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रोखठोख : श्रीराम की अयोध्या,अयोध्या के हनुमान : सरयू तट पर हिंदुत्व की जगमगाहट!

संजय राऊत -कार्यकारी संपादक 

श्रीराम को जननी और जन्मभूमि से प्रेम था। अयोध्या की ५०० वर्षों की लड़ाई उसी जन्मभूमि के लिए थी, जो कि अब खत्म हो गई है। भव्य मंदिर का निर्माण हो रहा है। बगल में श्री हनुमान हैं ही, परंतु देश का माहौल हिंदू-मुसलमान में विभाजित हो गया है। श्रीराम को यह स्वीकार हुआ होता क्या? हनुमान की गदा देश तोड़नेवालों के सिर पर पड़ेगी क्या?

‘जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी श्रेष्ठ है’, ऐसा कहनेवाले राजा श्रीराम की अयोध्या में तीन दिन रहा। बीते ३० वर्षों में मैं कई बार अयोध्या गया, परंतु अब अयोध्या का स्वरूप पूरी तरह बदलता नजर आ रहा है। लखनऊ से अयोध्या और वाराणसी से अयोध्या ऐसे बेहतरीन मार्ग अब तैयार हो गए हैं। अयोध्या के विकास के लिए साढ़े ५ हजार करोड़ की निधि खर्च हो रही है। अयोध्या व आसपास की जमीन की कीमतें ‘चंद्र और मंगल’ पर की जमीन जैसी बढ़ गई हैं, जो राजा श्रीराम पिता को दिए गए वचन का पालन करने के लिए राज्य का त्याग करके सीधे वनवास चले गए, वह राजा देशभर के गरीबों का भगवान है। पंढरपुर में विठोबा उसी तरह अयोध्या में राम। उस अयोध्या में अब राम मंदिर के रूप में स्वर्ग का निर्माण हो रहा है। अयोध्या में बीते ५०० वर्षों से श्रीराम जन्मभूमि की लड़ाई चल रही थी। सर्वोच्च न्यायालय ने १,०४५ पन्नों में  फैसला   सुनाया है। राम जन्मभूमि पर हिंदुओं का ही अधिकार होने को स्वीकार किया है। एक न्यासी मंडल बनाकर मंदिर निर्माण का कार्य शुरू किया गया है। एक भव्य लड़ाई का यह ऐसा सुखद अंत हुआ।
श्रीराम भारतीय संस्कृति के प्रतीक हैं। भारतवासियों के वे जीवन हैं। श्रीराम जन्मभूमि कोई मंदिर-मस्जिद का झगड़ा नहीं है। मंदिर तो कहीं भी बनाया जा सकता है। मस्जिद भी कहीं भी बना सकते हैं, परंतु राम जन्मभूमि का स्थान बदला नहीं जा सकता है। उस पर यह ऐसी जन्मभूमि जहां साक्षात श्रीराम ने जन्म लिया!
फिर अयोध्या दर्शन!
श्री आदित्य ठाकरे एक दिन के अयोध्या दौरे पर आए और इस मौके पर संपूर्ण अयोध्या फिर से देखने का मौका मिला। प्रत्यक्ष श्रीराम के दर्शन, हनुमान गढ़ी के दर्शन और संध्याकाल में माता सरयू की आरती। हिंदू धर्म का अध्यात्म मतलब क्या, यह सरयू की आरती का नयनरम्य रूप देखकर समझा। श्री आदित्य ठाकरे ने हजारों लोगों की उपस्थिति में माता सरयू की आरती की उस समय सरयू का घाट फूलों और दीयों से सजाया गया था। सरयू के जल में ५,१०० दीप प्रवाहित किए गए। उस शांत प्रवाह में बहने का दृश्य नेत्र दीपक होता है। नदी में नौका में सवार भी भक्त आरती का आनंद लेते हैं और संपूर्ण सरयू माता नए अवतार में प्रकट होती हैं। १२, १३, १४ जून ये तीन दिन सरयू की जयंती का उत्सव। सरयू तट पर गीत, संगीत, अध्यात्म की त्रिवेणी ही बहती है। इसी सरयू तट पर श्रीराम की अयोध्या नगरी बसी है।
सरयू तट पर राम
श्रीराम को सरयू सर्वाधिक प्रिय थी। उनका बचपन उसके तट पर बीता। सरयू के सभी घाटों का अब पुनर्निर्माण किया गया। वहां हजारों भक्त स्नान करते हैं। डुबकी लगाते हैं और सरयू का जल मैला होता है। सरयू का उद््गम विष्णु के द्रव से हुआ और विष्णु ने श्रीराम के रूप में अयोध्या में अवतार लिया तथा सरयू की गोद में जीवन व्यतीत किया, ऐसी कथा है। सरयू का जल अत्यंत प्रभावी होने की मान्यता है। यहां पाप और रोग धोए जाते हैं, ऐसी भावना है। राम कथा का प्रवाह पीढ़ियों से कैसे आगे बढ़ रहा है ये देखो।
ब्रह्मदेव की कठोर तपस्या से भगवान श्रीहरि द्रवित हो गए। उनकी आंखों से बहे आंसुओं को ब्रह्मदेव मानसरोवर ले गए। उन्हीं तपस्वी बूंदों को महर्षि वशिष्ठ अयोध्या ले आए। भगवान के नेत्रों से बाहर निकलने के कारण सरयू को ‘नेत्रजा’, तो वशिष्ठ द्वारा मानसरोवर से अयोध्या में लाए जाने के कारण ‘वशिष्ठी’ कहा जाता है। ऐसी कई राम कथाओं का भंडार अयोध्या की मिट्टी में दबा है। मैं १३ तारीख को अयोध्या पहुंचा व सरयू घाट पर गया। तब लक्ष्मण घाट पर ढाई क्विंटल दूध से सरयू का अभिषेक चल रहा था। दि. १२, १३, १४ सरयू महोत्सव और उसी महोत्सव का दीपक प्रज्ज्वलित रखकर १५ तारीख को आदित्य ठाकरे की उपस्थिति में भव्य आरती समारोह संपन्न हुआ।
अखाड़ों की राजनीति
अयोध्या का प्रत्येक मंदिर व अखाड़ा स्वतंत्र शोध का विषय है। धर्मनीति के साथ राजनीति के भी वे अखाड़े हैं। इन अखाड़ों में भी विवाद है। हनुमान गढ़ी का अयोध्या में विशेष महत्व है। अयोध्या के तमाम घटनाक्रमों का यह प्रमुख वेंâद्र है। महंत ज्ञानदास नामक तपस्वी इस गढ़ी के प्रमुख हैं, परंतु वहां शब्द चलता है तो सांसद ब्रजभूषण शरण सिंह का ही। ‘नेताजी की एक पुकार पर वहां लाखों लोग जुट जाते हैं’, ऐसा श्री ज्ञानदास महाराज ने कहा। उन्होंने आदित्य ठाकरे को आशीर्वाद दिया और बालासाहेब ठाकरे से नासिक के कुंभ  मेले में मुलाकात के दौरान की यादों के बारे में बताया। पूरा ठाकरे परिवार दर्शन के लिए यहां आए। हम उनका स्वागत करेंगे, ऐसा ज्ञानदास जी ने कहा। ब्रजभूषण शरण सिंह व आदित्य ठाकरे के बीच दूरध्वनि पर बातचीत हुई यह महत्वपूर्ण है। हनुमान गढ़ी के सभी संत-महंतों द्वारा आदित्य ठाकरे को भरपूर आशीर्वाद देते हुए सभी ने देखा।
गढ़ी का इतिहास
श्री हनुमान मंदिर अर्थात ‘हनुमान गढ़ी’ यह अयोध्या का प्रमुख मंदिर है। मंदिर विशाल है। साठ सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं और वहां फूलों  से आच्छादित श्री हनुमान जी के दर्शन होते हैं। हनुमान गढ़ी का इतिहास दिलचस्प है। आज जो ‘हिंदू-मुसलमान’ ऐसी आग लगाने की खुराफात कर रहे हैं, उन्हें यह इतिहास सबसे पहले समझ लेना चाहिए। सैकड़ों वर्षों का यह इतिहास है। एक बार लखनऊ और फैजाबाद  के प्रशासक नवाब मंसूर अली खान का बेटा असाध्य रोग से ग्रस्त हो गया। कई वैद्य, हकीमों द्वारा इलाज के बाद भी वह ठीक नहीं हुआ। रोग बढ़ता गया तब नवाब हनुमान गढ़ी के श्री हनुमान जी के चरणों में पहुंचे। उन्होंने अपने बेटे को हनुमान जी की सीढ़ियों पर रख दिया और बेटा बीमारी से मुक्त हो गया। तबसे नवाब हनुमान के भक्त बन गए। श्रद्धालु नवाब ने हनुमान जी के पास की ५२ बीघा जमीन मंदिर को दान कर दी। साधुओं की सुविधा के लिए भव्य फलों का बाग लगाया। उसी समय श्री अभयरामदास जी से निवेदन करके हनुमान जी का एक भव्य विशाल मंदिर बनवाया गया, जो आज हनुमान गढ़ी के नाम से प्रसिद्ध है। नवाब की श्रद्धा से इस मंदिर का निर्माण हुआ है। इसलिए आज भी कई मुसलमान बंधु यहां श्रद्धा के साथ आकर पूजा करते हैं। कई मुस्लिम संत श्री हनुमान जी के प्रति श्रद्धा के कारण स्थायी रूप से अयोध्यावासी बन गए।
यह अयोध्या अलग है
दशरथ के समय की अयोध्या नगरी अलग थी। उस समय की भाषा में वह बारह योजन लंबी थी। नगर में मुख्य ‘सड़क’ विशाल थी। उस पर प्रतिदिन पानी का छिड़काव किया जाता था। सड़क के दोनों ओर सुगंधित फूलों के वृक्ष थे। आज वह दृश्य नहीं है। आज की अयोध्या महाराज विक्रमादित्य ने बसाई है। महाराज विक्रमादित्य देशाटन करते हुए संयोग से सरयू तट पर पहुंचे। उनकी सेना ने डेरा डाला तब वहां सिर्फ जंगल था। प्राचीन तीर्थों के निशान नजर नहीं आ रहे थे। महाराजा विक्रमादित्य को उस भूमि के आध्यात्मिक, धार्मिक महत्व का आभास होने लगा। उन्होंने शोध शुरू किया। आसपास के योग सिद्ध संतों से उन्हें पता चला कि यह अवध भूमि है। श्रीराम की जन्मभूमि है। महाराज ने श्रीराम की नगरी को पुन: बसाया, परंतु मथुरा की तरह ही इस भूमि पर बार-बार आक्रमण होते रहे। इन तमाम आक्रमणों को झेलकर अयोध्या आज खड़ी है।
विचारों का क्या?
अयोध्या में श्रीराम के भव्य मंदिर के निर्माण का कार्य चल रहा है। २०२४ से पहले यह मंदिर अर्थात राष्ट्र की अस्मिता तैयार हो जाएगी। मंदिर के न्यासी मंडल के सदस्य श्री चंपत राय, आदित्य ठाकरे के स्वागत के लिए मंदिर परिसर में उपस्थित थे। उन्होंने पूरा परिसर घुमाकर दिखाया। जहां मंदिर का निर्माण हो रहा है, उस प्रत्यक्ष जन्मभूमि पर वे ले गए। राम के गर्भगृह जहां प्रत्यक्ष श्रीराम विराजमान होंगे उस पवित्र जगह पर भी ले गए। यह सब रोमांचक था। राम लोकाभिमुख व लोकाभिराम थे। राम इस तरह से सुंदर व मनमोहक व्यक्तित्व वाले थे कि उनके दर्शन से शत्रु शस्त्र उठाना भूल जाएगा। राम नि:स्वार्थी थे, त्यागी थे, एकवचनी थे। राम सभी के थे। वे जननायक थे, स्वाभिमान के प्रतीक थे। अयोध्या में भव्य मंदिर का निर्माण होगा, परंतु लोकाभिराम श्रीराम के ये गुण कैसे  लोगे? हिंदू-मुसलमानों के झगड़े में देश जलता है। एक मुसलमान भक्त ने अयोध्या में हनुमान जी का मंदिर बनवाया। वो राम भक्त हनुमान भी आगजनी देखकर बेचैन हो गए होंगे। उन्होंने रावण की लंका जलाई। यहां श्रीराम का राज्य ही कुछ लोग जलाने के लिए निकले हैं।

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