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रोखठोक : और एक कश्मीर फाइल!

संजय राऊत- कार्यकारी संपादक : ‘द कश्मीर फाइल्स’ यह फिल्म फिलहाल सुर्खियों में है। ३२ वर्षों बाद वास्तविक इतिहास सामने आने का दावा भाजपा जैसी पार्टियों द्वारा किया जा रहा है। खुद प्रधानमंत्री मोदी इस फिल्म के मुख्य प्रचारक बन गए हैं। सत्य को दबाकर इतिहास वैâसे दिखाओगे? कश्मीर से जुड़ा वास्तविक सत्य अभी भी पर्दे पर आना बाकी है।

उत्तर प्रदेश सहित ४ राज्यों के विधानसभा चुनाव भाजपा जीत गई। प्रधानमंत्री मोदी इसके तुरंत बाद गुजरात गए। वहां दो दिनों तक जीत का उत्सव मनाया। क्योंकि अगले चुनाव गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश और जम्मू-कश्मीर में ही होने हैं। उत्तर प्रदेश चुनाव से पहले हिजाब के मुद्दे को भाजपा ने जोर-शोर से उठाया। इससे हिंदू-मुसलमानों के बीच दरार पड़ी। धर्म और जाति को लेकर जबरदस्त द्वेष निर्माण कर दिया जाए तो लोग जीवन-मरण से जुड़ी समस्या भूल जाते हैं। ये तमाम समस्याएं हिजाब में बांधकर गंगा में फेंक दी गईं, बह गईं। अब आगामी चुनाव जीतने के लिए संघ परिवार की प्रेरणा से ‘द कश्मीर फाइल्स’ नामक फिल्म पर्दे पर लाई गई है। इस फिल्म के प्रचार की कमान खुद प्रधानमंत्री मोदी ने अपने कंधों पर ले ली है। इसके जरिए ये कहा जा रहा है कि कश्मीर से जुड़ा देश का वास्तविक इतिहास ३२ वर्षों के बाद पता चला है। भाजपा शासित राज्यों में इस फिल्म को करमुक्त कर दिया गया। इतना ही नहीं, असम के मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा सरमा ने आदेश जारी किया है कि सभी सरकारी कर्मचारी ‘द कश्मीर फाइल्स’ फिल्म देखें व इसके लिए आधे दिन की छुट्टी घोषित की गई है। फिल्म का टिकट दिखाओ और छुट्टी लो। इस पूरे प्रकरण को मजेदार ही कहना होगा! देश की जनता को किसी मदहोशी और अफीम की खुमारी में रखने की प्रयोगशाला शुरू की जा रही है, इसका ये बेहतरीन उदाहरण है!
कश्मीर से हिंदू पंडितों का हुआ पलायन, उनकी हत्या, उन पर हुए अत्याचार, उनके आक्रोश पर आधारित कहानी कष्ट पहुंचाती है। परंतु इससे पुन: हिंदू-मुसलमान के बीच दरार पैदा करना और अगला चुनाव जीतने का यह तरीका और भी विचलित कर देता है। गुजरात और राजस्थान जैसे राज्यों के चुनाव जीतने के लिए कश्मीर की फाइल खोली गई। आज देश में भारतीय जनता पार्टी के पूर्ण बहुमत का राज है। गृहमंत्री श्री अमित शाह ने साहसपूर्वक कश्मीर के अनुच्छेद-३७० को निरस्त किया। कश्मीर से लेह-लद्दाख को अलग किया और कश्मीर को सीधे केंद्र शासित प्रदेश बना दिया। कश्मीर के विधानसभा और लोकसभा क्षेत्र के पुनर्गठन का कार्य पूरा हो गया है। इस तरह से जम्मू प्रांत में विधानसभा की सीटें बढ़ जाएंगी और उस राज्य का मुख्यमंत्री भी कोई हिंदू बनेगा। ये तस्वीर अच्छी है, परंतु ९० के दशक में पलायन करनेवाले कश्मीरी पंडितों की ‘घर वापसी’ मोदी सरकार की एक बड़ी योजना थी। अनुछेद-३७० हटने के बाद भी कश्मीरी पंडितों की घर वापसी नहीं हो सकी। यह किसकी नाकामी है? ‘द कश्मीर फाइल्स’ में से फटकर निकले इतिहास के पन्ने हर तरफ उड़ते दिख रहे हैं।
ये कुछ सवाल!
‘द कश्मीर फाइल्स’ फिल्म विचलित करनेवाली अथवा एक हिंदू के रूप में मुट्ठी भींचने को मजबूर करे, ऐसी होगी भी, परंतु पंडितों का विलाप, हिंदू समाज का पलायन इस पर राजनीतिक आक्रोश व्यक्त करनेवालों को आगे दिए गए सवालों का उत्तर देना चाहिए-
• कश्मीरी पंडितों के पलायन और उनकी हत्या के दौरान दिल्ली और कश्मीर में किसका शासन था?
• कश्मीरी पंडितों पर जुल्म ढाया गया और कत्लेआम किया गया। नब्बे के दशक में २४ हजार पंडितों का पलायन कश्मीर घाटी से हुआ। इसी दौर में सिख और मुसलमान भी मारे गए। पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवादियों ने हजारों सिखों और मुसलमानों का सिर कलम कर दिया। सुरक्षा बलों के कई मुस्लिम सैनिक मार दिए गए।
• कश्मीर में आतंकवादी संगठनों से सीधे तौर पर हाथ मिलानेवाली महबूबा मुफ्ती और उनकी पार्टी के साथ गठबंधन करके भाजपा ने जम्मू-कश्मीर में सरकार वैâसे बनाई? तब पंडितों के पलायन और हत्या पर इन लोगों ने साधारण निषेध भी व्यक्त नहीं किया था। पीडीपी ने अफजल गुरु को स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा दिया और फौज द्वारा आतंकवादी बुरहान वानी का सफाया करते ही मुख्यमंत्री महबूबा ने सेना की कार्रवाई पर सवाल खड़े कर दिए। तब सरकार में शामिल भाजपाई मंत्री ये सब शांत रहकर चुपचाप सहन क्यों कर रहे थे?
• पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर को फिर से जीतकर अखंड हिंदुस्थान का सपना पूरा करने की आपकी घोषणा का क्या हुआ?
• नब्बे के दशक में जैसे ही पाकिस्तानी चरमपंथियों द्वारा अमरनाथ यात्रा नहीं होने देंगे, ऐसी धमकी दी गई। यात्रा के लिए पहुंचे हिंदुओं में दहशत पैâल गई। कश्मीर घाटी में अमरनाथ यात्रा के लिए एकत्र हुए गुजरात के श्रद्धालुओं ने हिंदूहृदयसम्राट शिवसेनाप्रमुख बालासाहेब ठाकरे से मिन्नतें कीं। उस समय शिवसेनाप्रमुख ने अमरनाथ यात्रा विफल करने की साजिश रचनेवाले पाकिस्तानी चरमपंथियों को सीधे निशाने पर लिया। यदि अमरनाथ यात्रा के लिए आए किसी हिंदू का बाल भी बांका हुआ तो मुंबई क्या देश से हज जानेवाले एक भी विमान को उड़ान नहीं भरने देंगे, ऐसी चेतावनी देते ही आतंकी ठंडे हो गए। उस दौरान भाजपा के किसी भी नेता ने समर्थन के लिए मुंह क्यों नहीं खोला?
• निर्वासित कश्मीरी पंडितों के बच्चों की शिक्षा में बाधा न आए, वे समाज में खड़े हो सकें, इसके लिए शिवसेनाप्रमुख ने महाराष्ट्र में कश्मीरी पंडितों के बच्चों के लिए मेडिकल और इंजीनियरिंग के क्षेत्र में पांच फीसदी सीटें आरक्षित कर दी हैं। कश्मीरी पंडितों के लिए ऐसा निर्णय लेनेवाला महाराष्ट्र पहला और इकलौता राज्य था। भाजपा शासित अन्य राज्यों ने ऐसा निर्णय कभी भी क्यों नहीं लिया?
• २०१९ के चुनाव से पहले कश्मीर घाटी में ‘पुलवामा’ हमला हुआ था। इसमें ४० सैनिकों को वीरगति प्राप्त हुई थी। ये चालीस जवान ‘पंडित’ नहीं भी होंगे, लेकिन एक साथ इतने जवान की शहादत किसकी गलती से हुई? उरी, पठानकोट से पुलवामा तक ऐसे हमलों से कश्मीर घटना की फाइल हमारे ही खून से सनी नहीं है क्या?
• अंत में सबसे महत्वपूर्ण सवाल! कश्मीरी पंडितों की घर वापसी कब होगी? या उनके क्रंदन, उनका पलायन, उनके रक्तपात पर राजनीति ही होती रहेगी।
‘द कश्मीर फाइल्स’ के माध्यम से उठे ये सवाल हैं। ‘द कश्मीर फाइल्स’ आगामी चुनाव का एजेंडा है। कश्मीर के सत्य को दबाने का प्रयास किया गया, ऐसा प्रधानमंत्री मोदी ने भाजपा संसदीय दल की बैठक में कहा तथा ‘द कश्मीर फाइल्स’ की प्रशंसा की। कश्मीरी पंडितों का पलायन, उनके नरसंहार के सत्य को कभी किसी ने नहीं छिपाया। देशभर में शरणार्थी शिविर, अपने ही देश में, अपने ही हिंदू पंडितों को नारकीय जीवन जीना पड़ा। ये खुला सत्य तब भी था व आज भी है। उनके जख्मों पर मरहम लगाने और सहारा देने का काम तब सिर्फ हिंदूहृदयसम्राट बालासाहेब ठाकरे ने किया।
‘द कश्मीर फाइल्स’ का दबा हुआ सत्य यही है!
सत्य क्या है?
‘द कश्मीर फाइल्स’ जैसी फिल्में बननी चाहिए, लेकिन ऐसी फिल्मों का मौजूदा एजेंडा राजनीतिक विरोधियों के बारे में द्वेष और भ्रम पैâलाना ही हो गया है। इसी फिल्म के निर्माता ने ‘द ताशकंद फाइल्स’ नामक फिल्म बनाई थी। वह भी एक खास समूह का एजेंडा बन गया। लाल बहादुर शास्त्री की मौत के लिए सिर्फ गांधी परिवार के जिम्मेदार होने का फिल्म ‘प्रोपेगंडा’ इस फिल्म के माध्यम से किया गया था। मानों फिल्म के निर्माण के पीछे यही एकमात्र उद्देश्य रहा हो। देश का इतिहास सिर्फ किताबों से बदला नहीं जा रहा है, बल्कि अब फिल्मों जैसे माध्यमों से भी बदलने का प्रयास किया जा रहा है। भारतीय जनता पार्टी और संघ परिवार ने अभी क्या कहा? तो रिचर्ड एटनबरो द्वारा गांधी पर फिल्म का निर्माण किए जाने तक दुनिया गांधी को नहीं जानती थी। उस फिल्म की वजह से दुनिया को इसकी जानकारी हुई! अब ३२ साल बाद कश्मीरी पंडितों का सच इसी माध्यम से दुनिया के सामने आ रहा है। इस फिल्म में एक डायलॉग है, ‘झूठी खबर दिखाना उतना बड़ा अपराध नहीं है, जितना बड़ा गुनाह सच्ची खबर को दबाना है!’ ‘द कश्मीर फाइल्स’ में सच्ची खबर दिखाने के दौरान कई और बड़ी सच्चाइयों को दबाने का प्रयास किया गया। ३२ साल पहले कश्मीर का माहौल सिर्फ कश्मीरी पंडितों के लिए ही खराब नहीं हुआ था, यह सभी के लिए खराब था परंतु कश्मीरी पंडित इसमें सबसे अधिक पिसे। कश्मीर में पहली राजनीतिक हत्या अगस्त १९८९ में नेशनल कॉन्प्रâेंस के नेता मोहम्मद यूसुफ हलवाई की हुई थी। इससे पहले प्रशासनिक अधिकारी पर जो पहला हमला हुआ था वह पुलिस महानिरीक्षक जी.एम. बटाली पर। उसमें बटाली का अंगरक्षक मारा गया था। उसके कुछ ही दिन बाद, बटाली के छोटे भाई गुलशन बटाली की हत्या कर दी गई। ऐसी कई बातों का सच ‘द कश्मीर फाइल्स’ में छिपाया गया है। १९४७ के बाद ४३ वर्षों तक कश्मीरी पंडितों पर भागने की नौबत कभी भी नहीं आई थी। वर्ष १९९० में, ४ लाख हिंदू-सिखों को कश्मीर छोड़ने के लिए मजबूर किया गया था। उस समय केंद्र में भाजपा के समर्थन वाली वी.पी. सिंह की सरकार थी। भाजपा के नेता जगमोहन, कश्मीर के राज्यपाल थे। घाटी में हिंदू मर रहे थे, भाग रहे थे, तब ‘कश्मीर फाइल’ ठंडे बस्ते में पड़ी रही। मुंबई से एक ही आवाज कश्मीरी हिंदुओं के लिए दहाड़ रही थी, वो मतलब हिंदूहृदयसम्राट बालासाहेब ठाकरे!

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