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रौबीलो राजस्थान : खुद माथै शोध

बुलाकी शर्मा राजस्थान

अ‍ेक जोध जवान घरै आयो अर आवतै ई म्हारै दंडवत धोक दीवी। चिमक’र म्हैं लारै सिरकग्यो। फेर बीं री बांवड़ी पकड़’र बीं नै ऊभो करियो। सवालू निजर बीं ऊपरां न्हाखी जणै बो वैâयो, ‘म्हैं शोधार्थी हूं सर, रिसर्च स्कॉलर। रिसर्च करण सारू आयो हूं।’
गलत नंबर डायल कर लिया भाईडे! इनै जावणो हो कॉलोनी रै सैक्टर नंबर-२ में रैवणिया डॉ. एम.के. सहिष्णु कनै। जिका विद्यार्थियां नै थोक रै भाव पीएचडी करावै। शोध रै ‘श’ रो जिवैâ नै ग्यान कोनी, बी रै नांव रै आगै ठरवैâ सूं ‘डॉक्टर’ री उपाधि दिरावण में बां नै महारत है। करो सेवा पावो मेवा। ज्यादा ‘सेवा-चाकरी’ करणियो शोधार्थी बेगो ‘डॉक्टर’ बण जावै अर जिको सेवा-चाकरी में गफलत करै बीं री डॉक्टरेट झोळा खावती रैवै।
बीं नै म्हैं समझायो, ‘रिसर्च रो धंधो डॉ. सहिष्णु करिया करै बेटा।’
‘सहिष्णु सर ई आप कनै भेजियो है सर।’ बो बोल्यो, ‘आप शर्मा सर ई हो नीं? स्टोरी वगैरा लिख्या करोनी?’
सहिष्णुजी इत्ता सहिष्णु कद पछै हुयग्या! मनोमन म्हैं थोक में लोकल यूनिवर्सिटियां खुलण री सरावणा करी। लोकल यूनिवर्सिटी हुवै जणै शोध निर्देशकां नै लोकल लेखकां नै शोध रो विषय बणावणो याद आवै। अबै लेखक रूप कीं गंभीर हुय’र सवाल करियो, ‘म्हारी किसी-किसी किताबां बांच राखी है?’
‘बांचणी छोड’र म्हैं ओजूं आपरी कोई किताब देखी ई कोनी सर।’ सतवादी हरिसचंदर बणनै बीं जवाब दियो।
‘दूजा लेखकां नै तो पढ़िया हुवैला?’
‘ना, सर।’ फेर ईमानदार जवाब।
‘फेर शोध करण री रुचि कियां जलमी?’
‘म्हारी रुचि शोध करण में नीं, पीएचडी डिग्री लेवण में है जिणसूं कॉलेज में लेक्चरशिप बेगी मिल सवैâ।’ खरो-खरो जवाब।
कीं सोचतो थको म्हैं पूछ्यो, ‘फेर म्हारै लेखन माथै शोध करण रो कियां तय करियो?’
‘म्हैं नीं सहिष्णु सर ई तय करियो है सर। शोध-वोध करणो म्हारै बस में कोनी सर, जणै बां आप रै लिटरेचर माथै रिसर्च करावण रो तय करियो। वैâयो वैâ आप माथै ओजूं कोई पीएचडी हुई कोनी जणै आपरो पूरो सैयोग रैसी।’
इत्तो वैâय’र बो कंप्यूटराइज कागज म्हारै साम्हीं धरतो बोल्यो, ‘ओ सिनॉप्सिस सहिष्णु सर त्यार करवा दियो है सर। अबै आपनै ई खुद माथै शोध करनै म्हनै देवणो है सर। आप सूं बढ़िया आप माथै दूजो कुण शोध कर सवैâ सर।’
प्रणाम कर’र शोधार्थी गयो परो अर म्हैं बा सिनॉप्सिस देख रैयो हूं।

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