मुख्यपृष्ठनए समाचाररोखठोक : दलदल में फंस गई लोकतंत्र की ‘गंगा विलास’!

रोखठोक : दलदल में फंस गई लोकतंत्र की ‘गंगा विलास’!

संजय राऊत -कार्यकारी संपादक

काशी से छूटी ‘गंगा विलास’ बोट तीसरे ही दिन दलदल में फंस गई। देश का लोकतंत्र और आजादी वैसे ही दलदल में फंसी हुई है। प्रसार माध्यमों पर दबाव है। स्वतंत्रता का आखिरी गढ़ ‘न्यायपालिका’ भी ढहती नजर आ रही है। राहुल गांधी की ‘भारत जोड़ो’ यात्रा को प्रतिसाद मिल रहा है। इसलिए प्रधानमंत्री मोदी ने दिल्ली के पटेल चौक पर ‘रोड शो’ किया। इसे क्या कहा जाए?

अखबारों में खबरें पढ़कर पहले मन में गुस्सा पैदा होता था। अब भरपूर मनोरंजन होता है। अखबारों के अधिकांश जगहों पर अब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया छा गया है। वहां तो खबरों का ‘हास्य मेला’ ही चल रहा है। फिलहाल, भारी मनोरंजन ही चल रहा है। इसलिए महाराष्ट्र का भविष्य क्या? देश का क्या होगा? ऐसे व्यर्थ सवाल मन में उठते ही नहीं हैं। देश के गृहमंत्री अमित शाह झारखंड गए। वहां भाजपा की सरकार नहीं है। हेमंत सोरेन मुख्यमंत्री हैं। उनकी सरकार को लक्षित करते हुए हमारे गृहमंत्री ने कहा, ‘युवाओं को नौकरी देने की ताकत नहीं होगी, तो कुर्सी खाली करो!’ श्री शाह यह भूल गए कि वे देश के गृहमंत्री हैं और युवाओं को नौकरी देना, यह उनकी केंद्र सरकार का कर्तव्य है। वैसा वचन लेकर वे दो बार देश की सत्ता में आए, लेकिन क्या युवाओं को नौकरी मिली? रोजगार के तमाम साधन एक ही राज्य गुजरात की ओर मोड़े जा रहे हैं। इस सच्चाई को आज कोई भी नकार नहीं सकता है। कोई भी अखबार और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया इस बारे में बात नहीं करेगा, क्योंकि अन्य सभी तंत्रों की तरह मीडिया भी दबाव में है।
द्वेष की राजनीति
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के ‘एंकर’ देश में द्वेष का माहौल तैयार कर रहे हैं। जाति-धर्म का झगड़ा भड़का रहे हैं। इसके घातक होने का निष्कर्ष देश के सर्वोच्च न्यायालय ने निकाला है। भारतीय जनता पार्टी की राजनीतिक नीति को इलेक्ट्रॉनिक मीडिया आगे बढ़ा रहा है। इसलिए मीडिया की आजादी यह सिर्फ एक मुखौटा भर बनकर रह गई। वर्तमान शासकों को उनके खिलाफ की जानेवाली टिप्पणियां पसंद नहीं आती हैं। इसलिए अपने पसंदीदा कारोबारियों से कहकर इन सभी मीडिया संस्थानों को खरीदने का सत्र फिलहाल चल रहा है। देश के तमाम स्तंभ उद्योगपतियों द्वारा खरीद लिए जाने के बाद बचा क्या? यह सवाल उठना चाहिए। पंडित गोविंद वल्लभ पंत उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। उस समय नेहरू द्वारा स्थापित किया गया पत्र ‘नेशनल हेराल्ड’ कई बार पंत सरकार के कामकाज की आलोचना करता था। पंत को ये पसंद नहीं आया। उन्होंने अपने सहयोगियों के जरिए ‘हेराल्ड’ के शेयर खरीदने की मुहिम चलाई थी। इंदिरा गांधी ने नेहरू को पत्र लिखा और कहा कि ‘पंतजी को केवल ‘जी हजूरी’ करनेवाले चाहिए।’ ‘हेराल्ड’ की आलोचना वे सह नहीं पाते हैं। वे जिन्हें ‘हेराल्ड’ के निदेशक मंडल में लेनेवाले हैं, उनमें से एक कालाबाजारी वाला है, ये हर कोई जानता है। आप बहुत सी चीजें चला लेते हो लेकिन जिस पत्र से आपका संबंध है वो कालाबाजारी वाले चलाएं, ऐसा आपको लगता है क्या? आप पंतजी को ‘हेराल्ड’ में दखल देने से रोकें। वे सरकारी अधिकारियों का भी इस्तेमाल शेयर खरीदने, पैसे जुटाने के लिए कर रहे हैं।’ इस पत्र का नेहरू ने सौम्य उत्तर देते हुए सलाह दी कि इतना कड़ा रुख अपनाने का कोई कारण नहीं है। आगे इंदिरा गांधी ने लिखा कि ‘आपका संतुलन नहीं बिगड़ा। इस प्रकार ‘हेराल्ड’ में ईमानदार लोग भी छोड़कर चले जाएंगे और एक दिन यह बंद हो जाएगा।’ यह सामान्य बात है, ऐसा कहते हुए वे लिखती हैं कि मुख्य समस्या कुल मिलाकर जो अधोगति हो रही है वो है। ये चीजें छोटी हो सकती हैं, लेकिन ये छोटी चीजें दीमक लगने की शुरुआत के संकेत हैं। ऐसा सभी राज्यों में हुआ है। इसलिए कांग्रेस के प्रति लोगों में नाराजगी है। यह नाराजगी नहीं ऐसा आप कह सकते हैं क्या? हमारे अन्य अनेक दोषों के साथ पाखंड जोड़ने का कोई कारण नहीं है। ये सब इंदिरा गांधी ने साहसपूर्वक अपने पिता यानी प्रधानमंत्री नेहरू को लिखा, लेकिन जब वे खुद प्रधानमंत्री पद पर थीं तब उन्होंने इन विचारों को ध्यान में नहीं रखा। उससे ही आगे आपातकाल और अखबारों पर सेंसरशिप आई। उस सेंसरशिप के खिलाफ जो लड़े स्वतंत्रता भोगनेवाले वही लोग आज सत्ता में हैं और उन्होंने तो सभी ही मामलों में ढोंग की पराकाष्ठा को पार कर दिया है!
दिल्ली का ‘रोड शो’!
प्रधानमंत्री मोदी ने दिल्ली के पटेल चौक से एक भव्य ‘रोड शो’ किया। मंगलवार को दिल्ली की सड़कें इसकी वजह से कुछ देर के लिए जाम हो गर्इं। लोगों को फंसे रहना पड़ा। भारतीय जनता पार्टी की एक बैठक दिल्ली के एनडीएमसी कन्वेंशन सेंटर में हुई। उस बैठक के लिए हमारे प्रधानमंत्री पहुंचे, लेकिन सड़कों पर भारी शक्ति प्रदर्शन करते हुए। इसकी आवश्यकता थी क्या? लेकिन भाजपा ने यह शक्ति प्रदर्शन किया तो राहुल गांधी की ‘भारत जोड़ो’ यात्रा को जवाब देने के लिए। राहुल गांधी की ‘भारत जोड़ो’ यात्रा का दिल्ली में जोरदार स्वागत किया गया। देशभर में राहुल गांधी के स्वागत के लिए भारी भीड़ उमड़ रही है। उस भीड़ को जवाब देने के लिए भाजपा ने प्रधानमंत्री मोदी को सड़कों पर उतारकर दिल्ली में शक्ति प्रदर्शन किया है, तो यह मोदी की लोकप्रियता में राहुल गांधी का खौफ है। अखबार और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया राहुल गांधी की यात्रा को पब्लिसिटी देने को तैयार नहीं हैं। क्योंकि उन पर वैसा दबाव है, लेकिन उस समय प्रधानमंत्री के ‘रोड शो’ को पब्लिसिटी मिलती है। भारतीय जनता पार्टी की सरकारों ने ‘मीडिया’ पर कभी भी पाबंदियां नहीं लगार्इं। फिर सरकार चाहे अटल जी की हो अथवा मोदी जी की, श्री राजनाथ सिंह के इस बयान का झूठ सामने आता है। स्वतंत्रता से पहले के दौर में तिलक से लेकर गांधी तक कई नेताओं के इर्द-गिर्द भीड़ का घेरा रहता था। वे सब अकृत्रिम थे। ८ दिसंबर, १९१७ के ‘संदेश’ पत्र में लोकमान्य तिलक के मथुरा दौरे का विस्तृत विवरण है। ‘मथुरा में लोकमान्य’ इस शीर्षक को छोड़कर ‘तिलक की उचलपागड़ी’ (हटाना नहीं!) ऐसे स्वतंत्र शीर्षकवाली खबर है। यह खबर देते समय पत्रकार लिखता है कि गाड़ी पर इतनी भारी भीड़ उमड़ पड़ी कि तिलक के लिए गाड़ी से उतरना और बाहर निकलना असंभव हो गया। उस समय आगे मौजूद लोगों ने तिलक को उठा लिया। भारी भीड़ में सिर्फ एक पगड़ी दूर से नजर आ रही थी। तिलक का कुछ सामान गाड़ी में ही रह गया। उनका गमछा एक शख्स बचे हुए ‘प्रसाद’ के रूप में ले गया,’ ऐसा वर्णन संवाददाता ने किया। बाहर उन्हें लेने के लिए बग्घी खड़ी थी, लेकिन गाड़ी में घोड़े नहीं थे। उसे लोग खींचते हुए ले गए। मथुरा के शेठ भरोसीलाल खुद तिलक का स्वागत करने के लिए खड़े थे। यह पूर्व नियोजित शक्ति प्रदर्शन नहीं था। प्रचार, प्रसार, लोकप्रियता का कोई साधन नहीं होते हुए तिलक-गांधी के लिए भीड़ उमड़ पड़ती थी। आज तिलक-गांधी होते तो उनके आसपास भीड़ की उंगली भर भी खबर आई होती क्या, इस पर भी शंका होती है। राहुल गांधी को तवज्जो नहीं देते, ऐसा कहनेवाले राहुल के जवाब के तौर पर दिल्ली में भीड़ का ‘रोड शो’ करते हैं और इसे भरपूर पब्लिसिटी मिलती है!
अंतिम गढ़!
स्वतंत्रता के अंतिम स्तंभ न्यायपालिका पर भी मोदी सरकार कब्जा करने की कोशिश कर रही है। स्वतंत्रता का यह अंतिम गढ़ ढह गया तो लोकतंत्र का अंत हो जाएगा, ऐसा श्री कपिल सिब्बल ने कहा। इसमें तथ्य है। सरकार को न्यायपालिका पर नियंत्रण चाहिए और न्यायाधीशों के चयन की प्रक्रिया में सरकार का प्रतिनिधित्व होना चाहिए, ऐसा खुद कानून मंत्री किरण रिजिजू ने सार्वजनिक रूप से कहा। स्वतंत्रता के अंतिम स्तंभ पर सरकार को उसकी अपनी जीत का झंडा फहराना है। गंगा स्वच्छता की मुहिम प्रधानमंत्री मोदी ने शुरू की, लेकिन लोकतंत्र के आजादी की गंगा प्रतिदिन मटमैली होती जा रही है। स्वतंत्रता के अनेक स्तंभ उस गंगा में शवों के समान तैर रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने एक हफ्ते पहले ही वाराणसी के गंगा प्रवाह में सबसे बड़ी और लंबी बोट ‘गंगा विलास’ क्रूज का लोकार्पण किया था। योजना अच्छी है लेकिन यह ‘गंगा विलास’ बोट पहले ही सफर में बिहार की धारा में फंस गई और अटक गई। ५१ दिन की जलयात्रा के तीसरे दिन ही यह ‘क्रूज’ फंस गया। क्रूज का जल मार्ग तय करते समय क्या विशेषज्ञों को इस बात पर ध्यान नहीं देना चाहिए था कि यदि नदी की गहराई कम हुई तो क्रूज दलदल में फंस जाएगा?
भारतीय स्वतंत्रता और लोकतंत्र के साथ भी ठीक यही हुआ। गंगा की गहराई में ही लोकतंत्र ‘गंगा विलास’ बोट दलदल में बैठी है! दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की तरह ही फंसी हुई बोट भी बड़ी ही है!
प्रधानमंत्री अब क्या करेंगे?

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