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रोखठोक : दुश्मन ताली बजा रहा है!

कड़कनाथ मुंबैकर

मुंबई में दशहरे की दो रैलियां आयोजित की गईं। वह भी शिवसेना के नाम पर। इस फूट का नजारा हैरान करने वाला है। शिंदे की रैली में भीड़ जुटाने के लिए प्रचंड पैसा खर्च किया गया। फिर भी भीड़ जीवंत नहीं दिखाई दे रही थी, ऐसा सभी जगह प्रकाशित हुआ। शिंदे को इस खतरे को समय रहते पहचान लेना चाहिए, पर राज्य में जो घटित हो रहा है उसे देखकर दुश्मन तालियां बजा रहे हैं।

मुंबई के साथ महाराष्ट्र में दशहरा रैली का कवित्व अभी खत्म नहीं हुआ है। परंपरागत रूप से महाराष्ट्र में दो दशहरा रैलियां आयोजित की जाती रही हैं। नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का संचलन और रैली पहली। शिवतीर्थ पर शिवसेनाप्रमुख बालासाहेब ठाकरे की ली जा रही दशहरा रैली दूसरी। उसके बाद गोपीनाथ मुंडे ने भगवान गढ़ पर एक रैली करनी शुरू कर दी। वो भी दशहरे के मौके पर ही। अब एक और चौथी रैली मुंबई के `बीकेसी’ मैदान में हुई। मुख्यमंत्री शिंदे और उनके गुट ने शिवसेना को चुनौती देने के लिए यह रैली आयोजित की। उनकी रैली में भी अच्छी भीड़ रही। शिंद्या का मुख्य भाषण हुआ वो उद्धव ठाकरे पर पूरी तरह से कीचड़ उछालने वाला। शिवतीर्थ बनाम बीकेसी की इस लड़ाई को देखकर महाराष्ट्र के दुश्मन दिल्ली में बैठकर खुशी से तालियां बजा रहे होंगे। महाराष्ट्र के लिए ये स्थिति अच्छी नहीं है। भारतीय जनता पार्टी के लिए जो ३०-३५ वर्षों में संभव नहीं हो सका, उसे श्री एकनाथ शिंदे के माध्यम से महाराष्ट्र में किया जा रहा है। बालासाहेब ठाकरे के निधन के बाद भी दशहरा रैलियां हुर्इं और अगले दिन के समाचार पत्रों में उसी दशहरा रैली का एक बड़ा वृत्तांत प्रकाशित होता था। हालांकि इस साल शिवसेना के रूप में पहले पन्ने पर पहली बार दो दशहरा रैलियों में आई भीड़ की तस्वीरें और खबरें प्रकाशित की गर्इं। श्री शिंदे ये आज भी खुद को बालासाहेब ठाकरे के विचारों का वारिस मानते हैं तो उन्हें इस मामले पर चिंतन करना चाहिए। शिंदे ने अपने भाषण में कहा, `मैं सच्चाई के लिए लड़ रहा हूं। सत्ता के लिए नहीं।’ असल में सच्चाई यह है कि भारतीय जनता पार्टी अपनी राजनीतिक चाल चल रही है और शिंदे को केंद्रीय जांच एजेंसियों का डर दिखाकर ठाकरे के खिलाफ इस्तेमाल कर रही है।

यह वृत्तांत देखें…
शिवाजी पार्क में शिवसेना की दशहरा रैली में हमेशा भीड़ रहती है लेकिन श्री शिंदे ने भी `बीकेसी’ की अपनी रैली में भी भीड़ जुटाई। भीड़ का प्रबंधन और इसके लिए धन भी उन्होंने ही एकत्र किया और वह उसमें सफल रहे। शिंदे की रैली में एकत्रित हुई भीड़ का सच लोकसत्ता और अन्य दैनिक समाचार पत्रों ने प्रस्तुत किया। `लोकसत्ता’ का अर्थ `सामना’ नहीं है। इसलिए उनकी रिपोर्ट क्या कहती है वह देखें-
“बांद्रा-कुर्ला कांप्लेक्स परिसर के एमएमआरडीए मैदान में बुधवार को मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे गुट द्वारा दशहरा रैली आयोजित की गई। इस रैली में काफी भीड़ थी। हालांकि यह देखा गया कि इस भीड़ में अधिकांश लोग मुंबई देखने के लिए आए थे। मुंबई पहली बार देख रहे थे, ऐसी भावना मैदान में जमा हुए कई लोगों ने व्यक्त की।
बुधवार को सुबह से ही राज्य के साथ ही देश से हजारों की संख्या में कार्यकर्ताओं की भीड़ जमा हो रही थी। हालांकि इस भीड़ के चेहरों पर उदासीनता साफ नजर आ रही थी। हम किस लिए आए हैं, कहां घूम रहे हैं, आगे क्या होने वाला है? इसकी कोई भी जानकारी उन्हें नहीं थी। फिर हम एकनाथ शिंदे के विचार सुनने आए हैं। हिंदुत्व का विचार सुनने आए हैं, ऐसा कुछ कार्यकर्ताओं की तरफ से कहा गया। बांद्रा-कुर्ला कांप्लेक्स में कार्यकर्ताओं का आना-जाना शुरू था। हालांकि सुबह से किसी तरह की जोरदार नारेबाजी, जय-जयकार नहीं हुई। किसी के भी भाषण में सीटी और ताली बजाने की तादाद कम थी। मुख्यमंत्री शिंदे के मंच पर आने पर कुछ उल्लास और आतिशबाजी हुई। लेकिन उसके बाद वही स्थिति बन गई। `लोकसत्ता’ ने जब कई लोगों से पूछा तो उन्हें बताया गया, “सत्तार सेठ ने मुंबई दौरे के लिए भेजा है। मुंबई में घूम रहे हैं। सभा के बारे में जानकारी नहीं है।” एक ने कहा, “राज ठाकरे की सभा के लिए लाए हैं।” जबकि बहुतों को शिंदे की रैली है, यह पता ही नहीं था।
शिंदे हिंदुत्व के विचार को कायम रखेंगे, ऐसा कहते हैं। मतलब वे क्या करेंगे? मोदी-शाह को शिवसेना तोड़नी थी। हिंदुत्व के मतों और विचारों में साझेदारी नहीं चाहिए, इसीलिए शिवसेना के साथ ही अन्य हिंदुत्ववादी विचार वाले संगठनों को समाप्त करना है। इसके लिए शिंदे का इस्तेमाल किया गया। ईडी कार्यालय में जाने के बाद कइयों का हिंदुत्व वैâसे जागरूक होता है, ऐसा एक व्यंग्यचित्र बीच में प्रकाशित हुआ। शिंदे और उनके लोगों का हिंदुत्व उसी तरह से जागरूक हुआ। इसीलिए बीकेसी में भीड़ तो थी लेकिन उत्साह नहीं था, यह सामने आ गया। फिर भी महाराष्ट्र की राजनीति इन सब मामलों के चलते कीचड़ में फंस गई है। मराठी लोगों की एकता टूट रही है। शिंदे के पीछे आज भाजपा की जो ताकत है, वह शिवसेना को तोड़ने के लिए है, क्या इसका अहसास उन्हें है?

ठाकरे परिवार
शिंदे गुट की रैली में ठाकरे परिवार के कुछ सदस्यों को आमंत्रित किया गया और `ठाकरे परिवार’ भी उनके साथ है, ऐसा भ्रम पैदा किया। मंच पर हर उस पात्र का परिचय श्री शिंदे को है और इसके पीछे की सच्चाई भी जानते हैं। यह पारिवारिक मामला है।
बालासाहेब ठाकरे के पार्थिव शरीर को मुखाग्नि देने के लिए उद्धव ठाकरे ने चंपा थापा और रवि म्हात्रे को सबसे आगे किया। अंतिम संस्कार की विधि थापा और म्हात्रे से कराई गई। इस संबंध में उस समय उद्धव ठाकरे की दयालुता की सराहना की गई। आज `थापा’ शिंदे गुट के मंच पर क्यों गए? आज भी `मातोश्री’ के प्रति निष्ठावान रवि म्हात्रे से शिंदे और उनके लोगों को सीख लेनी चाहिए। शिंदे की कुर्सी के पीछे `इवेंट’ प्रबंधक ने थापा को खड़ा किया। मानो जैसे शिंदे ये बालासाहेब ठाकरे ही हैं। इन सभी ढोंगों का पर्दाफाश बीकेसी की रैली में हुआ और शिंदे की बंद मुट्ठी खुल गई। भाजपा को भी वही चाहिए होगा!

२०१४ क्यों भूलते हैं?
`बीकेसी’ की रैली में श्री शिंदे ने वास्तव में कौन-सा विचार दिया? कीचड़ फेंकना यह कोई विचार नहीं होता। फिर वह चाहे शिवतीर्थ हो या फिर शिंद्या का मैदान। वर्तमान मीडिया को इस कीचड़फेंक की जरूरत रहती है। शिंदे के मंच पर बैठे आधे लोग कांग्रेस-राष्ट्रवादी के गोशाले में लोटपोटकर स्वेच्छा से आए हुए हैं। वे हिंदुत्व आदि के विचार को उठाएं, यह हास्यास्पद ही है। इन सभी का हाथ पकड़कर भाजपा उद्धव ठाकरे पर हमला बोल रही है। कल वही तलवार शिंदे के खिलाफ चलाई जाएगी। महबूबा मुफ्ती के साथ गठबंधन कर सत्ता का आनंद लेने की तुलना में कांग्रेस-राकांपा के साथ सहयोग करना निश्चित रूप से बेहतर है। क्या शिंदे इस इतिहास को नहीं जानते? शिंदे भाजपा की तरफदारी की बात करते हैं। गद्दारी साल २०१९ में हुई, ऐसा वे कहते हैं लेकिन साल २०१४ में भाजपा ने क्या किया, उसे वे भूल गए। मुंबई में दो दशहरा रैलियों ने महाराष्ट्र में सीधे फूट का दर्शन दुनिया को दिखलाया। शिवतीर्थ पर शिवसेना की दशहरा रैली यह दुश्मनों की नजर में गड़ रही थी। उस रैली की `तेज’ कम करने के लिए बीकेसी मैदान में एक और रैली करने के लिए मजबूर होना पड़ा। लोगों ने यह सब बुधवार को अनुभव किया। लेकिन बीकेसी में रैली मतलब बुझे हुए जुगुनुओं की भीड़ थी, ऐसा सभी जगह प्रकाशित हुआ। फिर भी मुंबई में दो रैलियों को देख दुश्मन तालियां बजा रहे होंगे!

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