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रोखठोक : दान-धर्म की उल्टी गंगा!

कड़कनाथ मुंबैकर
‘देश में सर्वाधिक अमीर और दानवीर व्यक्तियों की सूची प्रकाशित हुई। इसमें नया क्या है? वही अमीर वही उद्योगपति। दानवीर लोगों की सूचियां प्रसारित नहीं होती थीं, उस समय भी ‘दानी’ थे ही। आज दान-धर्म से अधिक दानवीर कहलवाने वालों का ही प्रचार अधिक हो रहा है।

एक हाथ से दिया गया दान दूसरे हाथ तक को पता नहीं चलना चाहिए, ऐसा हमारा शास्त्र कहता है। हाल ही में देश के सबसे अमीर और दानवीर लोगों की सूची प्रकाशित हुई है। कर्ण जैसा दानी कोई नहीं हुआ, ऐसा आज भी कहा जाता है, लेकिन वर्तमान युग में अमीरों और दानवीरों की सूचियां प्रकाशित होने लगी हैं। देश में सर्वाधिक दान करने वाले उद्योगपतियों की सूची घोषित हुई। इसमें ‘आईटी’ क्षेत्र में बड़े नामों में शुमार शिव नाडर पहले स्थान पर हैं। श्री नाडर ने पिछले साल १,१६१ करोड़ रुपए दान किए। बीते तीन वर्षों में नाडर ने ३,२११ करोड़ रुपए का दान किया है। विप्रो के अध्यक्ष अजीम प्रेमजी दान-धर्म में दूसरे स्थान पर खिसक गए। प्रेमजी ने बीते सालभर में ४८४ करोड़ का दान किया। तीन वर्षों में उन्होंने १,८०१ करोड़ रुपए दान किए। मुकेश अंबानी, कुमार मंगलम बिरला, नंदन नीलकेणी, अनिल अग्रवाल इस तरह के कई अमीरों ने इस कालावधि में काफी दान किया। एशिया में सबसे अमीर व्यक्ति गौतम अडानी दानवीरों की सूची में सातवें पायदान पर हैं। उन्होंने बीते एक साल में १९० करोड़, जबकि तीन वर्षों में ४०८ करोड़ रुपए दान किया। यह दान वास्तव में कहां जाता है? सामाजिक, शैक्षणिक क्षेत्रों में, गरीबी निर्मूलन, साक्षरता जैसे कामों में दान की यह राशि इस्तेमाल की जाती है। लेकिन फिर भी देश में गरीबी का निर्मूलन हुआ है क्या?
अमीरी बढ़ रही है!
हिंदुस्थान में गरीबी बढ़ रही है। क्योंकि मुट्ठीभर लोगों की अमीरी में ही वृद्धि हो रही है। हिंदुस्थान के १०० सबसे अमीर व्यक्तियों की संपत्ति करीब ८० हजार करोड़ से अधिक है। अडानी उद्योग समूह के प्रमुख गौतम अडानी पहले स्थान पर हैं। उन्होंने अंबानी को भी पछाड़ा है। क्योंकि केंद्र की सरकार पूरी तरह से अडानी के पीछे खड़ी है। ‘फोर्ब्स’ ने २०२२ की सर्वाधिक अमीरों की सूची जारी की। इसमें १०० अरबपति भारतीयों की संपत्तियों में २५ अरब डॉलर्स की वृद्धि हुई है। अमीरों की सूची में शामिल व्यक्तियों की कुल संपत्तियों में से ३० फीसदी संपत्ति अडानी और अंबानी के पास है। लेकिन एक समय मुंबई शहर में ऐसा था कि यहां अंबानी-अडानी नहीं थे। एक दूसरे में संपत्ति और अमीरी की प्रतियोगिता नहीं थी। ऐसे कई व्यक्ति उनकी अमीरी की अपेक्षा दानवीरता से प्रख्यात हुए। उसमें नाना शंकर शेठ का नाम अग्रणी है। नाना की दानशूरता ने मुंबई की शोभा को और बढ़ा दी। सर जमशेदजी जीजीभॉय, प्रेमजी कावसजी, वाडिया, टाटा इन पारसी दानवीरों की मंडली में उदारता निस्वार्थ थी। मुंबई में स्कूलों, अस्पतालों, श्मशान, इतना ही नहीं प्राणियों के लिए करुणा-दया वश निर्माण किए गए अस्पताल उनकी उदारता की गवाही आज भी देते हैं। उस समय अंग्रेजों का राज था और दान-धर्म के बदले में इन मंडलियों ने सरकार की तरफ से कोई भी अपेक्षा नहीं की थी। यही है दान की व्याख्या। मंदिर की दान पेटियों में आम जनता भी ‘दान’ डालती है। उन दान पेटियों पर राजनीतिज्ञों द्वारा नियुक्त न्यासी मंडल नियंत्रण रखता है और अपनी पसंद के अनुसार लोगों को ‘दान-धर्म’ करता रहता है। मंदिर के दान पात्रों पर कब्जा हासिल करने के लिए मंदिरों पर कब्जा रखने की स्पर्धा चल रही है। तिरुपति से लेकर शिर्डी संस्थान तक कुछ भी अलग नहीं हो रहा है।
देशभर में मंदिरों की संख्या ३० लाख तक है। छोटे-बड़े मंदिरों को मिलाकर यह एक करोड़ तक पहुंच जाएगी। मंदिरों को प्रतिदिन मिलने वाला चंदा करोड़ों में होता है। भले ही मंदिर श्रद्धा के स्थान हैं फिर भी अपवाद को छोड़ दें तो एकरूपता, उचित प्रबंधन का अभाव होने के कारण मंदिर और उनकी संपत्तियों का समुचित उपयोग समाज की प्रगति के लिए जैसा होना चाहिए वैसा नहीं होता है। इसके लिए यूनिवर्सिटियों को टेंपल मैनेजमेंट का पाठ्यक्रम शुरू करना चाहिए। इससे तैयार होने वाली नई पीढ़ी इस कार्य में आगे आती है तो यही ३० लाख मंदिर देश में क्रांतिकारी बदलाव ला सकते हैं, ऐसा विचार डॉ. सुरेश हावरे ने व्यक्त किया, जो कि महत्वपूर्ण है। डॉ. हावरे ये ‘साईबाबा संस्थान ट्रस्ट’ के अध्यक्ष थे और उस दौरान उन्होंने बेहतरीन काम किया। मंदिरों की दान पेटियां जनता की, समाज की और देश की होती हैं, यह न्यासियों को नहीं भूलना चाहिए। तिरुपति, साई संस्थान, शिर्डी के न्यासी बोर्ड पर आने के लिए राजनेता, उद्योगपति और प्रशासनिक लॉबी की जोरदार लॉबिंग चलती है। तो किसलिए?
शिंदे गुट का दान
महाराष्ट्र में करीब-करीब सभी जिलों में वापस लौटती बारिश ने हाहाकार मचाया। किसानों के मकान, पशुओं सहित खड़ी फसलें बह गर्इं। उसी बीच दिवाली आ गई। शहरों में दिवाली की खरीददारी की भीड़ के बीच गांवों के घरों में एक दीया जलाना भी अपार हो गया। गांवों के छोटे बच्चों का आक्रोश जब सोशल मीडिया पर व्यक्त हुआ, तब कई लोगों का मन व्यथित हो गया। सरकार ने ‘आनंद का शिधा’ नामक सौ रुपए की योजना शुरू की। वह लोगों तक पहुंची ही नहीं। उस पर मीडिया में आलोचना शुरू होते ही सरकार के मंत्रियों में शामिल ‘दाता’ जाग उठे। उसका एक उदाहरण मराठवाड़ा के सिल्लोड का। आनंद का शिधा मुफ्त देने की घोषणा हुई। लेकिन उस आनंद का शिधा पर साफ शब्दों में छापा-‘हम एकनाथ शिंदे गुट के!’ इसे वैâसा परोपकार कहना चाहिए? यह तो दान की कालाबाजारी है! जो दान प्रचार के बिना होता है, वही असली दान। आज समाज सेवा और दान करने वालों का फोटोसेशन मतलब बीमारी की लहर ही है। रुपए का दान और हजार रुपए का प्रचार। दूसरा ऐसा कि प्राकृतिक आपदा के समय अमीर लोग ढेरों चंदा देते होंगे, ऐसा हम समझते हैं; लेकिन वह उतना सही नहीं है। उसके विपरीत मध्यमवर्गीय और अल्प मध्यवर्गीय लोग ही खुले हाथों से मदद करते हैं, ऐसा सुधा मूर्ति ने एक जगह कहा, जो कि सही है।
सुधा मूर्ति का दान
नारायण मूर्ति और सुधा मूर्ति के इन्फोसिस फाउंडेशन ने विभिन्न क्षेत्रों में बड़े स्तर पर दान दिया। लेकिन दान देते समय श्री मूर्ति मीडिया के सामने दिखाई नहीं दिए। सुधा मूर्ति ने दानशूरता की महत्ता और संस्कृति अपने भाषणों और लेखनी से बताई। सुधा मूर्ति एक गांव-देहात में छोटे से बड़ी हुर्इं। उनके दादा स्कूल में शिक्षक थे। दान-धर्म का जो महत्व उनके दादा ने मन में डाला वह सही है। दादा ने सुधा मूर्ति से कहा, ‘बेटी, ये देखो… हमें जब दूसरों को कुछ देना हो तो हमेशा अपने पास जो अच्छे में अच्छा हो वह देना चाहिए। निकृष्ट गुणवत्तावाला कभी नहीं देना चाहिए। यह सबक मैनें जीवन से सीखा। भगवान किसी मंदिर, मस्जिद अथवा चर्च में नहीं रहते। वो लोगों के बीच रहते हैं। हमारे पास जो कुछ भी होगा यदि हम वह देकर लोगों की सेवा करेंगे, तो वह सही मायने में ईश्वर की ही सेवा होती है।’ सुधा मूर्ति कहती हैं, ‘मेरे दादा ने इस सवाल का जवाब थोड़ा अलग तरीके से दिया, ‘पांच हजार साल पहले हमारे पूर्वजों ने वेदों के जरिए हमें बहुत ही सरल सिद्धांत सिखाए हैं:
• दान-धर्म करते समय मृदुल शब्दों का प्रयोग करें।
• दान-धर्म खुशी से करें।
•  दान-धर्म दिल और आत्मा से करें।
•  केवल जरूरतमंद व्यक्तियों को ही दान दें।
• दान-धर्म करते समय मन में कोई भी अपेक्षा न रखें। क्योंकि दान-धर्म यह चंदा नहीं, बल्कि हमारा कर्तव्य है।
•  दान-धर्म करते समय अपनी पत्नी की सहमति ले लें।
• दान-धर्म करते समय एक ही बात का विचार करें। दान स्वीकार करने वाले लोगों को आश्रित और असहाय न बनाएं।
• दान-धर्म करते समय जाति-धर्म का विचार मन में भी न आने दें।
• दान-धर्म करते समय मन में ऐसी इच्छाएं पैदा करें कि हमसे दान स्वीकार करने वाला समृद्ध हो जाए।
ऐसा दान आज कितने लोग करते हैं?
स्वतंत्रता की लड़ाई में गांधी के राजनीतिक और धार्मिक कार्यों में कई धनियों ने खुले हाथों से मदद की। बिरला, बजाज ऐसे उद्योगपति उसमें थे। दानदाताओं और दानवीरों की सूची उस समय प्रकाशित नहीं होती थी। फिर भी लोग दान कर रहे थे। तिलक के स्वराज्य फंड में आम लोगों ने दान डाला। महाराष्ट्र में पचास विधायक खरीदने के लिए प्रत्येक को पचास-पचास ‘खोखों’ का ‘दान’ दिया गया। दान के इस अंतर को समझ लेना चाहिए।
पितामह भीष्म कहते हैं,
‘दरिद्रान् भर कौंतेय मा
प्रयच्छेश्वरं धनम्।
अर्थात गरीबों को पैसे दें। अमीरों को न दें। लेकिन आज दान की गंगा उल्टी दिशा में बह रही है। देश में, महाराष्ट्र में गरीबी, कुपोषण के बलि चढ़ रहे हैं। आदिवासी महिलाओं की प्रसूति सड़कों पर, झोली में हो रही है। आदिवासी पाड़ों में इलाज का प्रबंध नहीं! फिर ये अरबों-अरब रुपयों का दान कहां जाता है? कोई इस पर प्रकाश डालेगा क्या?
kadaknathmumbaikar@gmail.

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