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रोखठोक : हर एक का अलग ‘स्वर्ग’! … हिटलर, स्टालिन, पुतिन और हम सभी

कड़कनाथ मुंबैकर

समरकंद में प्रधानमंत्री मोदी और पुतिन की मुलाकात हुई। दोनों ने गर्मजोशी से हाथ मिलाया। उस समय रूस में अखबारों का दमन चल रहा था और पुतिन रहस्यमय ढंग से मुस्कुरा रहे थे। अगले दिन प्रधानमंत्री मोदी स्वदेश लौट आए। उन्होंने अप्रâीका के आठ चीतों को मध्य प्रदेश के वनक्षेत्र में छोड़ा। चीतों के लिए नया स्वर्ग बनाया गया। सत्तर वर्षों में ऐसा नहीं हुआ था! ये हुआ चीतों का, इंसानों का क्या?

बीते सत्तर वर्षों में हमारे देश से बहुत कुछ लुप्त हो गया। बीते कुछ वर्षों में सत्य और अहिंसा भी समाप्त हो गए हैं, ऐसा प्रतीत होता है। न्याय तो दीपक लेकर ढूंढ़ना पड़ रहा है। ७० वर्षों से जो-जो विलुप्त हो चुका है, उन सभी चीजों को वापस लाने की बात पर मोदी और उनकी पार्टी सत्ता में आई है और करीब ७० साल पहले हिंदुस्थान से विलुप्त हुए चीतों के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन के मौके पर पुन: हिंदुस्थान में आने पर ‘भाजपा’ नामक राजनीतिक पार्टी ने वैâसा जबरदस्त उत्सव मनाया? ये चीते ‘नामीबिया’ नाम के एक अप्रâीकी देश ने दिए थे, लेकिन भाजपा के कुछ लोगों ने ऐसा माहौल बनाया मानो उन्होंने ही इन आठ चीतों को प्रयोगशाला में ‘टेस्ट ट्यूब’ के जरिए पैदा किया है और पीएम मोदी ने उन्हें मध्यप्रदेश के ‘कूनो’ नेशनल पार्क में छोड़ा। अगले ७२ घंटों तक आठ चीते और उन्हें जंगल में छोड़ते हमारे प्रधानमंत्री का दीदार सभी समाचार चैनलों पर होता रहा। आठ चीतों के आगमन के अलावा और कोई भी घटनाक्रम उन्हें नहीं दिख रहा था। अगर विदेशों में छिपाया गया ७२ लाख करोड़ का काला धन पेटियों में भरकर लाया गया होता तो देश और प्रसन्न हुआ होता। चीतों को लाने की खुशी है ही, लेकिन खुशियों को बढ़ा-चढ़ाकर भी कितना पेश किया जाना चाहिए? इसकी कोई हद? आजादी के अमृत उत्सव में देश को आठ चीते मिले और इसके लिए तत्कालीन सत्तारूढ़ दल ने इसे आनंदोत्सव मनाया, यह इतिहास में अवश्य दर्ज होना चाहिए।
चपल पुतिन
रूस के राष्ट्रपति पुतिन भी चीतों की तरह चपल और तेज हैं। उज्बेकिस्तान के समरकंद में प्रधानमंत्री मोदी और पुतिन की मुलाकात हुई। आठ चीतों की तरह पुतिन से मुलाकात की खबर भी दो दिनों तक चली। उसी समय ‘मास्को’ के अखबारों में एक खबर प्रमुखता से छपी। सरकार के खिलाफ लिखनेवाले ‘नोवाया गजट’ नामक अखबार का लाइसेंस रद्द करने के सरकार के पैâसले को मास्को की एक अदालत ने वैध ठहराया। इस अखबार के प्रधान संपादक दिमित्री मुराटोव को नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। पुतिन के दौर में स्वतंत्र स्वाभिमान वाले कई समाचार पत्र बंद कर दिए गए। संपादक, पत्रकारों पर झूठे आरोप लगाकर उन्हें जेल में डाल दिया गया। इसके खिलाफ आवाज उठाने वाले कई लोग लापता हो गए। वही पुतिन वर्तमान में हिंदुस्थान के विश्वसनीय मित्र हैं, लेकिन रूस का इतिहास कहां अलग है? इस मुल्क की यही पुरानी नीति है। दुनिया भर के तानाशाहों के बारे में कई कहानियां और किंवदंतियां समय-समय पर प्रकाशित हुई हैं। स्टालिन, मुसोलिनी, हिटलर, सद्दाम उनमें से कुछ हैं। अब इसमें नए नाम जोड़े जाएंगे। मुसोलिनी के समय में इटली में दूरदर्शन पर एक समाचार चैनल था। उस पर मुसोलिनी के वही भाषण सतत और निरंतर सुनकर जनता बेजार हो गई थी।
हम ही नहीं, बल्कि दुनिया के कई मुल्क इस प्रकार की हताशा से गुजरते रहते हैं। अंतत: इतालवी टेलीविजन पर दूसरे चैनल शुरू होंगे और वे स्वतंत्र स्वाभिमान वाली खबरें प्रसारित करेंगे, ऐसी घोषणा होते ही लोग खुश हो गए। एक नागरिक ने पहले चैनल पर मुसोलिनी के भाषण को बंद कर दिया और उत्सुकता से दूसरा चैनल शुरू कर दिया। उसी के साथ उस चैनल से एक सिपाही बंदूक के साथ बाहर निकला और चिल्लाया, ‘पहले चैनल को चुपचाप दोबारा शुरू करो, अन्यथा गोली मार दूंगा!’
स्टालिन का खौफ
मोदी के दौर में ‘ईडी और सीबीआई’ का डर है, उसी तरह स्टालिन के दौर में पुलिस का था। स्टालिन के समय में अगर किसी को देशद्रोह के आरोप में पकड़ना होता, तो पुलिस भोर में तीन बजे उसके घर जाती और दरवाजे की घंटी बजाती। उस व्यक्ति द्वारा ‘कौन है?’ ऐसा पूछने पर पुलिस कहती, ‘मैं पोस्टमैन हूं।’ उस व्यक्ति द्वारा तार आदि होगी ऐसा मानकर दरवाजा खोलते ही पुलिस उसे पकड़कर ले जाती थी। ऐसी ही एक रात तीन बजे पुलिस ने हम पोस्टमैन हैं कहकर एक व्यक्ति को दरवाजा खोलने को मजबूर किया और पूछा, ‘रूस में जीवन इतना सुकूनभरा, खुशहाल, स्वच्छंद होने के बाद भी तुमने इंग्लैंड में बसने के लिए आवेदन क्यों किया? यहां तुम्हें क्या कमी है?’ उस रूसी नागरिक ने नम्रतापूर्वक कहा, ‘रूस में मेरे पास सब सुख हैं, लेकिन भोर में तीन बजे आने वाली डाक मुझे पसंद नहीं है!’
एक अंग्रेज ने एक रूसी नागरिक से पूछा, ‘आपके देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं है, ये सत्य है क्या?’ रूसी ने कहा, ‘बिल्कुल झूठ। यह हमारे देश का अपमान है। हमारे देश में अभिव्यक्ति की बहुत स्वतंत्रता है। कोई भी कुछ भी कह सकता है।’
‘तो फिर तुम लोग ऐसे प्रताड़ितों की तरह क्यों रहते हो? सरकार के खिलाफ क्यों नहीं बोलते?’
‘समस्या यह है कि हमारे देश में बोलने की आजादी होने के बाद भी बोलने के बाद उस वक्ता की आजादी नहीं रहती है!’
राशन की दुकान में वित्त मंत्री
दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र हमारे हिंदुस्थान में फल-फूल रहा है। देखें कि वैâसे। हमारी वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने हाल ही में तेलंगाना राज्य के एक गांव का दौरा किया। एक गांव में राशन की दुकान पर वे गई थीं। दुकान में प्रधानमंत्री मोदी की कोई फोटो नहीं थी। यह देखकर वित्त मंत्री भड़क गर्इं। अधिकारियों और दुकानदारों को उन्होंने फटकार लगाई। ‘राशन दुकान में मोदी की फोटो क्यों नहीं है? ये वही हैं, जो आपको राशन देते हैं ना?’ उन्होंने ऐसा राग अलापा। लोकतंत्र में जनता के टैक्स के पैसे से राशन, पानी और शिक्षा मुहैया कराई जाती है।
तानाशाही वाले देशों में पैसा जनता का होता है, लेकिन देने वाला तो तानाशाह ही होता है। कुछ लोग पीएम मोदी को बदनाम कर रहे हैं, ऐसा होगा। लेकिन वित्त मंत्री ने दुकान में जाकर क्या किया, यह शायद मोदी को भी पता नहीं होगा लेकिन यह सब प्रसारित हो गया। आलोचकों ने मोदी की आलोचना की।
हिटलर के चरम पर होने के समय की एक दंतकथा देखें। एक गांव में नाजी पार्टी के स्थानीय कार्यकर्ताओं की बैठक चल रही थी। वहां पार्टी के एक प्रमुख सदस्य से पूछा,
‘जर्मनी का नेता कौन है?’
‘हिटलर!’
‘विश्व का सर्वश्रेष्ठ नेता कौन है?’
‘हिटलर!’
‘हमें राशन-पानी कौन देता है?’
‘हिटलर!’
‘जर्मनी में बारिश कौन कराता है?’
‘ईश्वर!’
इस पर पार्टी अध्यक्ष भड़क गया, ‘यह व्यक्ति देशद्रोही है। इसकी नाजी पार्टी से हकालपट्टी कर दो और उस पर मुकदमा दर्ज करो।’ वर्ष १९३८ में जर्मनी में चुनाव हुए और ९८ प्रतिशत वोट हासिल करके हिटलर राष्ट्रपति चुने गए। हिटलर ने खुश होकर शिगार सुलगाया। धुएं के छल्ले छोड़ते हुए उन्होंने गोअरिंग को निर्देश दिया, ‘जाओ, मेरी ओर से हमारे ९८ फीसदी मतदाताओं को लाख-लाख शुक्रिया कहकर आओ।’ पंद्रह दिन बाद, गोअरिंग जर्मनी के दौरे से लौटा और कहा, ‘क्या बताऊं, हिटलर! श्रीमान, मैं जर्मनी में घूमकर आया, हजारों लोगों से मिला, लेकिन हमें मत देनेवाले उन ९८ फीसदी लोगों में से एक भी मुझे नहीं मिला। सभी दो फीसदी लोगों में से ही थे।’ यह चमत्कार वैâसे हुआ? गोएबल्स पास में ही थे। उन्होंने कहा, ‘चमत्कार? वैâसा चमत्कार?’ उन पेटियों में ९८ फीसदी मतपत्र डालने की व्यवस्था मैंने ही की थी।’
विनोद के दुश्मन
पुतिन के दौर में अखबार और विपक्ष का दमन जारी ही है। विरोध में आवाज उठानेवाले विपक्षी नेता पर नजर रखकर उसे जहर देकर मारने का प्रयास किया गया (लोकतांत्रिक सिस्टम में ईडी-सीबीआई का उपयोग किया जाता है)। फिर भी पुतिन को एक लोकप्रिय और शक्तिशाली नेता ठहराया जाता है। उन्होंने यूक्रेन को खत्म कर दिया। हजारों निर्दोष लोग मारे गए। अब यूक्रेन में रूसी सैनिक मार खाने लगे हैं। फिर भी रूस में पुतिन की ही जीत की खबरें प्रकाशित होंगी। हमारे देश में भी अलग क्या है? देश के समक्ष समस्याएं और संकट अलग ही हैं, लेकिन चौबीसों घंटे चीते, हिरण और खरगोश की खबरें दिखाकर लोगों को बेजार किया जाता है। कम पड़ा तो हिजाब, मुसलमान हैं ही। तानाशाहों को ही लगता है- उनका देश ही इकलौता स्वर्ग है और वे ही स्वर्ग के निर्माता है। सिंहासन पर चढ़ने से पहले, उनका देश मतलब एक कब्रिस्तान अथवा रेगिस्तान था। ऐसे सभी एक जैसी मानसिकता वाले शासकों में विनोद, सच्चाई और आलोचना से नफरत होती है। स्टालिन को भी मजाक पसंद नहीं था। इसलिए वे कम्युनिस्ट व्यवस्था पर हास्य-व्यंग्य और हल्के-फुल्के लेख लिखनेवालों से नाराज हो जाते थे। ऐसा ही एक मजेदार मजाक यह था कि ‘सटायर’ लिखने वाले एक लेखक को रूसी खुफिया पुलिस ने पकड़ लिया और स्टालिन के सामने लाकर खड़ा कर दिया। स्टालिन ने उसे डांटा और पूछा, ‘क्या, तुमने ऐसा उपहासात्मक लेख लिखकर, हमारे कम्युनिस्टों का अपमान किया है? अरे, दुनिया में हमारी वाहवाही हो रही है। पूरी दुनिया कह रही है, जन्म हो तो रूस में हो। हमारा साम्यवाद अर्थात मानवता को मिला एक उपहार है। साम्यवाद मतलब पृथ्वी का स्वर्ग है।’ वह व्यंग्य लेख लिखनेवाला लेखक डर गया था। आश्वस्त था कि उसे निश्चित रूप से जेल भेजा जाएगा, उसे क्रांति का दुश्मन ठहराकर प्रताड़ित किया जाएगा। इसके बावजूद उसने विनम्रतापूर्वक स्टालिन से कहा, ‘सर, मैंने जो व्यंग्य लेख लिखा है, उसके लिए मुझे जो भी सजा देनी हो दे दो, लेकिन रूस में साम्यवाद धरती पर स्वर्ग है और यह मजाक मेरा नहीं है, बस इतना ही याद रखें। वह मजाक आपने ही किया है!’ पुतिन को आज भी लगता है कि उनका रूस मतलब स्वर्ग है। हिटलर को भी ऐसा ही लगता था। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अपने कार्टूनों से हिटलर को आगबबूला करनेवाले डेविड लोव को ‘जिंदा या मुर्दा’ पकड़कर लाने का फरमान हिटलर ने जारी किया था। हमारे देश में यह काम ईडी, सीबीआई को सौंपा गया है। क्योंकि वर्तमान में स्वर्ग का संरक्षक उन्हें ही बनाया गया है। नामीबिया से आठ चीते हिंदुस्थान के स्वर्ग पहुंचे हैं। उनके लिए एक नया स्वर्ग बनाया गया है। उस स्वर्ग में लोग हैरान और स्तब्ध रह गए। यही हमारा लोकतंत्र है! सत्तर वर्षों में जनता को क्या मिला?
तो आठ चीते और चुप्पी! हर किसी के स्वर्ग और चुप्पी का स्तर अलग है। हिटलर, पुतिन, स्टालिन और हम सभी किस स्वर्ग में विहार कर रहे हैं, यह शोध का विषय है।
 kadaknathmumbaikar@gmail.com

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