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रोखठोक : बादशाह मुर्गे लड़ाता है…

संजय राऊत- कार्यकारी संपादक।  ‘गरीबी और भुखमरी के मामले में हिंदुस्थान ने पाकिस्तान और बांग्लादेश को भी पीछे छोड़ दिया है। नौकरी नहीं है इसलिए डिग्रीधारी चाय की टपरियों पर काम कर रहे हैं। महंगाई, बेरोजगारी प्रमुख मुद्दा है। उससे ध्यान भटकाने के लिए बादशाह मुर्गे लड़ा रहा है!
राष्ट्रीय एकता और अखिल भारतीयता इन शब्दों का पैâसला कर लिया गया है। रामनवमी, हनुमान चालीसा, मस्जिदों पर लाउडस्पीकर यह रोटी, कपड़ा, मकान और रोजगार के मुद्दों से महत्वपूर्ण हो गया है। महाराष्ट्र सहित देशभर में हिंदू-मुसलमानों के दंगे का माहौल बनाए जाते समय पटना की एक खबर से मैं परेशान हो गया। पटना की अर्थशास्त्र की स्नातक छात्रा ने पटना महिला कॉलेज के सामने चाय की टपरी खोली है। लड़की का नाम प्रियंका गुप्ता है। वर्ष २०१९ में यह लड़की स्नातक हुई। दो वर्ष प्रयास करने के बाद भी नौकरी नहीं मिली। आखिर में जिस कॉलेज में पढ़ी उसी कॉलेज के सामने उसने चाय की टपरी खोल दी। ‘स्टार्टअप’ के लिए कई बैंकों से लोन के लिए चप्पल घिसे लेकिन एक भी बैंक ने इस जरूरतमंद, डिग्रीधारी युवती को लोन नहीं दिया। अंत में यह लड़की चाय की टपरी डालकर सुबह ६ से १२ बजे तक चाय बेचती है। प्रियंका गुप्ता देश के लाखों-करोड़ों बेरोजगार युवक-युवतियों की प्रतिनिधि है। हमारे प्रधानमंत्री मोदी कभी चाय बेचा करते थे। वे राजनीति में आए। प्रधानमंत्री बने और विश्वगुरु के तौर पर प्रवचन दे रहे हैं लेकिन देश के बेरोजगार व युवाओं की निराशा का कोई इलाज नहीं है। इलाज एक ही है वह है धर्मांध बनो। कट्टर बनो! रामनवमी, हनुमान जयंती की शोभायात्रा में शामिल होकर निरंकुश हो जाओ! प्रियंका गुप्ता जैसी कई लड़कियां स्वयं रोजगार खुद निर्माण कर रही हैं। देश में केवल मस्जिदों पर लगे लाउडस्पीकर ही मुख्य समस्या नहीं है। लोगों के जीने-मरने की समस्या उससे अलग है। बिहार में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है। पेट्रोल-डीजल की बढ़ी कीमतें विद्यार्थियों पर असर डाल रही हैं। जो विद्यार्थी स्कूटर-बाइक से कॉलेज आते-जाते थे, वे अब साइकिल का इस्तेमाल करने लगे हैं। पेट्रोल बूते से बाहर हो गया है। र्इंधन दर वृद्धि के कारण बिहार में साइकिल की बिक्री में २० प्रतिशत का इजाफा हुआ है। पेट्रोल की कीमतें बढ़ने से साइकिल के अच्छे दिन आ गए हैं। यह सही है लेकिन लोग अब गाड़ियों का इस्तेमाल नहीं कर सकते और साइकिल से बैलगाड़ी की ओर मुड़ने लगे हैं। ओलिंपिक में दोहरा पदक हासिल करनेवाली सीता शाहू मध्य प्रदेश के रीवा में गोलगप्पे बेचकर गुजर-बसर कर रही हैं। नौकरी नहीं। सरकार ने अपने वादे नहीं निभाए। जीने के लिए तो कुछ करना होगा, ऐसा सीता कहती हैं। इन सभी का दुख लाउडस्पीकर लगाकर दुनिया के सामने लाना चाहिए।
‘ट्रोलर्स’ ही रोजगार
महंगाई और बेरोजगारी से ध्यान भटकाने के लिए दंगे का सहारा लिया जा रहा है। हजारों नहीं, लाखों स्नातक बेरोजगार युवाओं को ‘ट्रोलर’ बनाने का काम दिया है। ‘ट्रोल’ नाम का प्रकार किस स्तर तक जा सकता है, इसका झटका मध्य प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष विष्णुदास शर्मा की डॉक्टर पत्नी स्तुति शर्मा को लगा। रामनवमी, हनुमान जयंती के दंगे में मध्य प्रदेश भी झुलसा। कई इलाकों में तनाव व बंद की स्थिति थी। ऐसे समय में डॉ. शर्मा को तत्काल एक दवा की जरूरत पड़ी। रात को साढ़े ग्यारह बज गए थे। इस तनावपूर्ण माहौल के कारण ‘बंद’ था। केवल एक मुस्लिम दुकानदार के फॉर्मेसी की दुकान खुली थी। डॉ. शर्मा उसकी दुकान में गर्इं और वहां से दवा खरीदी। उसमें से एक दवा के बारे में उस दुकानदार ने सलाह दी, ‘दीदी, यह दवा संभालकर लें। संभव हो तो टाल दें। इस दवा से मूर्च्छा आती है।’ इस प्रसंग को लेकर डॉ. स्तुति शर्मा ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट डाली। उन्होंने अंत में लिखा, ‘वह मुस्लिम व्यक्ति कितना स्नेही था। उसने बहुत ध्यान रखा!’ इस पर भारतीय जनता पार्टी के ‘ट्रोलर्स’ भड़क उठे और उन्होंने डॉ. स्तुति शर्मा पर ट्रोलिंग के हमले शुरू कर दिए। एक मुसलमान को आप स्नेही अथवा ध्यान रखनेवाला कैसे कह सकते हैं, ऐसे सवाल उठाए। मानो डॉ. शर्मा ने उस मुसलमान दुकानदार को ‘स्नेही’ वगैरह कहकर जघन्य अपराध कर दिया हो। आखिर में डॉ. स्तुति शर्मा को अपना वह ‘ट्वीट’ वापस लेना पड़ा। देश में धार्मिक कलह और नफरत किस स्तर पर ले जाकर रख दिया है? और हमारे प्रधानमंत्री इस पर आज भी चुप हैं।
देश ऐसे डूबेगा
हनुमान जयंती, रामनवमी, लाउडस्पीकर का विवाद यानी देश डुबाने की साजिश है। देश में महंगाई और बेरोजगारी पर कोई चर्चा नहीं कर रहा है। बेरोजगारी तथा महंगाई पर मोर्चे और आंदोलन होने चाहिए। लेकिन वह हनुमान चालीसा और मस्जिदों के लाउडस्पीकर के मामलों को लेकर निकल रहे हैं। धार्मिक घृणा के मामले में हिंदुस्थान का चरित्र अफगानिस्तान से भी ज्यादा बिगड़ गया है। अफगानिस्तान की बागडोर जिस प्रवृत्ति के लोगों के हाथ में है, वैसी तस्वीर भविष्य में हमारे देश में निर्माण हो सकती है और वैसी तस्वीर आज दिखाई देने लगी है। ‘हनुमान जयंती पर पहले शोभायात्रा नहीं निकलती थी लेकिन भंडारा जरूर होता था। इस भंडारे में मैंने कई बार पूरी-भाजी का स्वाद चखा है’, ऐसा नसीम बानो नामक युवती ने सोशल मीडिया पर लिखा है। लेकिन ऐसे विचारों का आज कोई स्थान नहीं रह गया है। पूरे देश में हर स्तर पर नफरत पैâलानेवाली विचारधारा बढ़ रही है और लोगों को धर्मांध होते देखना दुखद है। देश ऐसे ही डूबेगा, लेकिन उसकी चिंता कितने लोगों को है। इस परिस्थिति का कोई समाधान नहीं है, ऐसी मनोस्थिति में लोग जाने लगे हैं और अधिक-से-अधिक लोग चले गए तो देश का श्रीलंका अथवा अफगानिस्तान बनने में समय नहीं लगेगा। साध्वी ऋतंभरा ने इसी माहौल में एक महागर्जना की। यानी, ‘हिंदू चार बच्चे पैदा करें और उसमें से दो बच्चे संघ को दें।’ अब सवाल इतना ही है कि क्या संघ इससे सहमत है? एक तरफ भाजपा जनसंख्या नियंत्रण कानून लाने की भूमिका में है और दूसरी तरफ भाजपा के ही नेता संघ परिवार बढ़ाने के लिए जनसंख्या बढ़ाने की बात कर रहे हैं। जितने लोग हैं उनके लिए नौकरियां और अन्न नहीं है। तो बढ़ती जनसंख्या का क्या? हिंदुस्थान में भूख और भुखमरी बढ़ गई है। इस मामले में पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल की स्थिति हमसे बेहतर है। ये तस्वीर क्या कहती है! देश के सभी मसलों का रामबाण उपाय यानी जातीय द्वेष और धार्मिक दंगल ही है। विजय ढिल्लो की एक पंक्ति सुनाता हूं और विषय को यहीं विराम देता हूं।
‘मुश्किल है अब इस मुल्क में,
अमन की वापसी
बादशाह खुद यहां
मुर्गे लड़ाता है…’

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