मुख्यपृष्ठस्तंभरौबीलो राजस्थान : सावण सूखो ई रैयो सखी

रौबीलो राजस्थान : सावण सूखो ई रैयो सखी

बुलाकी शर्मा राजस्थान

‘साबजी परदेस सूं आया कोनी जणै बिरखा होवता थका ई म्हारो सावण सूखो ई चाल रैयो है सखी। अ‍ेकली रो ना मिंदर-देवरा जावण रो मन करै, ना घूमण-फिरण रो। साबजी अठै होवता तो म्हें मिलनै पिकनिक मनावता। गोठां करता। साबजी बिना सावण रो मजो ई नीं आय रैयो है सखी। थारा साबजी तो साथै है जणै थारो सावण सुरंगो बणियोड़ो है सखी।’
‘म्हारै सारू ना सावण सुरंगो होवै अर ना कोई दूजी रुत। जेठ-बैसाख हुवो वैâ सावण-भादवो, सगळी रितुवां इकरंगी ई है सखी। सावण में झमाझम बिरखा बरसै वैâ गरम लूवां चालै, म्हारै सारू इकसार ई है सखी।’
‘इयां कियां वैâवै सखी! सावण री रुत ई निरवाळी हुवै। आपरै साबजी साथै घूमण-फिरण रो मजो ई न्यारो हुवै। थारा साबजी थनै कठैई घूमणनै ले जावै कोनी कांई सखी?’
‘बे म्हारै नीं किणी और साथै घूमिया-फिरिया करै, सखी। थारो सावण तो अबकी सूखो है, म्हारो तो हर बरस सूखो ई जावै सखी। म्हारै साब सारू हरेक रुत सतरंगी अर म्हारै सारू हरेक रुत इकरंगी रैवै सखी।’
‘थारै साब सारू सतरंगो अर थारै सारू इकरंगो? इयां कियां हुवै सखी? खुल नै बता सखी वैâ बे थनै छोड’र दूजै किण रै साथै डोलै, मोद मनावै?’
‘म्हारा साब कविता संग डोलै सखी।’
‘आ तो भोत भूंडी बात है सखी। थारी अणदेखी करै अर दूजी लुगाई साथै ऐश करै। र्इं कवितकी लुगाई रा झींटा झाल’र अ‍ेक दिन सबक सिखा दे नीं सखी।’
‘अरे सखी! थूं समझी कोनी। म्हारा साब कवि है। म्हैं कविता नांव री किणी लुगाई री नीं बां रै लिख्योड़ी कविता री बात कर रैयी हूं। कवि आपरी घरवाळी साथै नीं आपरी लिख्योड़ी कवितावां साथै बारै घूमिया-फिरिया करै। म्हारै साथै घूमण री बां नै टैम ई कोनी सखी। बां रो मन तो कवि गोष्ठियां, साहित्यिक जळसां में रम्या करै सखी। गोष्ठियां में जा जा’यर, कवितावां सुणाय’र बे आपरो सावण सुरंगो बणावण में लाग्योड़ा है अर म्हारो सावण सूखै रो सूखो पड़ियो है सखी।’
‘म्हारा साबजी परदेस होवण सूं म्हारो सावण सूखो है पण थारा साबजी साथै होवता थका ई थारो सावण सूखो बीत रैयो है, आ तो भूंडी बात है सखी।’
‘सावण रा गीत गावणिया कवियां री पत्नियां साथै इयां ई हुया करै सखी।’ ‘भगवान म्हारी भली करी वैâ म्हारा साबजी कवि कोनी, सखी।’

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