

रेपो रेट में बदलाव को साधारणतया महंगाई से लड़ने के टूल के रूप में प्रयोग किया जाता है, ऐसे में जब देश में टमाटर और दाल की महंगाई की खबरों के बीच रेपो रेट नहीं बढ़ता है तो आम आदमी जो लोन की किश्त भरता है, उसके लिए राहत की खबर होती है। इस बार मौद्रिक नीति समिति की बैठक में एक बार फिर से रेपो रेट को ६.५ प्रतिशत पर ही स्थिर रखने का पैâसला लिया गया। ऐसा लगातार तीसरी बार है कि जब मौद्रिक नीति समिति की बैठक में रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं किया गया है। इससे पहले भी दो बार अप्रैल और जून में हुई बैठक में रेपो रेट को स्थिर रखा गया था। गौरतलब है कि ६ सदस्य वाली एमपीसी के सामने रेपो रेट के अलावा ग्लोबल हालात, देश में बढ़ रही महंगाई, अर्थव्यवस्था इत्यादि जैसे तमाम मुद्दे थे। ऐसे में देश टकटकी लगाए बैठा था, जिस कारण आज की बैठक काफी महत्वपूर्ण थी। अब आम आदमी को कम से कम यह सुकून है कि उसके घर और गाड़ी के लोन की किश्त बढ़ने की फिलहाल कोई आशंका नहीं है।
रिजर्व बैंक ने इस बार वित्तीय वर्ष २०२४ के लिए भी महंगाई का अनुमान बढ़ाया है इसे ५.१ फीसदी से बढ़ाकर ५.४ फीसदी कर दिया है। हालांकि आरबीआई गवर्नर शक्तिकांत दास ने चेताया है कि असमान बारिश और सब्जियों की बढ़ती कीमतों के कारण जुलाई और अगस्त महीने में महंगाई बढ़ने की आशंका अभी भी बरकरार है। आपने अक्सर देखा होगा कि रिजर्व बैंक रेपो रेट को महंगाई से लड़ने के एक शक्तिशाली टूल के रूप में इस्तेमाल करती है। जब भी महंगाई बढ़ती है तो आरबीआई रेपो रेट बढ़ाकर अर्थव्यवस्था में नकदी प्रवाह को कम कर देता है ताकि मुद्रा स्फीति की दर धीमी हो जाए। मांग में कमी आए और महंगाई घट जाए। इसी तरह जब इकोनॉमी का बुरा दौर होता है तो ब्याज दर घटाकर बाजार में नगदी प्रवाह बढ़ाया जाता है। इस बार रेपो रेट स्थिर रखने के बाद भी शक्तिकांत दास का मानना है कि महंगाई को लेकर चिंता और अनिश्चितता अभी भी बरकरार रहेगी और यह वित्त वर्ष २०२३-२४ में ४ फीसदी के ऊपर रहेगी। पिछले जून में खुदरा महंगाई दर बढ़कर ४.८१ फीसदी पर आ गई थी जबकि मई में यह ४.२५ फीसदी थी। इसका प्रमुख कारण मानसूनी मौसम में असमान बारिश थी।
आपके मन में यह शंका आ रही होगी कि जब महंगाई बढ़ रही है या जब उन्होंने चेताया भी है तो रिजर्व बैंक ने रेपो रेट का चाबुक क्यों नहीं चलाया, तो इसके पीछे कारण है। पहला सरकार महंगाई रोकने के लिए रेपो रेट से इतर अन्य विकल्पों पर भी काम कर रही है। जैसे गैर बासमती चावल के निर्यात पर रोक लगा दिया गया है। मतलब देश में चावल का भरपूर स्टॉक होने के बावजूद सरकार भविष्य में या कभी भी कृत्रिम कारणों से भी चावल के दाम को पैनिक लेवल पर नहीं ले जाना चाहती है और वो भी तब जब चुनाव बहुत नजदीक हों। गैर बासमती चावल मध्यम वर्गों में ज्यादा खपत होता है और दूसरा आटे के आयात में आयात शुल्क में छूट की घोषणा। मतलब सरकार रेपो रेट के मोर्चे के अलावा चावल, आटे के साथ-साथ अन्य आयात निर्यात के मोर्चे पर काम कर इनमें बदलाव कर मूल्य को स्थिर या कम करना चाहती है ताकि महंगाई को काउंटर व बैलेंस किया जा सके तथा इन बेसिक चीजों का दाम कभी भी न बढ़े और किश्त भी न बढ़े। सरकार कुल मिलाकर इस मसले पर कई मोर्चों पर काम कर रही है। भारत सरकार ने जुलाई माह में चावल की कीमतों में तेजी को देखते हुए और आने वाले त्योहारी सीजन के दौरान घरेलू आपूर्ति को बढ़ावा देने और खुदरा कीमतों पर नियंत्रण रखने के लिए पिछले माह ही गैर-बासमती सफेद चावल के निर्यात पर प्रतिबंध लगाया है। देश से निर्यात होने वाले कुल चावल में गैर-बासमती सफेद चावल की हिस्सेदारी करीब २५ फीसदी है साल २०२२-२३ में चावल के कुल वैश्विक निर्यात में भारत का हिस्सा ४० प्रतिशत था। सरकार के पैâसले से चावल का निर्यात प्रभावित हो सकता है और गैर बासमती चावल के किसान उत्पादक भी प्रभावित होंगे। हालांकि इस कदम से देश में तो चावल की कीमत में गिरावट आएगी लेकिन दुनियाभर में चावल की कीमतों को लेकर हाहाकार मच सकता है क्योंकि भारत दुनिया में चावल का सबसे बड़ा निर्यातक देश है।
रूस यूक्रेन युद्ध के कारण गेंहू के मुद्दे पर दुनिया वैसे ही महंगाई जूझ रही थी ऐसे में भारत के इस कदम से यदि ग्लोबल लेवल पर चावल के भी दाम बढ़ने लगे तो भारत बहुत दिनों तक इसके चक्रीय प्रभाव से बच नहीं सकता। विदेशों के केंद्रीय बैंक खासकर के यूरोप और अमेरिका के केंद्रीय बैंक अपने यहां आई इस महंगाई से लड़ने के लिए फिर उसी संस्थागत टूल का इस्तेमाल करेंगे जिसे ब्याजदर कहते हैं। वह अपना ब्याजदर बढ़ाएंगे ताकि उनकी महंगाई नियंत्रित हो, फिर डॉलर एसेट बढ़ेगा, डॉलर निवेश फिर भारत से बाहर जाएगा। ऐसे में भारत इस चक्रीय प्रभाव से कितना बचता है यह देखना होगा। चूंकि चावल आटे एवं अन्य आयात निर्यात के निर्णय अभी लिए गए हैं, ऐसे में विश्व की महंगाई और इसके केंद्रीय बैंक क्या प्रतिक्रिया लेते हैं और उसकी प्रतिक्रिया में अपना रिजर्व बैंक क्या प्रतिक्रिया लेता है वह अगली मौद्रिक नीति के बैठक में पता चलेगा। फिलहाल तब तक के लिए आम आदमी राहत की सांस ले सकता है कि उसकी न तो किश्त बढ़ी और न कम से कम अब चावल आटे का दाम बढ़ने की सम्भावना है।
(लेखक वरिष्ठ अर्थशास्त्री व सामाजिक तथा राजनैतिक विश्लेषक हैं।)

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