मुख्यपृष्ठनए समाचाररोखठोक : शिंदे गुट की कॉन्ट्रैक्ट किलिंग! ... फिर भी शिवसेना ही...

रोखठोक : शिंदे गुट की कॉन्ट्रैक्ट किलिंग! … फिर भी शिवसेना ही रहेगी!!

कड़कनाथ मुंबैकर
मुख्यमंत्री शिंदे और उनके गुट का इस्तेमाल शिवसेना के विरोध में `कॉन्ट्रैक्ट किलर’ की तरह हो रहा है। `शिंदे’ नाम का इतिहास महाराष्ट्र में वीरता और ईमान का है लेकिन इस समय शिंदे महाराष्ट्र के खलनायक बनते जा रहे हैं, इस बात का उन्हें ध्यान नहीं है। मुख्यमंत्री पद मतलब प्रतिष्ठा नहीं है। महाराष्ट्र में हर दिन कई पोते और परपोते पैदा होते हैं। उनका आशीर्वाद असली शिवसेना के साथ रहेगा। शिंदे को कहीं खुद पर ब्रेक लगाना चाहिए।

शिवसेनाप्रमुख बालासाहेब ठाकरे द्वारा कड़ी मेहनत से बनाई गई शिवसेना को दिल्ली के शासकों ने कुटिलता और साजिश की चोट पहुंचाकर कागज-पत्र समाप्त कर दिया। इस काम के लिए महाराष्ट्र के एक शिंदे और उनके चालीस गद्दारों की सहायता ली। एक ज्वलंत नाम शिवसेना को प्रâीज कर दिया गया। बालासाहेब जिसकी रोज पूजा करते थे, उस धनुष-बाण को प्रâीज किया गया। महाराष्ट्र के कवच-कुंडल भी शिंदे और उनके गद्दारों ने दिल्ली के चरणों में अर्पण कर दिए। जीवन में कुछ चीजें पवित्र मानी जानी चाहिए, राजनीति से परे मानी जानी चाहिए, यह वर्तमान शासकों की समझ से परे है। शिवराय की भवानी तलवार, कहानी या किंवदंती यह पता नहीं लेकिन शिवसेना मतलब मराठी लोगों की सुरक्षा के लिए उठाई गई भवानी तलवार ही है। राजनीति इस भवानी तलवार तक टकरा गई। उस भवानी तलवार का ऐसा अधोपतन “हम शिवराय के मावले” आदि कहनेवालों ने ही किया। शिवसेना से जुड़ी किसी भी बात पर मराठी लोगों की भावनाएं प्रबल और नाजुक होती हैं। शिंदे नाम के गृहस्थ आज महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पद पर हैं और वे सत्ता के बल पर राज्य में प्रति शिवसेना स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं। इसका मतलब यह हुआ कि मुगलों में शामिल किसी गद्दार के “शिवराय कौन? हिंदू स्वराज्य के असली मालिक हम ही!” ऐसा दावा करने जैसा है। महाराष्ट्र में दो शिवसेना पैदा कर दुश्मनों ने अपना काम किया है। शिंद्या को हारून अल रशीद की तरह वेश बनाकर शाम के बाद बाहर आना चाहिए और जनता उनके बारे में क्या कहती है, वह समझना चाहिए। लोग केवल चर्चा करते हैं, “कौन शिंदे? महाराष्ट्र को तोड़ने और शिवसेना को खत्म करने का अधिकार इस व्यक्ति को किसने दिया?”
शिंदे नाम का इतिहास है। वो इतिहास ईमान का और वीरता का है लेकिन इस शिंद्या के चलते कई शिंदे शर्मिंदा हुए। पानीपत में दत्ताजी शिंदे ने अपनी वीरता से बलिदान दिया। महाराष्ट्र उनका सदैव स्मरण करता है।
संसद में `गोडसे’ शब्द असंसदीय घोषित कर दिया गया, वैसे ही `शिंदे’ शब्द महाराष्ट्र में तिरस्कारी और असंसदीय होगा? `लखोबा लोखंडे’ के वैकल्पिक शब्द के तौर पर वर्तमान में शिंद्या का उल्लेख हो सकता है। इस समय एकनाथ शिंदे का व्यवहार महाराष्ट्र में सबसे तिरस्कारी साबित होता जा रहा है। `एकनाथ शिंदे’ यह नाम most hated speech’ की तरह most hated name’ बनता जा रहा है। अन्य सभी निर्दोष, गुणी लोगों को शिंद्या से क्षमा मांग कर यह लिखना पड़ेगा। एक शिंद्या ने महाराष्ट्र के पीठ में खंजर घोंपकर शिंदे के इतिहास और परंपरा पर कालिख पोत दी है!
महाराष्ट्र पर चोट पहुंचाई
शिंदे, सत्तार, भुसे, सामंत, आबीटकर, सरवणकर, कुडालकर, सरनाईक इस गिरोह ने महाराष्ट्र पर चोट पहुंचाई। यह एक तरह से व्यभिचार ही है। शिवसेना का अस्तित्व समाप्त करने का प्रयास किया, धनुष-बाण पर दावा किया। इसकी जरूरत थी क्या? शिंदे और उनके गिरोह ने शिवसेना छोड़ा, यहां तक तो ठीक। उन्होंने अपने रास्ते का चयन किया। राजनीति में यही होता रहता है लेकिन इस गिरोह ने शिवसेना को `रिपब्लिकन पार्टी’ बनाने की कोशिश की। मंदिर में घुसकर ५६ वर्षों से पूजी जानेवाली मूर्ति को चोट पहुंचाकर टुकड़े करने की कोशिश उन्होंने की। इतना ही नहीं शिंदे और उनके गिरोह ने मुगलों की तरह मंदिर और मूर्ति को तोड़ा है। ऐसे मूर्तिभंजकों को दिल्ली का आशीर्वाद मिला है। महाराष्ट्र को भाजपा ने किस स्तर का मुख्यमंत्री दिया है उसे देखें और श्री फडणवीस ऐसे मुख्यमंत्री के नेतृत्व में काम कर रहे हैं। कुछ खबरें देखिए-
मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने `वर्षा’ आधिकारिक निवास स्थान के साथ ही कुल पांच सरकारी बंगलों को कब्जे में लिया है। उद्धव ठाकरे के मंत्रिमंडल के दौरान शिंदे ने `नंदनवन’ बंगला रहने के लिए लिया। दो सरकारी बंगलों को एकत्र करके उन्होंने `नंदनवन’ का विस्तार किया। मुख्यमंत्री के तौर पर `नंदनवन’ में ही रहूंगा, ऐसी घोषणा उन्होंने की लेकिन अब उन्होंने `नंदनवन’ पर अधिकार रखते हुए `वर्षा’ पर कब्जा किया है। अब कार पार्किंग और मिलने आनेवालों की भीड़ के बहाने `अग्रदूत’ और `तोराणा’ बंगलों पर भी कब्जा कर लिया। इससे भी वे आगे गए और पार्टी कार्यालय के लिए जगह चाहिए, इसलिए मंत्रालय के सामने `ब्रह्मगिरी’ बंगले पर कब्जा कर लिया।
मुख्यमंत्री पद पर `निस्वार्थ व्यक्ति’ एक ही समय में पांच-छह बंगलों पर कब्जा रखता है, यह महाराष्ट्र की राजनीति में एक रिकॉर्ड है।
अक्टूबर के पहले सप्ताह में हमारे हिम्मती मुख्यमंत्री को जान से मारनेवाला धमकीभरा ई-मेल आया। इस पर सुरक्षा तंत्र सतर्क हो गया। गृहमंत्री फडणवीस ने `जेड प्लस’ से भी ऊपरवाली सुरक्षा मुख्यमंत्री को दी।
राष्ट्र विरोधी प्रवृत्ति के कारण शिंदे को जान से मारने की धमकी दी, ऐसी घोषणा भी प्रवीण दरेकर ने की। मुख्ममंत्री ने कहा कि “कितनी भी धमकियां मिलने दो, मैं जनसेवा जारी रखूंगा” लेकिन इस धमकी के पीछे की सच्चाई एक बड़ा मजाक निकला। कॉल सेंटर के एक युवक ने पानी की बोतल की कीमत अधिक लगाए जाने से नाराज होकर शराब के नशे में होटल प्रबंधक को परेशान करने के लिए “मुख्यमंत्री शिंदे को जान से मारने का प्लान है” ऐसा कॉल `१००’ नंबर पर किया था। हालांकि बाद में इसका खुलासा हुआ, लेकिन भाजपावाले मामले को राष्ट्रविरोधी स्तर तक ले जाकर रख दिए।
उद्धव ठाकरे मंत्रालय में नहीं जा रहे, इस तरह की आपत्ति शिंदे और फडणवीस की थी, लेकिन मुख्यमंत्री शिंदे केवल आठ दिनों में एक बार वैâबिनेट के दिन ही मंत्रालय में जाते हैं ये अब सामने आ गया है। मुख्यमंत्री के कार्यालय को उनके गिरोह के विधायक चला रहे हैं।
•  शिंदे बार-बार यह कहते हैं कि मुख्यमंत्री के तौर पर मैं जनता की सेवा कर रहा हूं। शिंदे कौन-सी सेवा करते हैं यह अब स्पष्ट हो गया है। शिवसेना के पदाधिकारियों को कार्रवाई की धमकियां देकर अपने गुट में लाना यही उनकी जनसेवा है। जो सुनते नहीं उन्हें तड़ीपार की नोटिस, शिवसैनिकों के भरण-पोषण करनेवाले उद्योगों को नोटिस जारी कर उन्हें बेघर, बेरोजगार करने की जनसेवा शिंदे कर रहे हैं। ठाणे-पालघर जिले के कई शिवसैनिकों के आवासों को अचानक से अवैध घोषित कर उसे बुलडोजर लगाकर तोड़ने के लिए सैकड़ों नोटिस जारी किए जाने की खबरें आई थीं। यह एक अलग `जनसेवा’ दिख रही है।
ठाणे में महाप्रबोधन यात्रा के लिए गए शिवसेना नेताओं पर मामले दर्ज किए गए। विनायक राऊत, भास्कर जाधव, सुषमा अंधारे का अपराध इतना ही है कि उन्होंने ठाणे के शिवसेना समारोह में मुख्यमंत्री शिंदे की नकल की और लोगों ने उस नकल की सराहना की। इससे शिंदे और उनकी सरकार चिढ़ गई।
इस समय हमारे मुख्यमंत्री को लेकर हर दिन ऐसी ही मजेदार, दिलचस्प खबरें सामने आ रही हैं। एक शासक को आलोचना सहन करनी चाहिए, सहनशीलता रखनी चाहिए। हैरानी की बात यह है कि शिंदे पर आलोचना करने में कांग्रेस और राकांपा नेता सबसे आगे हैं, लेकिन शिंदे पलटवार कर रहे हैं शिवसेना पर क्योंकि भाजपा को तो वही चाहिए।
बुरे अंत की शुरुआत
श्री शिंदे की जनसेवा का एक और ताजा उदाहरण देता हूं। शिवसेना विधायक रमेश लटके के निधन के बाद वहां उपचुनाव की घोषणा हो गई। रमेश लटके की पत्नी ऋतुजा लटके के उम्मीदवारी की घोषणा उद्धव ठाकरे ने की। चुनाव लड़ना ही है, यह तय होने के बाद श्रीमती लटके ने मुंबई मनपा में अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दिया लेकिन मनपा आयुक्त ने इसे मंजूर नहीं किया। लटके जब शिंदे गुट और भाजपा गठबंधन की उम्मीदवार बनेंगी तभी इस्तीफा स्वीकार करेंगे, ऐसा उनसे कहा गया। इस्तीफा मंजूर नहीं हुआ तो लटके भी मुश्किल में पड़ जाएंगी और वे चुनाव नहीं लड़ पाएंगी। लटके पर शिंदे गुट में शामिल हों, यह पहला दबाव और मनपा उनका इस्तीफा मंजूर न करे, यह दूसरा दबाव! जनसेवा का यह अनोखा उदाहरण राज्य में घटित हुआ है। श्री शिंदे को शिवसेना को तोड़ने के इनाम के तौर पर राज्य का मुख्यमंत्री पद मिला। नारायण राणे और उसके पहले भुजबल जैसे नेताओं को भी यह `लाभ’ नहीं मिला, लेकिन शिंदे ने राज्य का नेतृत्व करने और नेता के तौर पर प्रतिष्ठा कमाने के अवसर को गवां दिया। अब ऐसा दिखाई दे रहा है कि भाजपा उनका इस्तेमाल `कॉन्ट्रैक्ट किलर’ की तरह शिवसेना के कांटे को निकालने के लिए कर रही है। यह लोगों को रास नहीं आ रहा है। बीकेसी की दशहरा रैली और उसमें डेढ़ घंटे तक पढ़े गए भाषण के चलते शिंदे नेता नहीं, बल्कि `कॉन्ट्रैक्ट किलर’ की भूमिका में हैं, इस भूमिका की छाप देखी गई। फिर से “मेरी शिवसेना असली है” और उसके लिए भाजपा के तंत्र को हाथ में लेकर उन्होंने बालासाहेब ठाकरे की शिवसेना को समाप्त की, यह चिढ़ वाला और आक्रोश पैदा करनेवाला विषय। शिंदे के अधोपतन की यह शुरुआत है। मेरे पोते का जन्म हुआ और उद्धव ठाकरे का अधोपतन शुरू हो गया, ऐसा जो बीकेसी की रैली में उन्होंने कहा, वो सच नहीं है। शिवसेना को तोड़ने के बाद शिंदे खलनायक बन गए और लोग उनका तिरस्कार (Hate) कर रहे हैं। यह किसका अधोपतन है? मुख्यमंत्री पद यह सफलता नहीं है। लाचारी और गुलामी है। महाराष्ट्र यह देख रहा है। फिर शिवसेना को `मशाल’ चिह्न मिलते ही उस मशाल को चुनौती देने के लिए समता पार्टी के लोगों को शिवसेना के खिलाफ खड़ा किया गया। बीते कई सालों से समता पार्टी और उसकी मशाल कहीं नहीं थी। ये सभी वित्तीय कारोबार और खोकों का प्रताप है। व्यभिचार से प्राप्त सत्ता का मोल नहीं होता और शिवसेना को समाप्त करने की ईर्ष्या से काम करनेवाले महाराष्ट्र में टिक नहीं सके, यह ध्यान में रखना चाहिए। महाराष्ट्र में हर दिन कई पोते और परपोते पैदा होते हैं। उनके आशीर्वाद से शिवसेना मशाल की तरह जलती रहेगी।
महाराष्ट्र, मराठी लोगों की जरूरत के तौर पर शिवसेना का जन्म हुआ था। जन्मदाता से व्यभिचार कर मिलनेवाला सुख अधिक समय तक नहीं टिकता है, ऐसा हिंदू शास्त्र कहते हैं। अयोध्या से आए संत-महात्माओं ने शिंदे को इस शास्त्र से अवगत नहीं कराया, यह ताज्जुब की बात है!
शिवसेना से अलग होकर स्वतंत्र रूप से काम करने में कोई आपत्ति नहीं लेकिन शिंदे को भाजपा ने एक कॉन्ट्रैक्ट किलर के रूप में इस्तेमाल किया। ऐसे कॉन्ट्रैक्ट किलर्स का राजनीतिक अंत भी बुरा होता है। महाराष्ट्र का इतिहास और हिंदू धर्मशास्त्र यही दर्शाता है!
ऐसे समय खोके निरुपयोगी साबित होते हैं, इसका अहसास जल्दी होगा।
शिंदे, अभी समय नहीं बीता! खुद को नियंत्रित कर सकते हैं तो देखें!!

अन्य समाचार