मुख्यपृष्ठनए समाचाररोखठोक : किसानों ने गांव बेचने को निकाला! ...हमारे राज्यपाल कहां हैं?

रोखठोक : किसानों ने गांव बेचने को निकाला! …हमारे राज्यपाल कहां हैं?

कड़कनाथ मुंबैकर
`महाराष्ट्र के किसान फसल और पानी के साथ महाप्रलय में बह गए। पुलिस के तबादलों पर मुख्यमंत्री शिंदे नाराज हैं। उपमुख्यमंत्री श्री फडणवीस स्वतंत्र रूप से काम कर रहे हैं। एक-दूसरे पर रोजाना कीचड़ उछालने वाले नेता क्रिकेट के मैदान में दोपहर के भोजन के लिए एकत्र होते हैं लेकिन राज्य के बाढ़ प्रभावित किसानों ने अपने गांवों को बेचने के लिए निकाला है। हमारे राज्यपाल को क्या यह पता है?

दिवाली साल में एक बार आती है लेकिन राजनीति के पटाखे किसी भी समय फूटते रहते हैं। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री श्री एकनाथ शिंदे पुलिस विभाग में हुए तबादलों पर नाराज हुए और सातारा स्थित उनके गांव जाने की जानकारी एक खबरिया चैनल ने दी। यह उतना सच नहीं लग रहा है। मुख्यमंत्री नाराज हुए होंगे तो भी श्री फडणवीस को दुत्कार, थोड़ा नाराज होकर गांव जाकर बैठेंगे, ऐसी स्थिति नहीं है। क्योंकि भारतीय जनता पार्टी की मेहरबानी पर उनका मुख्यमंत्री पद टिका हुआ है और शिंदे का राजनीतिक अस्तित्व उसी मुख्यमंत्री पद पर ही टिका है। इसलिए भाजपा श्री शिंदे को गुदगुदी करके मारेगी। भारतीय जनता पार्टी के एक वरिष्ठ नेता `सह्याद्रि’ पर मिले। वे हंसते-हंसते बोले, `सरकार शिंदे गुट के चालीस विधायक चला रहे हैं और मुख्यमंत्री के कार्यालय पर उनका ही कब्जा है। विधायकों के हठ के आगे हमारे मुख्यमंत्री मजबूर हो गए हैं। अन्य विधायकों के काम नहीं हो रहे।’
`फिर आप भाजपा के लोग यह सहन क्यों कर रहे हो?’
`सहन करने का सवाल ही नहीं। शिंदे सरकार की स्थिति नई प्रसूता जैसी हो गई है। थोड़ा समय दो उन्हें।’
`आगे क्या?’
`आगे का आगे।’
मुख्यमंत्री शिंदे के लिए यह खतरे की घंटी है। भारतीय जनता पार्टी ने शिंदे और उनके कुछ लोगों को `ईडी’ वगैरह के फंदे से अभी के लिए बचा लिया। लेकिन इन सभी को हमेशा के लिए गुलाम बनाकर रख लिया है। सरकार के सभी निर्णय उपमुख्यमंत्री श्री फडणवीस लेते हैं और मुख्यमंत्री शिंदे उन निर्णयों की घोषणा करते हैं। अब दिल्ली भी फडणवीस, एकनाथ शिंदे के बिना चले जाते हैं।
किसानों की दिवाली
महाराष्ट्र में दिवाली किसानों के लिए ठीक नहीं है। हर तरफ महाप्रलय है और किसानों की खरीफ और रबी की फसलें बह गर्इं। किसान संकट में हैं। अगले कुछ दिनों में महाराष्ट्र में बाढ़ घोषित किया जाएगा। लेकिन हमारे सर्वदलीय किसान नेता मुंबई के क्रिकेट संघ चुनाव के लिए एक साथ आए और उन्होंने वानखेड़े मैदान पर दोपहर का स्नेहभोजन किया। मुख्यमंत्री शिंदे, उपमुख्यमंत्री फडणवीस, श्री शरद पवार और शिवसेना के लोग भी इसमें शामिल हुए। यह `स्नेह’ बाकी समय कहां अदृश्य था? आज क्रिकेट में भारी मात्रा में पैसा निवेश किया गया है और वह एक लाभदायक उद्योग बन गया है। मुंबई समेत भारतीय क्रिकेट उद्योगों पर अपना नियंत्रण रहे इसके लिए बीते कुछ सालों से उठा-पठक शुरू हुई है। क्रिकेटरों के अर्थात खिलाड़ियों के हाथ खेल संगठनों का संचालन रहे, इसलिए यह नियम लोढा समिति ने बनाया। वो अब बदल गया और संदीप पाटील को पराजित करने के लिए सभी राजनीतिक नेता मतभेदों को भुला एक साथ आ गए। कम-से-कम मुख्यमंत्री शिंदे को संदीप पाटील का पक्ष लेना चाहिए था लेकिन फुटबॉल से लेकर क्रिकेट तक हर जगह नेताओं का खेल चलता है। यह सच है तो भी पिछले कुछ वर्षों में इस क्षेत्र में राजनेताओं के शामिल होने से कई अच्छी चीजें भी हुई हैं। राजनीति का ही खेल और उसमें फिक्सिंग आने पर खेल में ही राजनीति आ गई, इसलिए दोष क्यों दें? क्रिकेट के मैदान पर सर्वदलीय नेता स्नेहभोजन के लिए आते हैं। हम खेल में राजनीति नहीं लाते, ऐसी घोषणा करते हैं और उस मैदान से खिलाड़ियों को पत्थरों की तरह बाहर फेंक देते हैं।
अस्थाई व्यवस्था
मुख्यमंत्री पद पर शिंदे, यह भाजपा द्वारा की गई अस्थाई व्यवस्था है। उनके मुख्यमंत्री पद की वर्दी कभी भी उतार ली जाएगी, ये अब सभी समझ चुके हैं। शिंदे के `तोतया’ गुट से अंधेरी (पूर्व) के उप चुनाव में उम्मीदवार खड़ा किया जाना चाहिए था लेकिन भाजपा ने इसे टाल दिया। महाराष्ट्र की ग्राम पंचायत, सरपंच चुनाव में शिंदे गुट की सफलता का दावा झूठा है। शिंदे गुट के कम-से-कम २२ विधायक नाराज हैं। इनमें से ज्यादातर विधायक खुद को भाजपा में विलीन कर लेंगे, ऐसा साफ दिख रहा है। उसके बाद शिंदे का क्या होगा? ऐसा जब मैंने उनके एक नेता से इस बारे में पूछा तो उन्होंने कहा, `शिंदे का रामदास आठवले होगा।’ यह कथन सही है। एकनाथ शिंदे ने अपने साथ ही महाराष्ट्र को काफी नुकसान पहुंचाया। इसलिए महाराष्ट्र उन्हें माफ नहीं करेगा। शिंदे को तोप के मुंह के सामने खड़ा करके भाजपा अपनी राजनीति करती रहेगी। भाजपा नेता सीधे कहते हैं, `शिंदे को भी कल भाजपा में ही विलय होना होगा और उस समय वे नारायण राणे की भूमिका में होंगे।’ अगर ऐसा हुआ तो शिंदे ने क्या हासिल किया? मुख्यमंत्री के तौर पर महाराष्ट्र के विकास में उनका योगदान नजर नहीं आता। हर जगह देवेंद्र फडणवीस दिख रहे हैं। देश की राजधानी में शिंदे का कोई प्रभाव नहीं है। देवेंद्र फडणवीस मंगलवार को दिल्ली गए और मुंबई झोपड़पट्टी मुक्त करने की महत्वाकांक्षी नीति के तहत धारावी पुनर्विकास परियोजना को लेकर रेलवे की तरफ से महाराष्ट्र सरकार को आवश्यक जमीन के लिए रेल मंत्रालय से मंजूरी ले आए। धारावी के पुनर्विकास का पूरा श्रेय इसलिए श्री फडणवीस और भाजपा को जाएगा। इस महत्वपूर्ण परियोजना की घोषणा में राज्य के मुख्यमंत्री कहीं नहीं हैं। पुलिस के तबादलों और अपने अधिकारियों की नियुक्ति में उन्हें अधिक रुचि है क्योंकि उनके चालीस विधायकों को यही सब चाहिए। गृहमंत्री श्री फडणवीस ने तबादला मामले पर किसी की नहीं सुनी, उस समय मुख्यमंत्री शिंदे नाराज हो गए और सातारा अपने गांव चले गए, ऐसी खबर समाचार पत्रों में प्रकाशित हुई थी। वे सीधे क्रिकेट के मैदान में स्नेहभोजन के लिए अवतरित हुए। मुख्यमंत्री और उनका गुट इस समय क्या करता है? मूल शिवसेना के प्रत्येक काम में बाधा उत्पन्न वैâसे की जा सकती है, इसे लेकर हरसंभव प्रयास करता है। ठाणे में `दिवाली पहाट’ कार्यक्रम के लिए शिवसेना को मासुंदा तालाब परिसर न मिले इसलिए फिर से हाई कोर्ट में जाना पड़ा और ठाणे मनपा द्वारा शिंदे गुट ने सबसे पहले अनुमति मांगी है, यह हवाला देते हुए सांसद राजन विचारे को अनुमति देने से इंकार कर दिया। लेकिन दशहरा रैली को लेकर शिवाजी पार्क मैदान में इस नियम का पालन नहीं किया गया। राज्य के मुख्यमंत्री को भाजपा ने इसी तरह की गतिविधियों में उलझाए रखा है।
राज्यपाल लापता!
महाराष्ट्र के महामहिम राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी अब कहां भूमिगत हो गए हैं, इस बारे में कोई खुलासा करेगा क्या? मूलरूप से हमारे राज्यपाल राजभवन में हैं या नहीं, इसे गृहमंत्री श्री फडणवीस को जनता के सामने लाना चाहिए। `ठाकरे’ सरकार के दौरान मौजूदा राज्यपाल महोदय काम करते-करते थकते जा रहे थे। बाढ़ की स्थिति में स्वतंत्र दौरा आयोजित कर प्रशासन को अलग निर्देश दे रहे थे। कई अन्य प्रशासनिक कार्यों में सीधे तौर पर उनका हस्तक्षेप था। मुख्यमंत्री को लेकर उनका मन साफ नहीं था और वे मंत्रियों को राजभवन में बुलाकर सलाह-सुझाव देते थे। महाराष्ट्र में महिलाओं की सुरक्षा, कानून और सुव्यवस्था, विश्वविद्यालयों के काम-काज के बारे में बेहद जागरूक थे। छत्रपति शिवाजी महाराज से लेकर सावित्रीबाई फुले तक उन्होंने विवादित बयान देकर खलबली मचा दी थी। ऐसे हमारे कार्यकुशल राज्यपाल आज कहां हैं? उनके ज्ञान, अनुभव का मार्गदर्शन शिंदे-फडणवीस सरकार को न हो, यह आश्चर्य की बात है। सच तो यह है कि राजभवन अब हस्तक्षेप न करे, निवृत्त प्रवचनकार की तरह रहें, इस तरह के राजनीतिक आदेश का राज्यपाल महोदय पालन कर रहे हैं। राज्यपाल के पास वास्तव में करने के लिए कुछ नहीं बचा होगा, फिर भी मुंबई के भाजपा नेताओं की `डॉक्टरेट’ डिग्री की जांच का आदेश कम-से-कम उन्हें देना चाहिए। कुल मिलाकर, राज्यपाल इस दिवाली पर कोई भी लवंगी पटाखे फोड़ने के मूड में नहीं हैं। महाराष्ट्र के किसान महाप्रलय में ऊपर-नीचे डुबकी खा रहे हैं। उनकी फसल बह गई। उन्हें कोई सरकारी सहायता नहीं मिली। हालांकि राज्यपाल ने किसानों के आक्रोश पर हस्तक्षेप नहीं किया। अर्थात, राज्यपाल को ऐसे हस्तक्षेप करने के लिए राज्य में इस समय क्या ठाकरे की सरकार सत्ता में है? राज्यपाल की यह दिवाली वैसे ही ठंडी दिख रही है। राज्यपाल और शिंदे-फडणवीस सरकार की जानकारी के लिए अखबार में छपी एक खबर देता हूं और विषय को खत्म करता हूं।
`सेनगाव तालुका में (जि. हिंगोली) गारखेडा परिसर में मूसलाधार बारिश के चलते भारी तादाद में नुकसान हुआ है। किसान परेशानियों से घिर गए हैं। इसलिए ग्रामीणों ने पत्र भेजकर अपने गांव की बिक्री निकाली है। गांव बिक्री का फलक भी उन्होंने गांव में लगाया है!’
यह तो शुरुआत है!
मुंबई क्रिकेट एसोसिएशन किसानों का ये गांव खरीदेगा क्या?
kadaknathmumbaikar@gmail.com

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