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रोखठोक : कमजोर विरोधियों पर जोरदार प्रहार …. केंद्रीय एजेंसियों का राजनीतिक हथौड़ा

संजय राऊत -कार्यकारी संपादक : हमें एक सक्षम विपक्ष की जरूरत है। ऐसा बयान गृहमंत्री अमित शाह ने संसद में दिया। विरोधी दल आज बिखरे हुए हैं। उस पर भी प्रहार करने का काम केंद्र के सत्ताधारी अपने मातहत आनेवाली जांच एजेंसियों के जरिए कर रहे हैं। इतना सब करने के बाद भी विपक्षी दलों के नेता सत्ताधारियों के समक्ष समर्पण करने को तैयार नहीं हैं!

हमें एक सक्षम और मजबूत विपक्ष चाहिए, लेकिन हमारे हाथ में क्या है? यह जनता को तय करना चाहिए, ऐसा बयान गृहमंत्री अमित शाह ने बुधवार, दिनांक ६ अप्रैल को राज्यसभा में दिया।
श्री शाह की बात तर्कसंगत है, लेकिन केंद्रीय जांच एजेंसियों का दुरुपयोग करके वर्तमान सत्ताधारी पहले से ही कमजोर विपक्ष के हाथ-पैर छांटने वाली होगी, तो क्या करें, इसका जवाब उन्हें देना चाहिए। लोकसभा में भाजपा का पूर्ण बहुमत है। राज्यसभा में पहले वे नहीं थे, लेकिन अब राज्यसभा में भी भाजपा और उसके सहयोगी दलों ने सौ का आंकड़ा पार कर लिया है। राज्यसभा में कांग्रेस की स्थिति कमजोर बिल्ली जैसी हो गई है। इसे देखते हुए श्री शाह ने शायद यह बयान दिया होगा। यह सच होगा, फिर भी विपक्ष काबू में रहे इसके लिए केंद्रीय जांच एजेंसियों का हंटर केंद्र ने अपने हाथों में क्यों रखा है? इसके मामले रोज ही सामने आ रहे हैं। यह लेख लिखने के दौरान सीबीआई ने अनिल देशमुख को ईडी की हिरासत से अपनी गिरफ्त में लिया और पुलिस तबादले से जुड़े मामले की जांच शुरू कर दी। पुलिस तबादलों में भ्रष्टाचार हुआ मतलब निश्चित तौर पर क्या हुआ और इसका क्या सबूत है? इन तबादलों में सौ करोड़ का लेन-देन हुआ। जो कि पहले पांच करोड़ और श्री देशमुख के खिलाफ दायर चार्जशीट में अब वह आंकड़ा गिरकर २ करोड़ रुपए से नीचे आ गया तथा इसके लिए केंद्रीय जांच एजेंसियों ने देशमुख और उनके परिवार पर करीब १२० के आस-पास छापे मारे। देश और राज्य में पुलिस व प्रशासनिक अधिकारियों के तबादले होते रहते हैं। पांच राज्यों के चुनाव परिणाम आने के बाद उत्तर प्रदेश और पंजाब के मुख्यमंत्रियों ने तबादलों की झड़ी ही लगा दी। तो वहां तबादलों में घोटाला हुआ है क्या? अगर कोई परमबीर सिंह वहां उखड़ जाए और वह ऐसी शिकायत दर्ज करा दे, तो क्या सीबीआई वहां भी जांच कर सकती है?

मोदी-पवार भेंट
श्री शरद पवार संसद भवन में प्रधानमंत्री मोदी से मिले। महाराष्ट्र में केंद्रीय जांच एजेंसियां राजनीतिक हेतु से गलत दिशा में कार्रवाई कर रही हैं। राजनीतिक विरोधियों का मुकाबला करने का यह तरीका नहीं है। ऐसा श्री पवार ने प्रधानमंत्री मोदी से कहा। मुझ पर व्यक्तिगत रूप से ईडी ने कार्रवाई की, इसका कोई आधार नहीं है। लेकिन selected targets की तर्ज पर महाराष्ट्र और बंगाल में कार्रवाई की जा रही है। ऐसे मामलों में श्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह का सीधे तौर पर हस्तक्षेप होगा, ऐसा नहीं लगता। लेकिन महाराष्ट्र भाजपा के एक प्रमुख नेता और केंद्रीय जांच एजेंसियों के एक-दो बड़े अधिकारी मिलकर महाराष्ट्र में खेल, खेल रहे हैं। राजनीतिक विरोधियों पर कब और वैâसे कार्रवाई करनी चाहिए, उससे पहले बदनामी की मुहिम चलाना। भाजपा से संबंधित एक-दो लोगों द्वारा ऐसी कई कार्रवाइयों के संदर्भ में सोशल मीडिया पर बयानबाजी करके धमकाने का यह तरीका प्रधानमंत्री के तौर पर मोदी की छवि धूमिल करने जैसा है। ‘कार्डिलिया’ क्रूज पर जो ड्रग्स मामला हुआ, उसमें शाहरुख खान के बेटे को सीधे फंसाया गया। जिस प्रभाकर साइल नामक गवाह के कारण एनसीबी अधिकारियों का झूठ सामने आया, अब उस प्रभाकर साइल की संदिग्ध अवस्था में मौत हो गई है। इस मामले के संबंधित अधिकारी भाजपा के एक युवा नेता का हर तरह से अनैतिक आतिथ्य सत्कार करते हैं और क्या इसी वजह से प्रभाकर साइल के साथ कुछ अप्रत्याशित हुआ? यह जांच का विषय है। प्रभाकर साइल की मौत का मामला राज्य सरकार की जांच एजेंसियों को अधूरा नहीं छोड़ना चाहिए। यह रहस्यमय और उतना ही झकझोरनेवाला हो सकता है। कोर्ट से लेकर केंद्रीय जांच एजेंसियों तक सभी लोग इंसान हैं और उनके पैर मिट्टी के हैं। हिंदुस्थान के सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एन.वी. रमन देश के संविधान के मुख्य रक्षक हैं। कुछ दिनों पहले उनके द्वारा व्यक्त की गई आशंकाएं और चिंताएं महत्वपूर्ण थीं। ‘सीबीआई और ईडी जैसी केंद्रीय जांच एजेंसियों ने पूरी तरह से विश्वसनीयता खो दी है। केंद्रीय एजेंसियां निष्पक्ष नहीं रहीं, सभी एजेंसियों का एकीकरण करके उस पर नियंत्रण रखने की एक व्यवस्था निर्माण की जाए’, ऐसा विचार जब देश के प्रमुख न्यायाधीश व्यक्त करते हैं, तब केंद्रीय जांच एजेंसियों पर से विश्वास डोलने लगता है।

सेलेक्टेड टारगेट
केंद्रीय जांच एजेंसी के एक बड़े अधिकारी मिले। उनसे पूछा, ‘निश्चित तौर पर क्या चल रहा है?’ इस पर उन्होंने एक शब्द में कहा, ‘हम ‘टारगेट पर काम कर रहे हैं।’ इसका अर्थ सीधा है। एजेंसियों के राजनीतिक ‘बॉस’ जो टारगेट देंगे उसी के अनुसार कार्रवाइयां हो रही हैं। मैंने उनसे पूछा, ‘कल सरकार बदल जाए तो वैâसे करोगे?’ इस पर उन्होंने कहा, ‘नई सरकार जैसे कहेगी वैसे काम करेंगे। उन्हें जो चाहिए वह करेंगे।’ इसका मतलब स्पष्ट है। इसे समझने की जरूरत है। मुंबई-महाराष्ट्र में पैसा है। इसलिए यहां सभी केंद्रीय जांच एजेंसियों के अधिकारियों को काम करना है। ऐसे अधिकारियों के लिए जो पैरवी करते हैं वे अधिकारी उस नेता का आदेश मानते हैं। फिलहाल यही चल रहा है। मुंबई के एक पुलिस उपायुक्त सौरभ त्रिपाठी आंगड़ियों से वसूली मामले में फरार हैं। वे सीधे आईपीएस दर्जे के अधिकारी हैं। निकट भविष्य में हफ्ता उगाही के ऐसे कई मामले सामने आएंगे। तमिलनाडु के एक राजनीतिक नेता टी.वी. दिवाकरन को ‘ईडी’ ने मनी लॉन्ड्रिंग मामले में समन भेजा। ठग सुकेश चंद्रशेखर को ईडी पहले ही पकड़ चुकी थी और उससे कई धमाकेदार खुलासे हुए। सुकेश चंद्रशेखर से संबंध होने के आरोप में दिवाकरन पर कार्रवाई की गई। लेकिन इस सुकेश चंद्रशेखर से लाभ लेनेवाले कई लोगों में केंद्रीय जांच एजेंसियों के अधिकारी भी थे और इनमें से सभी बड़े लाभार्थियों ने ‘ईडी’ से इस्तीफा देकर उत्तर प्रदेश में भाजपा विधायक की सीट हासिल की। इन सभी मामलों की जांच सुप्रीम कोर्ट द्वारा विशेष एसआईटी गठित करके की जानी चाहिए। मुख्य न्यायाधीश ने ऐसे मामलों की वजह से चिंता व्यक्त की।

‘विक्रांत’ के नाम पर लूट
भाजपा के महात्मा किरीट सोमैया दूसरों के भ्रष्टाचार के मामले रोज खोलते हैं। ईडी और सीबीआई की धमकी देते हैं। लेकिन ‘विक्रांत’ युद्धपोत को बचाने के लिए उन्होंने लोगों से भारी मात्रा में धन एकत्र किया। उस धन का दुरुपयोग करके लोगों और देश को फंसाया। उस जालसाजी के संदर्भ में पुलिस ने आपराधिक मामला दर्ज किया है। इस धोखाधड़ी का दायरा बहुत बड़ा है। इस प्रकरण की जांच खुद ही आगे आकर करें, ऐसा केंद्रीय जांच एजेंसियों को क्यों नहीं लगता है? सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर के आंदोलन में हुए लेन-देन की जांच ईडी ने शुरू की है। जांच एजेंसियां ​​यह सब क्यों कर रही हैं? पत्रकार राणा अयूब, ‘एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया’ के पूर्व प्रमुख आकार पटेल को केंद्रीय जांच एजेंसियों ने विदेश जाने से रोक दिया। उनके खिलाफ ‘लुकआउट’ नोटिस जारी कर दी। यह पूरी तरह से गैरकानूनी और बदले की कार्रवाई थी। आकार पटेल को बुधवार को बंगलुरु एयरपोर्ट पर ही रोका गया। आकार पटेल इस कार्रवाई के खिलाफ कोर्ट गए, तब ‘आकार पटेल से माफी मांगो’ यह कहते हुए कोर्ट ने सीबीआई को आदेश दिया। जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की जांच ईडी ने शुरू की है। एक इमारत के सौदे का बारह साल पुराना यह मामला है। ईडी को लगता है कि इसमें भ्रष्टाचार हुआ होगा। यह संदेह है। श्री उमर अब्दुल्ला इस पर कहते हैं, ‘किसी भी राज्य में विधानसभा चुनाव करीब आते ही ईडी जैसी केंद्रीय जांच एजेंसियां सक्रिय हो जाती हैं। भाजपा के सामने चुनौती पेश करनेवाली राजनीतिक पार्टियों और नेताओं को निशाना बनाया जाता है।’ उमर अब्दुल्ला कहते हैं, ‘देश में भाजपा के सभी विरोधी इसका अनुभव ले रहे हैं।’ भारतीय जनता पार्टी के संदर्भ में नेताओं के मामले पुख्ता सबूतों के साथ दिए जाने के बाद भी केंद्रीय जांच एजेंसियां किसी तरह की जांच नहीं करती। नर्मदा बचाओ आंदोलन के दौरान मनी लॉन्ड्रिंग हुई इस तरह की मेधा पाटकर के बारे में बातें करना और बदनामी की मुहिम चलाना चिंताजनक है। उस पर यह मामला १७ साल पुराना है। मेधा पाटकर के एनजीओ के अकाउंट में यदि चंदा आया होगा तो ऐसे डोनेशन भाजपा के खाते में भी आए हैं और दानदाताओं में इकबाल मिर्ची से लेकर पी.एम.सी. बैंक घोटाले के मास्टरमाइंड राकेश वाधवान जैसे सम्मानित व्यक्ति शामिल हैं।
राकेश वाघवान के साथ किरीट सोमैया और उनके बेटे का सीधे जमीन का लेन-देन हुआ है। इस बारे में ईडी जैसी एजेंसी कार्रवाई का कागज हिलाने के लिए तैयार नहीं है। उमर अब्दुल्ला से लेकर मेधा पाटकर तक, राणा अयूब से लेकर आकार पटेल तक… मौजूदा व्यवस्था के विरोध में बोलनेवाले अपराधी ठहरा दिए गए हैं।
कमजोर विपक्षी दलों पर केंद्रीय जांच एजेंसियों का हथौड़ा रोज ही चल रहा है और हमारे गृहमंत्री शाह कहते हैं, ‘वे विपक्ष को सक्षम देखना चाहते हैं!’
यह मजाक दिलचस्प है।

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