मुख्यपृष्ठस्तंभइस्लाम की बात : गणतंत्र दिवस, संविधान और मुसलमान!

इस्लाम की बात : गणतंत्र दिवस, संविधान और मुसलमान!

सैयद सलमान
देश आज अपना ७४वां गणतंत्र दिवस मना रहा है। २६ जनवरी १९५० को देश का संविधान लागू किया गया था, उसी दिन से हर साल इस दिवस को मनाने की शुरुआत हुई थी। जब हिंदुस्थान को एक गणराज्य घोषित किया गया, तभी यह निर्णय लिया गया कि देश के हर नागरिक को कानून और लोक नैतिकता के आधार पर सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय मिलेगा। पद, अवसर और न्याय की समानता होगी। साथ ही विचार, भाषण, विश्वास, व्यवसाय, संघ निर्माण और कार्य की स्वतंत्रता मिलेगी। अल्पसंख्यक वर्ग, पिछड़ी जातियों और कबायली जातियों के हितों की रक्षा की समुचित व्यवस्था की जाएगी। देश में लोकतंत्र की यह सबसे खूबसूरत बात थी। जबकि धर्म के नाम पर तकनीकी रूप से अलग बने देश पाकिस्तान की आज हालत खस्ता है। राजनीतिक, सामाजिक, कूटनीतिक और आर्थिक मोर्चे पर वह पूरी तरह से विफल राष्ट्र है। इसका कारण यह है कि हमारे देश के विकास में हर वर्ग का बड़ा सहयोग और समर्पण मिलता रहा है। वैसे आजादी के बाद पाकिस्तान से इतर कई मुस्लिम देशों के साथ हिंदुस्थान के प्रगाढ़ रिश्ते रहे हैं। इस बार तो एक मुस्लिम देश मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सीसी गणतंत्र दिवस समारोह के मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित हैं। अब्देल फतेह अल-सीसी ऐसे समय में हिंदुस्थान की यात्रा पर हैं, जब हमारे देश में अलग-अलग विषयों के माध्यम से सांप्रदायिक माहौल को खराब करने की कोशिश हो रही है। माना जा रहा है कि देश के मौजूदा ध्रुवीकरण के माहौल में विपक्ष को मात देने की यह केंद्र सरकार के अगुआ नरेंद्र मोदी की एक सोची-समझी रणनीति है। इस बहाने वोटबैंक साधने का एक जुगाड़ भी कर लिया गया है।
खैर, जहां तक बात देश के गणतंत्र दिवस की है, तो हर कोई जानता है कि भारतीय संविधान के निर्माण में बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर की मुख्य भूमिका थी। उन्हें देश के संविधान निर्माता के तौर पर जाना जाता है। संविधान को तैयार करने में बाबासाहेब की मदद करनेवाली महान विभूतियों के बारे में भी काफी कुछ लोग जानते हैं। जो नहीं जानते उन्हें इस विषय में जानना चाहिए। यह अपनी जड़ों को जानने जैसा है। आजाद देश के संविधान निर्माण में अल्पसंख्यक वर्ग का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है। अल्पसंख्यक सदस्यों में मुस्लिम सदस्यों की संख्या ३०, ईसाइयों की ७, आंग्ल भारतीयों की ३, अनुसूचित जाति की ३३, अनुसूचित जनजाति की ५, सिखों की ५, पारसी १ तथा ३ नेपाली सदस्य थे। ये हमारे देश की विडंबना है कि इनमें से गिने-चुने लोगों के नाम याद किए जाते हैं। आज ट्रिपल तलाक, हिजाब जैसे मुद्दों में उलझा दी गई मुस्लिम महिलाओं सहित आमजन को शायद ही पता हो कि जिस संविधान सभा ने देश के संविधान का प्रारूप तैयार किया था, उस संविधान सभा में एक मुस्लिम महिला भी शामिल थीं, जिनका नाम था बेगम एजाज रसूल। वे संविधान सभा में अल्पसंख्यक अधिकारों के ड्राफ्टिंग कमेटी की सदस्य थीं। बेगम एजाज १९५२ में राज्यसभा के लिए भी चयनित हुई थीं और १९६९ से १९९० तक उत्तर प्रदेश की विधानसभा सदस्य भी रहीं। १९६७ से १९७१ के बीच बेगम एजाज रसूल सामाजिक कल्याण और अल्पसंख्यक मंत्री रहीं। उन्हें साल २००० में पद्मभूषण पुरस्कार से सम्मानित भी किया जा चुका है।
जब देश १९४७ में आजाद हुआ तब उसके सामने कई चुनौतियां थीं। ऐसे में धार्मिक स्वतंत्रता को बनाए रखना और अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा करना भी देश के लिए एक बड़ी चुनौती थी, क्योंकि धार्मिक आधार पर विभाजन ने इस मुद्दे को गरमा दिया था। संविधान सभा इस बात से पूरी तरह अवगत थी कि प्रत्येक व्यक्ति की धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यकों के समान अधिकारों की उपेक्षा नहीं की जानी चाहिए। इसलिए इन मुद्दों पर तार्किक चर्चा हुई और बेगम एजाज रसूल ने ही इस चर्चा की शुरुआत की थी। मसौदा समिति की एक सभा में अल्पसंख्यकों के अधिकार से संबंधित चर्चा के दौरान, बेगम एजाज रसूल ने मुसलमानों के लिए ‘अलग निर्वाचक मंडल’ होने के विचार का कड़ा विरोध किया था। इसके अलावा उन्होंने धर्म के आधार पर अल्पसंख्यकों को प्रस्तावित आरक्षण का भी विरोध किया था। इसके बदले उन्होंने अल्पसंख्यकों के लिए न्याय एवं समान अधिकार की गारंटी की मांग की थी। बेगम रसूल ने तब यह भी आशंका जताई थी कि अल्पसंख्यक समुदाय के लिए सीटों का आरक्षण ‘अलगाववाद और सांप्रदायिकता की भावना को जीवित रख सकता है’ और इस तरह के आरक्षण के प्रस्ताव को उन्होंने खारिज कर दिया था। जिस स्थिति में बेगम ने अपनी भूमिका को रखा था आज बस कल्पना भर की जा सकती है कि वह क्या दौर रहा होगा। आज के मुसलमानों को तो सब कुछ आसान लग रहा है।
इसी तरह आज दंगे-फसाद, आतंकवाद, नफरत और न जाने किस-किस तरह के विवादों में उलझे मुसलमानों को यह नहीं भूलना चाहिए कि वह खुद स्वतंत्रता संग्राम में मुस्लिम नेताओं, उलेमा और बुद्धिजीवियों के योगदान को पहचानने में विफल रहे हैं। आज के कुछ कट्टरपंथी सोच के मुसलमानों की हरकतों की वजह से अधिकांश मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानियों और शहीदों को गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस जैसे राष्ट्रीय कार्यक्रमों का जश्न मनाने के लिए आयोजित समारोहों के दौरान अनदेखा कर दिया जाता है। हालांकि, जरूरत इस बात की है कि प्रतिष्ठित मुस्लिम संगठनों के बुद्धिजीवी और रहनुमा अपने समाज के युवाओं को मुस्लिम समाज के स्वतंत्रता सेनानियों की खोई हुई महिमा और प्रतिष्ठा को बहाल करने के लिए मिलकर काम करें। जिन मुसलमानों ने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ संघर्ष में सर्वोच्च बलिदान दिया था और देश को आजादी दिलाने में अहम भूमिका निभाई थी, उनके बारे में नई पीढ़ी को अवगत कराएं। मुस्लिम युवाओं को आगे आने और उनकी राजनीतिक, सामाजिक या धार्मिक निष्ठा के बावजूद राष्ट्र निर्माण में सक्रिय होने के लिए प्रेरित करना आज वक्त की अहम जरूरत है। स्वतंत्रता-पूर्व स्वतंत्रता संग्राम में मुसलमानों की भूमिका को उजागर करने के इरादे से, मुस्लिम युवाओं को स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के अवसर पर विभिन्न प्रकार के कार्यक्रमों का आयोजन करना चाहिए जिसमें उनके समुदाय के गुमनाम नायकों के बलिदान पर प्रकाश डाला जा सके।
आज गणतंत्र दिवस के बहाने मुसलमानों को यह समझने की जरूरत है कि शुद्ध देशप्रेम असल इस्लाम की मांग है। खुदा और इस्‍लाम से सच्‍चा प्रेम अपने देश से प्रेम की मांग करता है। इस्लाम में अपने देश से प्रेम करने को ईमान का एक भाग बना दिया गया है। अगर एक सच्चा मुसलमान इस्लाम का सही अध्ययन करे तो अपने संबंधित देश के लिए वफादारी करने में सबसे उच्‍च स्‍तर पर पहुंचने का प्रयत्‍न करेगा, क्‍योंकि इस्लामी नजरिए से खुदा तक पहुंचने और उसका सानिध्‍य प्राप्‍त करने का यह भी एक माध्‍यम है। आज समूचा विश्व एक वैश्विक गांव बन चुका है। इंसान एक-दूसरे के काफी करीब आ गया है। सभी जातियों, धर्मों, सभ्यताओं और संस्कृतियों के लोग सभी देशों में पाए जाते हैं। यह स्थिति मांग करती है कि प्रत्‍येक देश के राजनीतिज्ञ उनकी भावनाओं और अहसासों को ध्यान में रखें तथा उनका सम्‍मान करें। एक आदर्श गणतंत्र का तकाजा है कि अन्‍याय और अत्‍याचार समाप्‍त करते हुए वास्‍तविक न्‍याय के लिए प्रयास किया जाए। पूर्व की भांति मुसलमानों को इस कार्य में शत-प्रतिशत सहयोग करना चाहिए। कई हमवतन भाई इस कार्य में सहयोग करते भी हैं, लेकिन वर्तमान में सोशल मीडिया पर कुकुरमुत्ते की तरह उग आई व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी ने दरारें बढ़ा दी हैं। इस दरार को पाटना भी एक चुनौती है।
गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।
(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक हैं। देश के प्रमुख प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)
(उपरोक्त आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। अखबार इससे सहमत हो यह जरूरी नहीं है।)

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