मुख्यपृष्ठनए समाचाररोखठोक : गुरुजी का दुख समझिए... गांधी नहीं मरेंगे!

रोखठोक : गुरुजी का दुख समझिए… गांधी नहीं मरेंगे!

संजय राऊत
सांगली के मनोहर भिडे हमारे गुरुजी हैं, ऐसा श्री देवेंद्र फडणवीस कहते हैं। उनके गुरुजी ने गांधी से लेकर नेहरू तक, सार्इंबाबा से महात्मा फुले तक सभी की निंदा शुरू की है। तनाव पैदा कर दंगा भड़काने की यह ‘सुपारी’ है!
किसी व्यक्ति को मारने से विचार नहीं मरते, कागज या किताब जलाने से विचार नहीं मिटते। इसकी स्वीकृति ‘गांधी-चरित्र’ से आती है। देश में मोदी की सरकार आने के बाद से गांधी का खून रोज हो रहा है, लेकिन फिर भी मोदी विदेश जाते हैं। उस समय उन्हें कहीं न कहीं गांधी की मूर्ति का उद्घाटन करना ही पड़ता है। गांधी के विचारों से पूरी दुनिया प्रभावित है। गांधी के गुजरात में मोदी सरकार ने सरदार पटेल की बहुत ऊंची प्रतिमा खड़ी कर गांधीवादी विचार को कमजोर करने की कोशिश की, लेकिन लोग गांधी को भूलने को तैयार नहीं हैं। गांधी की हत्या करनेवाले गोडसे की जयंती को कुछ लोग हिंदू के तौर पर मनाते हैं। यह एक विकृति है। गांधी की प्रतिमा पर, तस्वीरों पर गोलियां चलाकर गोडसे को श्रद्धांजलि दी जाती है। फिर भी गांधी मरते नहीं। इसलिए महाराष्ट्र में ‘मनोहर भिडे’ नामक व्यक्ति ने गांधीजी पर गलिच्छ शब्दों में कीचड़ उछाला, उसकी चिंता क्या करें? मनोहर भिडे ने घोषणा की कि गांधी के पिता मुस्लिम थे। यह विकृति की पराकाष्ठा है। भिडे की उनके समर्थकों में गुरुजी के रूप में पहचान है। देश या समाज बनाने में जिस व्यक्ति का कोई योगदान नहीं, उसके बयानों को नजरअंदाज करना ही बेहतर है। गांधीजी ने जहां अपने हत्यारे को ही माफ कर दिया, वहां भिडे जैसों का क्या हुआ! ‘मनोहर भिडे हमारे गुरुजी हैं,’ ऐसा श्री देवेंद्र फडणवीस अभिमान से कहते हैं। लेकिन इस गुरुजी ने सिर्फ गांधी ही नहीं, बल्कि असंख्य लोगों की आस्था के स्थान शिर्डी के सार्इंबाबा व महान समाज सुधारक महात्मा जोतिबा फुले का भी गलिच्छ शब्दों में अपमान किया। इसलिए ही ये ऐसे ‘गुरु’ हैं और उन्हें तो बस उन्हीं में दिलचस्पी है।
यूनियन जैकवाले
महात्मा गांधी के नेतृत्व में हिंदुस्थान स्वतंत्र हुआ, यह बात गांधी की निंदा करनेवाले विशेष विचारधारा के लोगों को सहन नहीं हो रहा। ये सभी लोग गांधी से ईर्ष्या करते हैं। विडंबना यह है कि उनमें से अधिकांश को अखंड हिंदू राष्ट्र चाहिए था व पाकिस्तान का निर्माण अथवा विभाजन गांधी के चलते हुआ, ऐसा उनका दावा है। लेकिन इस तरह के मजबूत इरादों वाले लोग अपनी क्रांति का झंडा लेकर आजादी की लड़ाई में कहीं भी नजर नहीं आए। शनिवारवाड़ा में ‘यूनियन जैक’ फहराने में उनके पूर्वज सक्रिय थे, ऐसा इतिहास कहता है। उनमें से कई लोग अंग्रेजों के एजेंट के रूप में स्वतंत्रता आंदोलन को नष्ट करने के लिए काम कर रहे थे और ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ आंदोलन का विरोध करके अंग्रेजों की मदद की जा सके, ऐसी जाहिर भूमिका अपनाई गई। उन विचारों के वाहक गांधी-नेहरू की निंदा आज भी करते हैं, इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं। गांधी ने अपने अहिंसात्मक आंदोलन का पहला प्रयोग दक्षिण अप्रâीका में किया। गांधी, नेहरू, बोस महान व्यक्तित्व थे। उनमें से गांधी-नेहरू दोनों ही इंग्लैंड से यानी जिस देश के साम्राज्यवाद के बंधन को तोड़ने के लिए हिंदुस्थान का संघर्ष चल रहा था, उस देश से उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद हिंदुस्थानी लोगों के सामने आए। गांधीजी और नेहरू दोनों ही ब्रिटिश कानून के बैरिस्टर थे। उन्होंने इंग्लैंड में रहकर पढ़ाई की थी। इनर टेंपल संस्थान से इंग्लैंड के कानून, उनके मूल्यों और ब्रिटिश सम्राट का ‘काला लबादा’ लेकर वे हिंदुस्थान में आए थे। अंग्रेज जिन कड़े कानूनों के जरिए हिंदुस्थान पर शासन कर रहे थे, उसी इंग्लैंड से सुभाषचंद्र बोस ‘आईसीएस’ की पढ़ाई करके आए थे। इस तरह से ब्रिटिश सत्ता के ‘इनर टेंपल’ से शिक्षा लेकर आए इन तीनों ने बाद में वही कपड़े पहनकर उसी ब्रिटिश सत्ता को गाड़ डालने के लिए कब्र खोदने वालों की भूमिका निभाई। यह इतिहास गांधी, नेहरू और बोस पर कीचड़ उछालने वालों को पता नहीं है। गांधी-नेहरू पर कीचड़ उछालने वालों में इतनी ज्यादा हीनभावना है कि वे उन जैसी एक भी हस्ती नहीं बना पाए। गांधी, नेहरू, सरदार पटेल, नेताजी बोस, डॉ. आंबेडकर, बालासाहेब ठाकरे, इंदिरा गांधी ऐसे गुणी व्यक्ति उनके परिवार में पैदा क्यों नहीं हुए? उन्होंने प्रदीप कुरुलकर पैदा किया। यही उनका असली दर्द है। इसी दर्द के कारण गांधी से नेहरू तक पर कीचड़ उछाला जा रहा है।
गांधी-नेहरू
श्रीमान भिडे जैसे लोग कहते हैं, देश निर्माण में नेहरू अथवा गांधी का योगदान नहीं है। फिर यह देश, देश की स्वतंत्रता, उसके संघर्षों का ये वैâसा प्रतिबिंब है? मणिपुर में हिंसा भड़की हुई है और इसके पीछे चीन का हाथ है। फिर भी प्रधानमंत्री मोदी चुप हैं और गांधी-निंदा करनेवाले लोग मोदी के इस ठंडे रवैए पर बात करने को तैयार नहीं हैं। गांधी के सिद्धांतों की दुनिया में बोलबाला शुरू होते हुए यहां मुट्ठी भर लोग गांधी-निंदा में अपने को धन्य मानते हैं। यह उनकी वैचारिक दरिद्रता है। गांधी के सभी विचारों, सिद्धांतों को स्वीकार करना चाहिए ऐसा नहीं, लेकिन फालतू लोग गांधी की निंदा करें और ऐसे निंदकों को राजाश्रय मिले, यह आश्चर्य की बात है। गांधी की कई भूमिकाएं रहस्यमय थीं। नेहरू अपनी आत्मकथा में लिखते हैं, ‘राजनीतिक सवालों के प्रति उनके धार्मिक और भावनिक दृष्टिकोण और इस संबंध में उनके बार-बार भगवान का जिक्र देखकर मुझे इस पर गुस्सा आया। एक बार तो उनके अनशन की तारीख भगवान ने तय की, ऐसा उन्होंने सूचित भी किया। कितना विलक्षण मार्गदर्शन करने का यह प्रयास?’
बागी गांधी
जलियांवाला बाग हत्याकांड ने अहिंसक गांधी को बागी बनाया। उन्होंने बयान दिया कि, ‘ब्रिटिश सरकार पापी शैतान है और इस शैतान को नष्ट किया जाना चाहिए। शैतान के साथ कोई समझौता करना संभव नहीं होता है।’ इस एक बयान से सविनय अवज्ञा, असहयोग आंदोलन शुरू हो गया। ब्रिटिश साम्राज्य को झटका लगा। देश में स्कूल और कॉलेजों में सन्नाटा पसर गया। कोर्ट में बहिष्कार हो गया। कई मशहूर हस्तियों ने सरकारी उपाधियां, पुरस्कार वापस लौटा दीं, विदेशी कपड़ों की होली शुरू हुई। हड़ताल, आंदोलन करते हुए लाखों लोग सड़कों पर उतर आए। गांधी ने जनता के मन में डर को खत्म किया। इसलिए ब्रिटिश शासकों में छटपटाहट मचने लगी। सड़कों पर पुलिस के हमले की परवाह किए बिना लोग ‘महात्मा गांधी की जय’ के नारे लगाते हुए सड़कों पर उतर आए। इस विद्रोह में आज के शासकों के पूर्वज कहीं भी नहीं थे। उनके बिना स्वतंत्रता हासिल हुई। इसीलिए ईर्ष्यावश वे गांधी-नेहरू की निंदा कर रहे हैं। इससे उन्हें कुछ भी हासिल नहीं होगा।
महाराष्ट्र में असर
दिल्ली में गांधी की हत्या हुई। उसका सर्वाधिक असर महाराष्ट्र में हुआ क्योंकि गांधी पर गोली झाड़नेवाला गोडसे महाराष्ट्र का था। उसका सर्वाधिक झटका ब्राह्मण वर्ग को लगा। इंदिरा गांधी की हत्या एक सिख ने की थी, इसलिए सिखों पर बेरहमी से हमला किया गया, सिखों का कत्लेआम किया गया। ये एक बड़ी गलती थी। उन दंगों का जख्म लिए सिख समाज आज भी जी रहा है। सिख दंगों के निशान आज भी दिल्ली की सिख बस्तियों में देखने को मिलते हैं। गांधी की हत्या के बाद महाराष्ट्र में भी कुछ ऐसा ही घटा, लेकिन इसमें महात्मा गांधी का क्या दोष? गांधी को नेता की उपाधि से जनता ने बहाल किया। वीर सावरकर को यदि छोड़ दिया जाए तो खुद हिंदुत्ववादी कहलवानेवालों का स्वतंत्रता संग्राम में योगदान न के बराबर है, ऐसा ही कहना पड़ेगा। हिंदू महासभा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ये तो किनारे से अवलोकन कर रहे थे। इस शून्य से यह संगठन और उनके समर्थक बाहर निकलने को तैयार नहीं। श्री मोदी ने दिल्ली में नए संसद भवन को बनवाया है। क्योंकि पुराने संसद भवन में क्रांति, स्वतंत्रता आंदोलन और गांधी-नेहरू के विचारों की विरासत है। वो बोझ इनसे उठाया नहीं जा रहा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन में भाग नहीं लिया। १९४२ के ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन के दौरान उन्होंने मध्य प्रांत के उस समय के अंग्रेज गवर्नर को ‘संघ इस आंदोलन में भाग नहीं लेगा’, ऐसा आश्वासन दिया था, यह बात दर्ज है। संघ के कुछ युवाओं ने १९४२ के आंदोलन में भाग लेने की इच्छा व्यक्त की। उस समय गोलवलकर गुरुजी ने उन्हें इस अनुशासनहीनता के लिए क्या सजा दी? बल्कि उन्हें ब्रिटिश सेना में शामिल होने का आदेश दिया। १९४४ में पुणे के अरणेश्वर में आयोजित संघ शिविर में गोलवलकर गुरुजी ने १९४२ के निर्णायक स्वतंत्रता आंदोलन मतलब ‘चले जाओ’ आंदोलन का मजाक उड़ाया था। उन्होंने कहा कि, ‘एक हवा का झोंका आया, दो-चार पेड़ गिरे उससे अधिक १९४२ में कुछ नहीं हुआ।’ लेकिन इस आंदोलन से गांधी ने ब्रिटिश साम्राज्य की कमर पर लात मारी और उन्होंने टूटी हुई कमर के साथ देश छोड़ा। ये गांधी का योगदान है ही। गांधी का बाप निकालनेवालों को यह वेदना समझनी चाहिए। अल्बर्ट आइंस्टीन द्वारा महात्मा गांधी के बारे में कहा गया एक वाक्य मुझे याद है। उन्होंने कहा था, ‘आनेवाली पीढ़ियां शायद ही विश्वास करेंगी कि, हाड़-मांस का ऐसा कोई व्यक्ति (गांधी) वास्तव में इस धरती पर था।’
गांधी निंदकों के पेट में यही दर्द है!

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