मुख्यपृष्ठसंपादकीयरोखठोकरोखठोख : राज्यसभा-विधान परिषद के जुगाड़ का संघर्ष: व्यावसायिक तराजू की...

रोखठोख : राज्यसभा-विधान परिषद के जुगाड़ का संघर्ष: व्यावसायिक तराजू की राजनीति

संजय राऊत -कार्यकारी संपादक 

राज्यसभा चुनाव के परिणाम घोषित हो गए हैं। विधान परिषद भी हो रहे हैं। छठी सीट भाजपा जीत गई, परंतु वह जीत सच्ची है क्या? ४१ बनाम ३९ ऐसा यह संघर्ष रहा। पहली पसंद के रूप में सर्वाधिक ३३ मत शिवसेना के उम्मीदवार ने हासिल किए, परंतु जीत भाजपा को मिली। केंद्रीय जांच एजेंसियों को भी चुनाव के व्यावसायिक तराजू पर बिठाने का मामला इस बार दिखाई दिया! 

महाराष्ट्र सहित देशभर में राज्यसभा के चुनाव संपन्न हुए। दिल्ली की सत्ताधारी पार्टी ऐसे चुनाव जीतने के लिए केंद्रीय एजेंसियों का उपयोग कितने अज्ञात ढंग से करती है। ये इसके जरिए एक बार फिर दिखाई दिया। महाराष्ट्र और हरियाणा में वह दिखा। राज्यसभा चुनाव के तंबू में लौटने के दौरान ही उसी तंबू में विधान परिषद के ११ उम्मीदवार खड़े हो गए। मतों का गणित हाथ में नहीं होने के बावजूद भाजपा द्वारा दो अतिरिक्त उम्मीदवार खड़ा किया जाना, इसका अर्थ उन्हें घोड़ेबाजार में चारा डालना है तथा महाराष्ट्र का माहौल बिगाड़ना है। राज्यसभा और विधान परिषद को मिलाकर कितने करोड़ का धुआं उड़ा? (विधान परिषद अभी होना है, परंतु करेक्ट कार्यक्रम शुरू हो गया है।) इस पर शर्त लग गई है। राज्यसभा चुनाव में महाराष्ट्र में ६ में से ३ सीटें भाजपा ने जीत ली। महाविकास आघाड़ी ने ३ सीटें जीती हैं। छठी सीट पर आसानी से जीत मिले इतना संख्या बल दोनों ओर नहीं था। इसलिए उस जगह के लिए कांटे की टक्कर हुई। कोल्हापुर के धनंजय महाडिक भाजपा व शिवसेना के उम्मीदवार संजय पवार भी कोल्हापुर के ही हैं। पवार को पहली पसंद के रूप में ३३ मत मिले। महाडिक को वहीं २७ मिले, परंतु दूसरी पसंद के मतों पर महाडिक की संख्या ४१ तक पहुंच गई और पवार ३९ पर। महाडिक विजयी हुए यह निश्चित ही है लेकिन पूरे महाराष्ट्र में जीत का बिगुल बजाया जाए और महाविकास आघाड़ी की दयनीय पराजय हुई, ऐसा ढोल बजाया जाए इतना कुछ भी नहीं हुआ। वसई-विरार के ठाकुरों ने अपने तीन मत सीधे भाजपा के पाले में डाल दिए और अन्य पांच निर्दलीयों को अपनी ओर घुमाने में श्री फडणवीस को सफलता मिली। छठी सीट व्यापारी और बीओटी पद्धति से लड़ी गई। दिल्ली में व्यापारियों की सत्ता आने के बाद से उन्होंने चुनाव को महंगा तो बना ही दिया लेकिन चुनाव जीतने के लिए केंद्रीय एजेंसियों का दुरुपयोग भी शुरू हो गया। चुनाव इतने महंगे हो गए हैं कि आम लोग अब चुनाव लड़ने का विचार भी नहीं कर सकते हैं। फिर भी शिवसेना ने एक सामान्य कार्यकर्ता संजय पवार को पूरी ताकत के साथ उम्मीदवारी दी और लड़ाया। धनशक्ति तथा केंद्रीय एजेंसियों के आगे उन्हें पराजय स्वीकार करनी पड़ी! लोकतंत्र और क्रांति की भाषा हम हमेशा करते हैं, परंतु ये दोनों शब्द आज की राजनीति में परास्त हो गए हैं। एक समय हिंदुस्थानी सोवियत यूनियन की क्रांति के प्रशंसक हुआ करते थे। आज वे नहीं रहे क्योंकि स्वयं पुतिन अय्याश व भोग-विलास वालों का नेतृत्व कर रहे हैं। सोवियत क्रांति के वास्तविक शिल्पकार की मृत्यु के बाद उन्हें सर्वाधिक श्रद्धा के साथ श्रद्धांजलि भारतीय संविधान के रचयिता डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने आंसुओं के साथ दी थी। स्टालिन की मृत्यु की खबर मिलते ही डॉ. आंबेडकर फूट पड़े और उनके अश्रु अनियंत्रित हो गए। उनके आंसुओं की वजह पूछते ही डॉ. आंबेडकर बोले, ‘एक चमार के बेटे ने पूरी दुनिया का कायापलट किया! मेरे देश में ऐसा कभी नहीं हो सकता इसलिए मुझे रोना आ रहा है।’ वर्ष १९५३ की यह श्रद्धांजलि है।
फिर भी हम पीछे ही
स्टालिन एक चर्मकार का बेटा था। उसी तरह आज के प्रधानमंत्री मोदी तो खुद ही चाय बेचकर यहां तक पहुंचे, ऐसा वे स्वयं कहते हैं। परंतु रूस-अमेरिका की तुलना में हम आज भी पिछड़े हुए हैं क्योंकि स्वतंत्रता की क्रांति से हमारा संबंध नहीं बचा है और लोकतंत्र स्वाद भर के लिए भी शेष नहीं बचा है। राज्यसभा चुनाव में लोकतंत्र को मारने के लिए धनशक्ति का इस्तेमाल किस तरह से होता है यह राजस्थान में दिखाई दिया। एक बार हरियाणा से राज्यसभा जीतकर आए सुभाष गोयल को भाजपा ने राजस्थान से चुनाव लड़ने के लिए भेजा। कांग्रेस के अधिकृत उम्मीदवार को गिराया जाए इसी के लिए यह सब खेल था। धन का बेशुमार इस्तेमाल वहां किया गया, परंतु अंतत: हुआ क्या? लोकतंत्र की गाड़ी को सुगमता से चलने नहीं देना है, यही भाजपा की नीति है। मंगलवार को मुंबई शेयर बाजार इतना गिरा कि ढाई लाख करोड़ स्वाहा हो गए। व्यापार और उद्योग के लिए आज देश का माहौल अच्छा नहीं है। कुछ गिने-चुने उद्योगपतियों के लाभ की नीति अमल में लाई जा रही है। अरब राष्ट्रों ने हिंदुस्थानी वस्तुओं और व्यापारियों का बहिष्कार कर ही दिया है क्योंकि भाजपा ने देश में धर्मांधता की जो विष बेल बोई उससे अंतत: पैगंबर मोहम्मद पर बदनामी का कीचड़ भाजपा के प्रवक्ताओं ने उछाला ही है। इससे तमाम अरब देश हिंदुस्थान के विरोध में खड़े हो गए हैं। इस्लामी धर्मांध व आतंकी संगठनों को इससे बल मिलेगा और देश की सुरक्षा खतरे में पड़ेगी। अलकायदा जैसे संगठनों ने चुनौती दी ही है, परंतु चुनाव जीतने के लिए भारतीय जनता पार्टी को ऐसा ही माहौल चाहिए होता है। मोहम्मद पैगंबर की अवमानना के बाद कानपुर में दंगों का दावानल भड़का तब दिल्ली के भाजपाई नेता और चुनावों के मास्टरमाइंड हर्षित हो गए। हमें जो चाहिए वही हो रहा है, ऐसा उन्हें कहना था।
धर्म का विभाजन
हिंदू और मुसलमान ऐसा सीधा विभाजन आज के शासकों ने हमारे देश में कर दिया है। पैगंबर को लेकर भाजपा के प्रवक्ताओं द्वारा बयां किया गया उद्गार  उसी पाठशाला की सीख है। लाखों-करोड़ रुपयों का काला धन आज भी हमारी राजनीतिक व्यवस्था में खेल रहा है। यह काला धन जिस इजारेदार पूंजीवाद से तैयार हुआ है। उस एकाधिकार शाही को तोड़कर काला धन खत्म करने का आश्वासन देकर मोदी सत्ता में आए। परंतु काला धन जस-का-तस है। कदाचित काला धन ही भाजपा का बल बन गया है। भाजपा की सत्ता जहां नहीं है, वहां ‘भ्रष्टाचार-भ्रष्टाचार’ कहकर उंगली दिखाई जाती है, परंतु हर चुनाव में जो करोड़ों रुपए लोग उड़ेल रहे हैं वह पैसा कहां से आया? जहां से पैसा आया वहां वे प्रहार वैâसे करेंगे? पैसा और जाति-धर्म के ही जोर पर चुनाव लड़े जा रहे हैं और आर्थिक कार्यक्रमों की कोई चर्चा करने को ही तैयार नहीं है। यही सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात है।
करोड़ों-करोड़ों की बातें
भारतीय जनता पार्टी के विधान परिषद के एक उम्मीदवार को निर्वाचित किए जाने के लिए करोड़ों-करोड़ों की बात कर रहे हैं। कल वे अलग पार्टी में थे। वहां भरपूर पैसा कमाया और भाजपा में चले गए। भाजपा आज ऐसे ही लोगों की पार्टी बन गई है। कोई कैसा  भी बर्ताव करे हम अपनी निष्ठा के अनुसार ही बर्ताव करेंगे यह लोकतंत्र का पहला नियम है। नैतिक आचरण के अनुरूप ही लोकतंत्र का आचरण शर्त रहित होता है।
असहमति यह लोकतंत्र की नीव ही है। सभी लोगों के मत एक जैसे ही हों, ऐसी अपेक्षा होगी तो लोकतंत्र का नाम किसलिए लेना? जिनसे मतभेद होंगे उनके प्रति योग्य आदर सिर्फ लोकतंत्र में ही रखा जाता है। विशेषत: हमारे देश के जिन-जिन महान पुरुषों ने देश के लिए त्याग किया, कष्ट भोगा, पूरी जिंदगी व्रत की तरह लोगों की सेवा में खर्च कर दी उनके प्रति सिर्फ मतभेद है इसलिए मनमाने बयान देना अथवा उनका अपमान करना यह लोकतांत्रिक नहीं है, बल्कि फासिस्ट मनोवृत्ति के लक्षण हैं। भ्रष्ट रास्ते से करोड़ों रुपए की संपत्ति जमा करनेवाले ही नैतिकता व भ्रष्टाचार का पाठ पढ़ाते हैं, यह उचित नहीं है। राज्यसभा चुनाव के उपलक्ष्य में कई मुखौटे टूटकर गिर गए। विधान परिषद चुनाव में वे मुखौटे पूरी तरह फट जाएंगे।
राज्य बचेगा क्या?
विधान परिषद चुनाव में पंकजा मुंडे को भाजपा ने एक बार फिर नजरअंदाज कर दिया। गोपीनाथ मुंडे व पंकजा मुंडे को माननेवाले कार्यकर्ताओं को उम्मीदवारी देना, सत्ता के पद देना, पंकजा मुंडे को एकांकी करना, ऐसी भाजपा की नीति नजर आती है। श्री देवेंद्र फडणवीस को महाराष्ट्र में अपनी टीम खड़ी करनी है और उस टीम में पुराने निष्ठावान भाजपा के पदाधिकारियों का स्थान नजर नहीं आता है। कांग्रेस, राष्ट्रवादी और अन्य दलों से आए लोगों को गट्ठर बनाया है। उन्हें राज्यसभा से विधान परिषद तक की उम्मीदवारी आसानी से मिल गई। सदाभाऊ खोत, पडलकर, लाड, बोंडे को उम्मीदवारी मिलती है, परंतु खडसे को पार्टी छोड़नी पड़ती है और श्रीमती मुंडे को अपमानित करके नजरअंदाज किया जाता है। पैगंबर का अपमान करनेवाली नूपुर शर्मा को फडणवीस फोन करके ‘बेटी, चिंता मत करो!’ ऐसा ढांढस बंधाते हैं तो हैरानी होती है। जिस नूपुर शर्मा के बयान के कारण देश आतंकी हमलों के विस्फोटकों पर खड़ा है उन्हें एक नेता समर्थन कैसे  दे सकता है? पंकजा मुंडे हाशिए पर हैं और भाजपा देश में अराजकता पैâलाने का प्रयास करनेवाली नूपुर शर्मा जैसों की पनाहगाह है।
राज्यसभा चुनावों का परिणाम आ गया है, परंतु भाजपा का विजयोत्सव और कुछ दिनों तक जारी रहेगा। शिवसेना द्वारा संभाजीराजे छत्रपति को उम्मीदवारी न दिए जाने का फल उन्हें मिला, ऐसा भाजपा व श्री फडणवीस द्वारा कहा गया। परंतु धनंजय महाडिक की जगह भाजपा ने संभाजीराजे को निर्दलीय उम्मीदवार बनाकर राज्यसभा के लिए विजयी क्यों नहीं बनाया? यह मेरा सवाल है। सभी बातों में राजनीति व राजनीति पर व्यापार करना यह उनकी नीति है। विधान परिषद के चुनाव को भी उन्होंने तराजू पर ही रखा है। केंद्रीय एजेंसियों का डंडा, हंटर हाथ से छीन लिया जाए तो भाजपा के पास क्या बचता है?
उनकी मुट्ठी भी खाली ही है! देवेंद्र फडणवीस भाजपा के महाराष्ट्र में बड़े नेता हैं, परंतु इस व्यावसायिक जुगाड़ से महाराष्ट्र को क्या मिला?

अन्य समाचार