मुख्यपृष्ठटॉप समाचाररोखठोक : फुले बनाम तिलक ....राजनीति से समाधि की ओर

रोखठोक : फुले बनाम तिलक ….राजनीति से समाधि की ओर

रायगढ़ पर स्थित शिवराय की समाधि की खोज किसने की, इस पर कुछ लोगों ने इतिहास को गींजना शुरू कर दिया है। ‘महात्मा फुले बनाम लोकमान्य तिलक’ ऐसा यह विवाद निरर्थक है। शिवराय का जन्म महाराष्ट्र में हुआ था, यही महत्वपूर्ण है लेकिन लोगों की मति मारी गई है!

संजय राऊत – कार्यकारी संपादक।  महाराष्ट्र में एक बार फिर गड़े मुर्दे उखाड़ने का प्रयास शुरू कर दिया गया है। इसे ही कुछ लोग इतिहास संशोधन कहते हैं। अपनी आंखों के समक्ष घटी घटना के बारे में चार लोग अलग-अलग जानकारी देते हैं। यह देखकर लिखा हुआ इतिहास सर वोल्टर रैले द्वारा जला दिए जाने अथवा पानी में फेंकने का उल्लेख इतिहासकार अक्सर करते हैं। आंखों के सामने घटी घटना को लेकर इतना दो मत तो इतिहास कालीन घटनाओं से संबंधित शाश्वत प्रमाण वैâसे दिया जाए, ऐसा सवाल रैले के मन में उठा। रैले के मन में उठे सवाल महाराष्ट्र के इतिहास संशोधनकर्ताओं के मन में क्यों नहीं उठने चाहिए, ऐसा सवाल मेरे मन में उठ रहा है। शिवाजी महाराज की जन्मतिथि को लेकर विवाद है ही। अब, ‘रायगढ़ पर शिवाजी महाराज की समाधि की खोज किसने की थी?’ इस पर ‘तिलक बनाम फुले’ ऐसी एक व्यर्थ बहस राजनेताओं ने शुरू कर दी। वह विवाद कम पड़ गया, इसलिए वर्ष १९९२ में अयोध्या की बाबरी को निश्चित तौर पर किसने गिराया था, ऐसा विवाद भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने शुरू कर दिया। इतने वर्षों के बाद भी श्रेय को लेकर विवाद खत्म नहीं हुआ और अयोध्या में राम मंदिर खड़ा होने के बावजूद युद्ध जारी है। बाबरी हिंदुत्व की लहर में तबाह हो गई, उस लहर के शिखर पर शिवसैनिक थे। बाबरी ढह गई यह महत्वपूर्ण है। शिवाजी महाराज का जन्म सन् १६२७ में हुआ था, ऐसा कुछ इतिहासकारों का मानना ​​है, जबकि कुछ अन्य इतिहासकारों का मानना ​​है कि छत्रपति का जन्म १६३० में हुआ था। जन्म कभी भी हुआ, फिर भी कुछ मामूली विवरणों से परे मुख्य ऐतिहासिक चरित्र पर कोई फर्क नहीं पड़ता। मुख्यत: शिवाजी राजा का जन्म महाराष्ट्र में हुआ यही महत्वपूर्ण है। जन्म तिथि की अनिश्चितता अज्ञात है।
प्रधानमंत्री का प्रमाणपत्र
हमारे प्रधानमंत्री श्री मोदी अपने भाषण में ऐतिहासिक प्रमाण भी देते हैं। सिखों के धर्मगुरु गुरु तेग बहादुर सिंह की ३००वीं जयंती के अवसर पर उन्होंने लाल किले से भाषण दिया। औरंगजेब कितना क्रूर और अत्याचारी था, इसकी याद उन्होंने दिलाई लेकिन एक बात इतिहास के रूप में सभी की नजरों के सामने से निकल जाती है। शिवाजी महाराज का जन्म जिस तरह से महाराष्ट्र में हुआ, उसी तरह से औरंगजेब का जन्म गुजरात के दाहोद में हुआ था। बचपन में उसने अपने पिता के साथ पूरे हिंदुस्थान का दो बार दौरा किया था। बादशाह बनने से पहले उसने पंद्रह साल तक महाराष्ट्र का प्रशासन संभाला था और उनके जीवन के अंतिम पच्चीस वर्ष महाराष्ट्र में ही युद्ध करते हुए बीते। इससे शिवाजी राजे और बादशाह औरंगजेब के बीच का मुकाबला कितना अभूतपूर्व और दीर्घ द्वेषवाला था, यह समझ में आ जाएगा।
समाधि की खोज
रायगढ़ में शिवाजी महाराज की समाधि की खोज किसने की थी? यह कार्य लोकमान्य तिलक द्वारा किए जाने की खोज राज ठाकरे ने संभाजीनगर की सभा में की। इसमें बिल्कुल भी तथ्य नहीं है। आम सहमति है कि महात्मा ज्योतिबा फुले ने रायगढ़ से शिवाजी राजा की समाधि की खोज की थी, लेकिन इस बारे में दो अलग-अलग प्रवाह हैं और दोनों ही प्रवाहों का सम्मान करना ही सही है। वर्ष १८६९ में महात्मा फुले ने रायगढ़ किले में स्थित छत्रपति शिवाजी महाराज की समाधि को ढूंढ़ निकाला और उनके जीवन पर पहला लंबा पोवाड़ा लिखा। तब शिवराय की समाधि जर्जर अवस्था में थी। उस समय शिवराय नाम का तूफान जीर्ण-शीर्ण समाधि में शांति से विश्राम कर रहा था। उस तूफान के पुन: उठे बगैर गुलामी में कुचली जा रही युवा पीढ़ी को प्रेरणा नहीं मिलेगी, यह फुले ने महसूस किया और वे शिवराय की समाधि को दुनिया के सामने लाए। धनंजय कीर ने महात्मा फुले की जीवनी लिखी थी। इसमें वे कहते हैं, ‘महात्मा फुले हिंदुस्थान में सामाजिक क्रांति के जनक थे। फुले ने छत्रपति शिवाजी महाराज की राजधानी रायगढ़ का दौरा किया। उनके मन में शिवाजी राजा के कार्यों और संघर्ष के प्रति सम्मान था। रायगढ़ जाकर वे इस महान राजा की समाधि की खोज करने लगे। सूखे पत्तों और पत्थरों के ढेर के नीचे दफन उक्त समाधि को उन्होंने ढूंढ़ निकाला।’ उसके बाद उन्होंने शिवराय के शौर्य पर पोवाड़ा लिखा। इतना ही नहीं तो रायगढ़ शिवाजी महाराज की समाधि की व्यवस्था सरकार अपने हाथ में ले ले, ऐसी अर्जी ज्योतिबा ने दी थी।
तिलक का काम भी है बड़ा
फुले ने शिवराय की समाधि की खोज की थी। उन्होंने कूड़े-कर्कट में छिपे महाराष्ट्र के ज्वलंत इतिहास को दुनिया के सामने लाया। लोकमान्य तिलक ने सार्वजनिक शिवजयंती के माध्यम से शिवराय की समाधि का एक तरह से जीर्णोद्धार ही कराया। १८८३ में जेम्स डगलस नामक एक अंग्रेजी इतिहासकार ने शिवाजी महाराज की समाधि की खराब अवस्था को लेकर ब्रिटिश सरकार की आलोचना की। उस समय भूमिपुत्रों के मन की बेचैनी को जानकर लोकमान्य तिलक ने श्री शिवाजी रायगढ़ स्मारक मंडल के माध्यम से रायगढ़ में छत्रपति शिवराय की समाधि के जीर्णोद्धार की पहल की। शिवाजी महाराज के मामले में लोकमान्य तिलक का काम भी उतना ही महान है, जितना कि महात्मा फुले का था। समाधि मामले में इतिहास को गींजते रहने का क्या अर्थ है और ‘तिलक बनाम फुले’ जैसा जातीय रंग क्यों दिया जाना चाहिए?
आखिर सच क्या है?
बाजीप्रभु देशपांडे की सच्ची-झूठी तस्वीरों पर इतिहासकारों ने विवाद किया। पावनखिंडी में शहादत पानेवाले बाजीप्रभु के महत्व को एक फिल्म में वैâसे मार दिया गया, यह मैंने देखा। शिवाजी महाराज के लिए पावनखिंडी में भूमि पर गिरे बाजीप्रभु के शौर्य को नकारना कौन-सा इतिहास है? इतिहासकारों ने मराठों के इतिहास में ही कितनी गड़बड़ी निर्माण की, अब इस पर ही शोध किया जाना चाहिए। सूर्याजी पिसाल का चित्रित व्यक्तित्व गलत है, ऐसा सेतुमाधवराव पगड़ी कहते हैं। उनका यह भी कहना है कि कल्याण के सूबेदार की पुत्रवधू शिवाजी महाराज के सामने कभी आई ही नहीं। पुणे के केलकर अपने संग्रहालय में मस्तानी महल उठा लाए। यह सार्वजनिक हुआ तब वह महल मस्तानी का हो ही नहीं सकता, ऐसा शिवशाहीर बाबासाहेब पुरंदरे ने कहा, लेकिन जेम्स लेन ने शिवाजी महाराज व उनके माता-पिता के संबंध में पूरी तरह से झूठा इतिहास लिखा और दुनिया में महाराष्ट्र के इतिहास को बदनाम किया, इसका निषेध करने के लिए कितने इतिहासकार और उनके राजनीतिक समर्थक आगे आए?
इतिहास को कितना गींजते रहोगे? जो कुछ भी नहीं बना सकते, वही इतिहास को चबाते हैं या इतिहास को नष्ट करते हैं। दिल्ली और महाराष्ट्र में ऐसा ही हो रहा है।

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