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रोखठोक : हर कोई आनंद दिघे नहीं होता है! …कुछ शिंदे होते हैं!

कड़कनाथ मुंबैकर

शिवसेना के दशहरा सम्मेलन को लेकर उपहास चल रहा है। शिवतीर्थ पर होनेवाला सम्मेलन ही असली है, ये पूरा देश जानता है। लेकिन शिंदे गुट उनकी ही शिवसेना असली है, ऐसा मानकर दूसरे सम्मेलन का आयोजन कर रहा है। इस मौके पर दिल्ली खुशियों से सराबोर हो रही होगी। उस पर आनंद दिघे के नाम पर ये खेल चल रहा है। राजनीति में हर किसी के लिए ‘दिघे’ बनना संभव नहीं है। कुछ लोग ‘शिंदे’ बन जाते हैं… दिघे वास्तव में कौन थे? उस पर रोशनी डालनेवाला सनसनीखेज रोखठोक।

त्योहार-उत्सवों के मौसम में महाराष्ट्र का राजनीतिक माहौल बेहद दूषित हो गया है। शिवसेना में भारी फूट डालकर एकनाथ शिंदे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बन गए। यहां तक तो ठीक है, लेकिन उन्होंने सीधे शिवसेना पर दावा कर दिया। यह दिमाग शिंदे का नहीं है। इसके पीछे भारतीय जनता पार्टी की बड़ी साजिश है। छगन भुजबल, नारायण राणे और राज ठाकरे ने बगावत की या पार्टी छोड़ दी, लेकिन उनमें से किसी ने भी शिवसेना पर दावा करने का दुस्साहस नहीं दिखाया। यह उद्दंडता भाजपा के समर्थन से तैयार हुई। हमारी ही शिवसेना और हमारा ही दशहरा सम्मेलन। महाराष्ट्र में एक खड़ी फूट पैदा करने के लिए शिंदे ने दिवंगत आनंद दिघे का सहारा लिया। शिंदे को २१ साल बाद दिघे की याद आई। दिघे के वे कितने करीबी थे, ये दिखाने के लिए शिंदे ने कुछ करोड़ रुपए खर्च करके फिल्म ‘धर्मवीर’ बनाई। फिल्म पर हुए खर्च की तुलना में फिल्म के अर्थात अपने प्रचार पर ज्यादा खर्च किया। यह फिल्म आनंद दिघे पर थी या शिंदे के बारे में थी, ऐसा सवाल फिल्म देखने के बाद कई दर्शकों के मन में उठा। क्योंकि इस फिल्म का प्रयोग चलने के दौरान ही शिंदे ने आनंद दिघे की पीठ में छुरा घोंपा और शिवसेना तोड़ दी। शिंदे के मुख्यमंत्री बनने के बाद से टीवी पर इस फिल्म की धूम मची है तो सिर्फ शिंदे के प्रचार के लिए। इस फिल्म के माध्यम से दिघे की तुलना में एकनाथ शिंदे को ही अद्भुत शख्सियत के तौर पर दिखाया गया। फिल्म के कई दृश्य काल्पनिक और फंतासी की पराकाष्ठा हैं। इस फिल्म के बाद शिंदे ने आनंद दिघे की ढाल आगे रखकर शिवसेना को तोड़ा!

गलत वाले दिघे
एकनाथ शिंदे ने आनंद दिघे की छवि को गलत तरीके से चित्रित किया है। उद्धव ठाकरे द्वारा कांग्रेस-एनसीपी के साथ गठबंधन करने से शिवसेना मूल विचारों से दूर हो गई। बालासाहेब ठाकरे या आनंद दिघे को ये स्वीकार नहीं होता, ऐसा झूठ ये लोग बोल रहे हैं। मूलत: शिवसेना में एक आठ सदस्यीय मंडल था। शिवसेनाप्रमुख इस आठ सदस्यीय मंडल से चर्चा करने के बाद ही निर्णय लेते थे। इस आठ सदस्यीय मंडल और निर्णय लेने की प्रक्रिया में दिघे नहीं थे। ठाणे के सतीश प्रधान नेता के रूप में उस अष्टप्रधान मंडल में शामिल थे। उस समय और बाद में भी दिघे का प्रभाव क्षेत्र ठाणे जिले के बाहर नहीं था, लेकिन आनंद दिघे के व्यक्तित्व के प्रति उस समय राज्य में बहुत से लोग आकर्षित हुए थे। त्याग, निस्वार्थ भावना और शिवसेना में अटूट श्रद्धा ही राज्य में उनकी पहचान थी। टेंभी नाका पर उनकी कार्यशैली के बारे में कई बार लेख प्रकाशित हुए, लेकिन दिघे की कांग्रेस विरोधी और भाजपा भक्त के रूप में छवि आज तैयार की जा रही है, जो कि गलत है। कई वर्षों तक आनंद दिघे और वसंत डावखरे की जोड़ी ने मिलकर ठाणे की राजनीति की। दोनों की मिलीभगत और दोस्ती थी। कांग्रेसी डावखरे बाद में राष्ट्रवादी के हो गए। भारतीय जनता पार्टी को ठाणे की सत्ता से दूर रखने के लिए दिघे और डावखरे कभी खुलकर तो कभी परदे के पीछे से सूत्र संचालित करते थे। अब दिघे कितने भाजपा प्रेमी थे, इससे संबंधित एक प्रसंग बताते हैं। शायद शिंदे और उनके ४० विधायकों को इसकी जानकारी नहीं होगी। वर्ष १९९२ में अयोध्या में बाबरी गिर गई। भाजपा ने जिम्मेदारी से किनारा कर लिया। बाबरी गिरानेवाले मेरे शिवसैनिक होंगे तो मुझे उन पर अभिमान है, ऐसा सार्वजनिक रूप से कहनेवाले शिवसेनाप्रमुख बालासाहेब ठाकरे पूरे देश के हिंदूहृदयसम्राट बन गए। देश में हिंदुत्व की तूफानी लहर उसी से आई और शिवसेनाप्रमुख उस लहर का नेतृत्व करने लगे। उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह की सरकार के बर्खास्त किए जाने से कल्याण सिंह के माथे पर शहादत का तिलक लग गया था। तब कल्याण-डोंबिवली के साथ ठाणे एक ही लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र था और भाजपा के राम कापसे शिवसेना-भाजपा युति के उम्मीदवार के रूप में निर्वाचित हुए थे। इससे पहले कापसे कल्याण विधानसभा क्षेत्र से विधायक के रूप में चुने जाते थे। तो इस कापसे ने बाबरी विध्वंस की खुशी मनाने के लिए ठाणे के सेंट्रल मैदान में भाजपा की सभा आयोजित की और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को सभा में बुलाकर उनकी वीरता के अनुरूप अभिनंदन करने का निर्णय लिया। यह सभा मतलब ठाणे में शिवसेना को परोक्ष रूप से चुनौती देने की पहली कोशिश थी। आनंद दिघे को यह जंचा नहीं। उन्होंने सभा को बाधित नहीं किया, परंतु शाम को सभा सुनने के लिए वे कार में बैठकर सभा स्थल से कुछ दूरी पर पहुंच गए। कार में उनके खास लोग बैठे थे। सभा शुरू होते ही सांसद राम कापसे भाषण देने के लिए खड़े हुए। उनके द्वारा भाषण में कल्याण सिंह का उल्लेख देश के इकलौते हिंदूहृदयसम्राट के रूप में करते ही दिघे व्याकुल हो गए। उनका चेहरा लाल हो गया। ‘अरे, ये क्या कह रहे हैं? हिंदूहृदयसम्राट तो सिर्फ हमारे बालासाहेब ठाकरे हैं। भाजपा नया हिंदूहृदयसम्राट क्यों बना रही है? यह शिवसेना के लिए चुनौती है। ठाणे में तो मैं चलने नहीं दूंगा। मैं अब कहता हूं, दुनिया यहां से वहां हो जाएगी, लेकिन कापसे फिर से ठाणे के सांसद नहीं होंगे। ठाणे का सांसद सिर्फ शिवसेना का ही होगा!’ आनंद दिघे ने उस गाड़ी में ही घोषणा कर दी। यह व्यथा उन्होंने दिल में ही रखी, लेकिन लोकसभा चुनाव की घोषणा होते ही सीटों के बंटवारे के दौरान ठाणे का मुद्दा सामने आया तो दिघे ने ठाणे लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र पर शिवसेना के दावे की घोषणा कर दी। ठाणे में भाजपा नहीं चलेगी। दिघे बालासाहेब से मिले और उन्होंने जिद की। राम कापसे और भाजपा ठाणे में नहीं चलेंगे। शिवसेना से प्यार करनेवाले लोग उन्हें हरा देंगे। ठाणे का सांसद शिवसेना का ही होगा।’ शिवसेनाप्रमुख, प्रमोद महाजन, गोपीनाथ मुंडे ने दिघे को समझाने की कोशिश की, लेकिन दिघे अड़े रहे। अंतत: उनके हठ के समक्ष सभी को पीछे हटना पड़ा। कापसे को पीछे रखकर ठाणे लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र शिवसेना के पास गया और महापौर का चुनाव हार चुके प्रकाश परांजपे शिवसेना के उम्मीदवार के रूप में लोकसभा में चुने गए। यह भारतीय जनता पार्टी की शिवसेना के प्रति द्वेष को चुनौती देनेवाले दिघे का असली रूप था, लेकिन शिंदे द्वारा निर्मित फिल्म में यह कहीं देखने को नहीं मिला!

विचारे क्या कहते हैं?
शिंदे वास्तव में दिघे के कितने करीब थे, ये राजन ही बता सकते हैं। हादसे में हुई दिघे की आकस्मिक मौत का शिंदे ने लाभ उठाया। मो.दा. जोशी ठाणे में शिवसेना के पहले विधायक थे। अर्थात जोशी ठाणे में शिवसेनाप्रमुख के घनिष्ठ और आनंद दिघे के राजनीतिक गुरु हैं। मो.दा. जोशी दिघे को प्यार में ‘तू-तड़ाक’ से संबोधित करते थे। वह ठाणे के जिलाप्रमुख भी थे। आनंद दिघे के निधन के बाद समीकरण बदल गए। मो.दा. के स्थान पर राजन विचारे ठाणे के विधायक बन गए। आगे विचारे सांसद बन गए, तब उद्धव ठाकरे ने शिवसेना के ठाणे शहरप्रमुख नरेश म्हस्के को उम्मीदवार बनाने का निर्णय लिया। शिंदे ने इसका कड़ा विरोध किया और कांग्रेस से ऐन मौके पर आए रवि फाटक को उम्मीदवारी देने को मजबूर किया। फाटक स्थानीय नहीं थे, हालांकि वागले इस्टेट क्षेत्र में खुद को परेशानी न हो इसलिए उन्होंने म्हस्के की जगह कांग्रेस के फाटक को लाद दिया। वह जगह उस समय शिवसेना ने गंवाई तो शिंदे के ही कारण। वो फाटक, राणे के साथ कांग्रेस में गए थे और ठाणे में शिवसैनिकों का सिर उन्होंने फोड़ा था। यह प्रसंग वाचाल है। प्रकाश परांजपे के निधन के बाद उनके सुपुत्र आनंद परांजपे सांसद बने। आनंद परांजपे शिवसेना छोड़ दें, ऐसा अंदरूनी माहौल शिंदे ने तैयार किया। कल्याण-डोंबिवली निर्वाचन क्षेत्र से जिलाप्रमुख गोपाल लांडगे को उम्मीदवारी दी जानी चाहिए, ऐसा उद्धव ठाकरे ने तय किया लेकिन शिंदे ने लांडगे का विरोध किया और अपने चिकित्सक पुत्र श्रीकांत, जो राजनीति और शिवसेना में नहीं थे, को उम्मीदवार बनाने के लिए मजबूर किया। शिवसैनिक गोपाल लांडगे के लिए मांग कर रहे थे। अभी भी ठाणे-पालघर-डोंबिवली में शिंदे के साथ जाने को जो शिवसैनिक तैयार नहीं हैं, उनके घर, व्यवसायों और उद्योगों पर बुलडोजर चलाकर दहशत निर्माण की जा रही है। क्या इसे दिघे की विरासत कहा जा सकता है? दिघे द्वारा अपने राजनीतिक हित के लिए किसी सच्चे शिवसैनिक के साथ अन्याय करने का कोई दृष्टांत नहीं मिलता है।

कांग्रेस की मदद
कांग्रेस-राष्ट्रवादी के खिलाफ श्री शिंदे आज आलोचना करते हैं, लेकिन पृथ्वीराज चव्हाण के महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री रहने के दौरान शिंदे दिल्ली में दिवंगत कांग्रेस नेता अहमद पटेल के संपर्क में थे और उस समय भी उनके मन में अलग ही विचार थे। सौदेबाजी सफल नहीं हुई, इतना ही, सबूतों के साथ ऐसा कहनेवाले कई लोग आज भी उनके इर्द-गिर्द हैं। इतना ही नहीं एकनाथ शिंदे सत्ता के लिए कितने उतावले थे, ये खुलासा करके कांग्रेस नेता अशोक चव्हाण ने भी अब धमाका किया है। ‘२०१४ में भाजपा-शिवसेना ‘युति’ की सरकार में फडणवीस के मुख्यमंत्री रहने के दौरान शिवसेना का एक शिष्टमंडल कांग्रेसी नेताओं से मिला था और नई सरकार के गठन का प्रस्ताव रखा। एकनाथ शिंदे खुद उस प्रतिनिधिमंडल में थे।’ ऐसा चव्हाण ने कहा। यानी उस समय शिंदे ने कांग्रेस के साथ जाने का विरोध नहीं किया था और कांग्रेस के साथ जाने से ‘ठाकरे-दिघे’ की विरासत नष्ट हो जाएगी, ऐसा उन्हें नहीं लगा था। उसी दौर में उन्होंने दिल्ली में कांग्रेसी नेताओं के साथ संपर्क किया था और १५ से २० विधायकों के साथ ‘आता’ हूं, गृह मंत्री के साथ उपमुख्यमंत्री का पद दो ऐसी चर्चा शुरू की थी। ऐसा दृढ़तापूर्वक दावा करनेवाले लोग हैं। उसके प्रत्यक्षदर्शी आज भी हैं। शिंदे, कांग्रेस के साथ चर्चा कर रहे थे, ऐसी पहली खबर (एफआईआर) तब भाजपा ने उद्धव ठाकरे के पास दर्ज कराई थी।
‘ईडी’ के डर से शिंदे भाजपा में गए। क्योंकि ठाणे महानगरपालिका, समृद्धि महामार्ग, नगर विकास विभाग के माध्यम से पैसा ही पैसा। उस पैसे से सत्ता। सत्ता से फिर पैसा ऐसे दुष्चक्र में वे पूरी तरह से फंस गए। अन्यथा शिंदे आदमी काम का था, ऐसा खुले तौर पर कहा जाता है। मुख्यमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा होना अलग और लालसा का होना अलग बात है। शिंदे लालसा का शिकार हो गए। दिघे इस चक्र में कभी नहीं फंसे। सिगरेट ही उनकी एकमात्र लत थी। शिवसेना उनकी दुनिया थी। दिघे के २१वें स्मृति दिवस पर राजन विचारे का बयान प्रसारित हुआ, जो कि महत्वपूर्ण है। वे कहते हैं, ‘खोपकर प्रकरण में आनंद दिघे पर टाडा लगाया गया था। उन्होंने ढाई साल जेल में बिताए, लेकिन वे किसी की शरण में नहीं गए। गद्दारों को माफी नहीं इस अपने उस बयान से वे पीछे नहीं हटे। आखिरी सांस तक वे शिवसेना के लिए ही संघर्ष करते रहे।’ दिघे ने पार्टी में सत्ता का कोई पद नहीं लिया, लेकिन संकट के समय वे पार्टी की ढाल बनकर लड़ते रहे। ऐसे दिघे का नाम लेने का शिंदे और उनके लोगों को कोई अधिकार नहीं है! नई पीढ़ी को गुमराह कर शिंदे खुद से ही छल कर रहे हैं। आनंद दिघे को ‘टाडा’ मामले में जमानत मिल जाए, ऐसा प्रयास कांग्रेस में उनके चाहनेवालों ने किया था। बालासाहेब ठाकरे भी जहां बोलना था, वहां बोलते थे। एक दिन सुबह ४ बजे मुख्यमंत्री महोदय ने इस संबंध में ‘वर्षा’ पर बैठक बुलाई। कुछ निर्देश दिए और दिघे की रिहाई का मार्ग प्रशस्त किया। उस समय ‘वर्षा’ में मुख्यमंत्री शरद पवार थे। वे भी कांग्रेसी थे! दिघे के निधन के बाद उनका अंतिम संस्कार सार्वजनिक स्थान पर खुले में किया जाए और उनका स्मारक बने, इसके लिए प्रयास करनेवाले प्रभाकर हेगड़े, ठाणे कांग्रेस के अध्यक्ष थे। इस दौरान भाजपा कहीं नहीं थी।

हास्यास्पद दावा
शिंदे आज शिवसेना को चुनौती देने की बात करते हैं। यह आनंद दिघे का सबसे बड़ा अपमान है। यदि शिंदे में सचमुच हिम्मत होगी तो वे अपनी नई पार्टी बनाने का साहस दिखाएं। ‘तुम अलग हो जाओ। न्यायालय और चुनाव आयोग से जैसा चाहिए, वैसा परिणाम दिलवा देते हैं।’ दिल्ली की महाशक्ति द्वारा ऐसा आश्वासन मिलने के बाद ही शिंदे और उनके ४० मिंधे ने अलग होने का साहस दिखाया। शिंदे के साथ जो ‘विधायक’ हैं उनमें से असली शिवसैनिक कितने हैं? इन फर्जी लोगों के समर्थन से वे दावा करते हैं कि असली शिवसेना मेरी है, यह हास्यास्पद है। अब्दुल सत्तार, उदय सामंत, सरनाईक, शहाजी पाटील, तानाजी सावंत और ‘ईडी’ पीड़ित अन्य विधायकों को कोई शिवसैनिक कहने को तैयार होगा क्या? ऐतिहासिक काल में ऐसे ही बेकार लोगों ने मराठा साम्राज्य को खत्म होने के कगार पर पहुंचाया, ये बेकार लोग ही विश्वासघात करके मुगलों से मिल गए और संभाजी राजे का वध उन्होंने ही करवाया। आनंद दिघे के आस-पास ऐसे बेकार लोगों का घेरा कभी देखने को नहीं मिला। कल्याण सिंह को हिंदूहृदयसम्राट कहा, बालासाहेब के अपमान की इस चिढ़ से दिघे ने पूरी भाजपा से बैर ले लिया था। दिघे के शिष्य के रूप में क्या शिंदे शोभा देंगे? आज वे शिवसेना के समानांतर दशहरा सम्मेलन करने जा रहे हैं। भीड़ जुटाने के लिए चार हजार एसटी बसें किराए पर लेनेवाले हैं। उस पर अन्य खर्च अलग ही है। यह आर्थिक शक्ति कहां से आती है? आनंद दिघे को ऐसा उपद्रव कभी नहीं करना पड़ा। उनमें लालच नहीं था। उनकी शिवसेना के प्रति निष्ठा दिखावा नहीं थी। वह वास्तव में मन और कर्म से महान थे। दिघे धार्मिक थे… कोई अघोरी नहीं। दिघे बकवास नहीं करते थे। लोगों को खरीदकर राजनीति करनेवालों में उनका विश्वास नहीं था। दिघे कोई दार्शनिक नहीं थे। वे गरीब-शोषितों की मदद करनेवाले एक मसीहा थे। आनंद दिघे पर पूरे ठाणे जिले की जिम्मेदारी थी, लेकिन उनके त्याग की और वफादारी की कविताएं पूरे राज्य में गाई गर्इं। दिघे लोगों को ‘पैसे’ यानी खोकों में नहीं तौलते थे। ऐसा आज उनके उत्तराधिकारी कहलाने वाले शिंदे द्वारा कर रहे हैं। शिंदे द्वारा निर्मित फिल्म में एक चटकदार वाक्य है, ‘राजनीति में सभी समान नहीं होते हैं। कुछ आनंद दिघे होते हैं!’ इसे उसी तर्ज पर कहा जा सकता है। हर कोई दिघे नहीं हो सकता। कुछ शिंदे भी बन जाते हैं! शिंदे का दशहरा सम्मेलन मतलब चोरों का सम्मेलन सिद्ध होगा! उन दिघे का नाम लेना मतलब उस पुण्यात्मा व्यक्ति का अपमान सिद्ध होगा!
शिंदे और उनके लोगों को अभी भी सोचना चाहिए। दशहरे के मौके पर महाराष्ट्र के टूटने की तस्वीर देश के सामने नहीं जानी चाहिए। जनता की भावना पूरी तरह से शिवसेना के पक्ष में है। शिवसेना एक ही है!
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