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रोखठोक: दिल्ली का पानी कैसा है?

संजय राउत

दिल्ली का पानी उतना अच्छा नहीं, ऐसा नितीन गडकरी ने कहा वो सही ही है। आज पाकिस्तान, चीन दिल्ली के शत्रु नहीं हैं। सत्य बोलने वालों को शासक अपना शत्रु मानते हैं, उस समय शासकों को अपना देश बौने जैसा लगता है। उन्हीं लोगों ने दिल्ली के पानी को गंदा किया है! वो शुद्ध कैसे होगा? महाराष्ट्र का राजनीतिक माहौल कितना मैला हो गया है और कई लोग एक-दूसरे को हमेशा के लिए समाप्त करने के लिए निकले हैं, ये नौ तारीख को जेल से बाहर आने के बाद फिर से अनुभव हुआ। आर्थर रोड जेल के मुख्य द्वार के बाहर एक छोटा-सा स्मृति स्तंभ खड़ा किया गया है। स्वतंत्रता पूर्व काल में कई स्वतंत्रता सेनानी और क्रांतिकारी आर्थर रोड जेल में रहते थे। उन स्वतंत्रता वीरों की स्मृतियों को संजोए रखने के लिए यह स्तंभ खड़ा किया गया, लेकिन लोकतंत्र और स्वतंत्रता का अब नामोनिशान तक नहीं बचा है। राजनीति विषैली बन गई है, इतना तो ब्रिटिश काल में भी नहीं था। लोकतंत्र और संसद का तो केवल नाम लिया जाता है। वास्तव में इन दोनों संस्थाओं का महत्व ही नष्ट हो गया है। जेल में रहते हुए श्री नितीन गडकरी का एक भाषण पढ़ने में आया। उन्होंने विश्वास के साथ कहा, ‘राष्ट्रीय राजनीति में कदम रखने के बाद मुझे अब तक कई व्यक्ति मिले। इसमें बहुत बड़े लगनेवाले व्यक्ति छोटे निकले, जबकि प्रत्यक्ष में जो व्यक्ति छोटे लगते थे, वे वास्तव में बड़े निकले। दिल्ली का पानी अच्छा नहीं।’ गडकरी ने जो कहा वह आज जनभावना क्यों बन गई, इसका जवाब दिल्ली के आज के सिपहसालार को तलाशना चाहिए, लेकिन आज के सिपहसालारों को उनके मन मुताबिक जवाब चाहिए होता है। वे देंगे नहीं, वे शत्रु बनते हैं! पाकिस्तान, चीन ये दिल्ली के शत्रु नहीं हैं। विश्वास के साथ बोलने वाले, सच बोलने वाले जिन्हें अपने शत्रु लगते हैं, उस समय उन शासकों ने हमारे देश को मैला किया हुआ होता है। ऐसे ओछे नेतृत्व वाले लोकतंत्र और स्वतंत्रता का मोल क्या समझेंगे?
न्यायमूर्ति का विचार!
निवर्तमान सर न्यायाधीश ललित ने सेवानिवृत्त होते समय जो कहा था क्या वैसा आज सही मायने में घटित हो रहा है? ‘कितना भी हमला किए फिर भी हिंदुस्थान में लोकतंत्र सुरक्षित है’, ऐसा श्री ललित ने कहा, लेकिन वैसी तस्वीर आज की नहीं रह गई है। न्या. ललित आगे बोले कि ‘देश की न्यायपालिका कानून को लागू करने के लिए तत्पर है। न्यायालय में कोई भी मामला हमारे सामने आया तो हम केवल कानून के सिद्धांतों और विचारों के मुताबिक मार्गदर्शन करते हैं। अदालती केसों में कितनी भी खतरनाक परिस्थितियां हों फिर भी न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में कोई एक केस आने पर उसे समान व्यवहार दिया जाना चाहिए। किसी के साथ अन्याय हुआ हो अथवा कोई पीड़ित हो, तो उसे अदालत की छत के नीचे सुरक्षा मिलनी ही चाहिए!’ न्या. ललित का ये कहना राष्ट्रहित में है, न्याय तंत्र का आदर करनेवाला है, लेकिन न्यायालय की छत इस समय कितनी फटी है उसे क्या कहें? न्यायालय को ‘मंदिर’ मानकर नतमस्तक होनेवालों में न्या. ललित हैं। वे भी अब निवृत्त हो गए और राजनीति में बदला लेने के लिए केंद्रीय जांच एजेंसियों से लेकर अदालतों तक सभी हथियारों का इस्तेमाल खुलेआम हो रहा है। भ्रष्टाचार मिटाने और ईमानदारी करने की केवल सलाह दी जाती है, वो भी शासकों के भाषण में। वास्तविक तौर पर गंगा उल्टी दिशा में बह रही है। एक बार एक युवा कार्यकर्ता वरिष्ठ राजनीतिक नेता के पास गया और पूछने लगा, ‘दुनिया में सफल वैâसे हो सकते हैं, इसे लेकर क्या आप मेरा मार्गदर्शन करेंगे?’ उस वरिष्ठ नेता ने कहा, ‘दुनिया में सफल होना है, तो ईमानदारी के सिवाय कोई विकल्प नहीं है। एक बार आप ईमानदार हैं, ऐसा आभास पैदा करते ही, सफलता की कोई सीमा नहीं!’ आज देश में अमर्यादित तरीके से वही शुरू है!
हिटलर का काल
संसदीय लोकतंत्र तरीका यह सबसे खराब प्रशासन पद्धति है, लेकिन अन्य पद्धति तो उससे भी बदतर है, ऐसा विंस्टन चर्चिल का मत था। आज हमारे देश में संसदीय लोकतंत्र है। इसमें लोकतंत्र और स्वतंत्रता का अंश तलाशना पड़ता है, ऐसा कई लोगों को लगता है। विरोधी दलों के लिए संसदीय लोकतंत्र में स्थान ही नहीं बचा और विरोधियों के खिलाफ सभी कठोर कानून एकतरफा पद्धति से इस्तेमाल किए जा रहे हैं। इस पर मुझे हिटलर के काल में जर्मनी की दो घटनाएं याद आ रही हैं। नाजी के हाथ में सत्ता आई उस समय थोड़े दिनों में जर्मनी की पार्लियामेंट के राइशस्टाग की इमारत में आग लगने से वह भस्म हो गई। इस घटना का लाभ नाजी ने उठाया और केवल संदेह के आधार पर किसी को भी गिरफ्तार कर लिया गया।
१९१६ के कानून (प्रोटेक्टिव कस्टडी एक्ट) में व्यक्ति के अधिकार तो अबाधित थे। वह भी मार्च १९३३ में वापस ले लिए गए। ऐसे मामले अदालत के अधिकार क्षेत्र से बाहर रखे गए। १४ जुलाई, १९३३ के बाद एक नाजी पार्टी छोड़कर अन्य सभी दलों पर निषेधाज्ञा यानी प्रतिबंध ही लगा दिया गया, लेकिन एक तेजस्वी प्रसंग भी उसी काल में हुआ। मार्च १९३३ में राइशस्टाग की सभा में सोशल डेमोक्रेट पार्टी के नेता ऑटो वेल्स ने हिटलर के मुंह पर अगला उद्गार निकाला था, ‘हमारे प्राण और हमारी स्वतंत्रता भी नहीं छीनी जा सकती है, लेकिन हमारी पहचान कोई नहीं मिटा सकता। आपके हाथ में सत्ता आई है यह वास्तविक परिस्थिति हमें प्रत्यक्ष दिख रही है, लेकिन लोगों में न्याय की भावना और चेतना भी एक राजनीतिक शक्ति है। कोई भी कानून आपको जनता के विचार और विचार की स्वतंत्रता को समाप्त करने की शक्ति नहीं दे सकता, ये ध्यान रखें। ये विचार चिरकाल तक टिकने वाला है और अविनाशी है!’ जर्मन नेताओं के ये उद्गार आज के हिंदुस्थान के लिए मार्गदर्शक हैं। सरकार को जो नहीं चाहिए होता है, ऐसे राजनीतिक विरोधियों को जेल में भरना ये कोई स्वतंत्रता नहीं!
स्वतंत्रता सेनानियों का स्तंभ
आर्थर रोड जेल के मुख्य द्वार के बाहर स्वतंत्रता सेनानियों के नाम का एक स्मृति स्तंभ है, लेकिन इस जेल में वास्तव में कौन से स्वतंत्रता सेनानी रह रहे थे, इसका कोई विशेष

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