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रोखठोक : महाराष्ट्र की गोलमाल राजनीति … अजीत पवार, शिंदे का क्या होगा?

संजय राऊत
श्री शरद पवार और अजीत पवार की मुलाकात हुई। इस विषय को अब पीछे छोड़ देना चाहिए। दोनों पवारों की मुलाकात राजनीतिक नहीं होनी चाहिए। श्री पवार ने राज्य में कई बड़ी संस्थाओं को खड़ा किया। शिक्षा, सहयोग, कृषि के क्षेत्र में वे काम करते हैं। उन संस्थानों पर शरद पवार ने अपने भतीजे अजीत पवार को बैठाया। अब सवाल है कि आगे क्या होगा? पवार के जीवित रहने के दौरान ही अजीत पवार ने उनकी पार्टी पर दावा ठोक दिया, पर संस्थाओं का क्या?

श्री शरद पवार की राजनीति की महाराष्ट्र विगत ४५ वर्षों से चर्चा करता रहा है। पवार की संसदीय राजनीति को पचास साल का कालखंड बीत चुका है। इतने लंबे समय तक चर्चा और राजनीति में रहने वाला कोई दूसरा नेता देश की राजनीति में आज तो मौजूद नहीं है। अब श्री पवार बार-बार सुर्खियों में आ रहे हैं तो अजीत पवार के साथ हो रही मुलाकातों की वजह से। अजीत पवार ने पवार से सियासी रिश्ते तोड़ लिए हैं। अजीत पवार और उनका गुट भाजपा के पाले में आ गया और इससे उनके गुट के विधायकों के खिलाफ चल रही ‘ईडी’ की कार्रवाई पर ब्रेक लग गया। शिवसेना और एनसीपी के टूटने की यही मुख्य वजह है। अजीत पवार आज की राजनीति में एक मजबूत नेता हैं, लेकिन सत्ता की गदा और शरद पवार का नाम उनके साथ नहीं होगा तो अजीत पवार कौन है, यह सवाल हर कोई पूछेगा। अजीत पवार को राजनीति में शरद पवार ही लाए थे। आज के शिखर पर पहुंचाया। उस शिखर से उन्होंने शरद पवार को धकेलने का प्रयास किया। फिर भी शरद पवार और अजीत पवार के बीच ‘संवाद’ जारी है। इससे लोगों में भ्रम निर्माण होगा ही। शरद पवार और अजीत पवार क्यों मिल रहे हैं? मेरी जानकारी के अनुसार, ये मुलाकातें राजनीतिक नहीं हैं। श्री शरद पवार ने विद्या प्रतिष्ठान से लेकर कृषि, किसानी, सहकारिता से संबंधित संस्थानों का एक बड़ा नेटवर्क बनाया। शरद पवार, अजीत पवार को उन सभी संस्थानों में ले आए। इन संस्थाओं में हजारों किसानों, मजदूरों, छात्रों का भविष्य निहित है। संस्थानों का भविष्य तय करने के लिए ये बैठकें हुई होंगी। महाराष्ट्र की सबसे बड़ी रैयत शैक्षणिक संस्थान के अध्यक्ष श्री शरद पवार, जबकि संचालक अजीत पवार हैं। ऐसी समस्या कई संस्थानों में है। इन संस्थाओं को आसमान की ऊंचाइयों पर ले जाने का काम श्री शरद पवार ने किया। उस ऊंचाई पर जो लोग आज लटककर खड़े हैं, उन्हें आज अपने पद छोड़कर अपनी खुद की नई संस्था बनाने की सियासी उदारता दिखानी चाहिए। लेकिन आखिरकार यह पवार परिवार का अंदरूनी मसला है, जहां शरद पवार द्वारा स्थापित राष्ट्रवादी कांग्रेस पर ही अजीत पवार दावा ठोक रहे हैं। श्री पवार के जीवनकाल में ही उनकी पार्टी पर स्वामित्व की बात कही गई, वहां संस्थाओं के अधिकारों की तो बात ही क्या की जाए?
मार्मिक तस्वीर
पवार की राजनीति को अच्छे-अच्छे लोग नहीं समझ पाते। बालासाहेब ठाकरे ने पवार पर बेहतरीन कार्टून बनाया था। उन्होंने एक बार महाराष्ट्र के राजनीतिक नेताओं को विभिन्न पक्षियों के रूप में चित्रित किया। पवार की तुलना कुर्सी में छेद करने वाले कठफोड़वा पक्षी से की गई। उन्होंने तस्वीर में दिखाया कि शरद पवार ‘कठफोड़वा पक्षी’ जैसी चोंच नुकीली न होने के बाद भी कुर्सी में छेद कर देते हैं। यह पवार की राजनीति पर एक मार्मिक टिप्पणी थी। लगभग ४०-४५ साल बाद अजीत पवार को कठफोड़वा पक्षी के रूप में देखा जा रहा है। पवार की पार्टी में छेद करके वे निकल गए। भारतीय जनता पार्टी अजीत पवार का इस्तेमाल करके महाराष्ट्र में शरद पवार के नेतृत्व युग को खत्म करने के लिए प्रयत्नशील है। महाराष्ट्र के एक सशक्त नेता के रूप में श्री पवार का जो स्थान है, उसे इससे झटका लगा है। नियति रोज नए दांव खेलती रहती है और राजनीति का चक्र ऊपर-नीचे होता रहता है। देश की राजनीति में महाराष्ट्र का वर्चस्व न रहे, इसके लिए शिवसेना और शरद पवार को खत्म कर दिया जाए, दिल्ली हमेशा से ऐसी साजिश रचती रही है। लेकिन श्री उद्धव ठाकरे नई उम्मीदों के साथ खड़े हैं ही और दावानल भड़काने की जिद लिए शरद पवार इस उम्र में भी पूरे महाराष्ट्र में घूम रहे हैं। उद्धव ठाकरे और शरद पवार के साथ दिल्ली ने जो सियासत की वह महाराष्ट्र को पसंद नहीं आई और लोगों ने इन दोनों नेताओं के साथ मजबूती से खड़े होने का निर्णय लिया है। एकनाथ शिंदे और अजीत पवार के लिए इस नए तूफान का सामना करना आसान नहीं है।
पार्टी का मालिक कौन है?
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी अर्थात अजीत पवार ही, ऐसी तस्वीर गलत है। जिस तरह से एकनाथ शिंदे का मतलब शिवसेना नहीं हो सकता, वैसे ही अजीत पवार का मतलब राष्ट्रवादी कांग्रेस नहीं हो सकता। यही वजह है, उद्धव ठाकरे ने शिंदे और उनके समूह के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया। अदालती लड़ाई, विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष संघर्ष, इस तरह से शिवसेना हर जगह लड़ाई लड़ रही है। शिवसेना आर-पार की लड़ाई के लिए उतर गई है। फूटे हुए विधायकों को अयोग्य घोषित करवाना शिवसेना का ‘लक्ष्य’ है। राष्ट्रवादी में कौन किसके साथ और कितने हैं, आज भी किसी को पता नहीं चला है। जयंत पाटील दृढ़तापूर्वक शरद पवार के साथ हैं, लेकिन जयंत पाटील के भी भाजपा की ओर जाने की खबरें प्रसारित हो रही हैं। पाटील के परिजनों को ‘ईडी’ ने परेशान किया है और उन्हें उलझन में डाल दिया है। ‘कौन किस पार्टी में जाएगा, इसका पैâसला भी ‘ईडी’ करती है,’ ऐसा श्री शरद पवार का बयान है। ‘ईडी’ के डर से जो भाग गए हैं, वे २०२४ में सत्ता परिवर्तन के बाद वापस आ जाएंगे, ऐसा लगता है। मोदी सरकार जा रही है, यदि ऐसे संकेत भी मिल जाएं, तो भी भाजपा का तंबू खाली हो जाएगा। अजीत पवार से मेल-मुलाकात हो चुकी है फिर भी पवार ने भाजपा और मोदी के प्रति कड़ा रुख अपनाया है, ऐसा नजर आता है और इसकी वजह भी साफ है। मोदी का समर्थन मतलब प्रतिगामी शक्तियों का समर्थन और जो आज गए हैं, उनकी राजनीति आगे खुद ब खुद खत्म हो जाएगी, ऐसा उनका विश्वास है। अजीत पवार के साथ भाजपा के पाले में जाने की गलती शरद पवार नहीं करेंगे। आखिरकार, यह कोई व्यक्ति विशेष का मामला नहीं है। यह लोकतंत्र बनाम तानाशाही का मामला है। भारतीय जनता सामंतवाद की गुलाम नहीं है। कांग्रेसी सामंतवाद से तंग आकर जनता मोदी को सत्ता में लाई। लेकिन मोदी शासन तानाशाही की पराकाष्ठा साबित हुआ। लोग अब इस सत्ता से भी ऊब चुके हैं। अब इस सामंतवाद को खत्म करके नए भारत का निर्माण होने के स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं। इसलिए महाराष्ट्र के नेताओं के साथ दुर्व्यवहार और गोलमाल की राजनीति नहीं की जा सकती है। अजीत पवार अपने चाचा के दम पर बड़े हुए और उन्होंने अपने चाचा की ही राजनीति को संकट में डाल दिया तथा वह आज गोलमाल की राजनीति कर रहे हैं।
महाराष्ट्र के बुर्ज
एकनाथ शिंदे की मुख्यमंत्री पद की कुर्सी में अजीत पवार रूपी कठफोड़वा पक्षी छेद करेगा और इस पक्षी को शक्ति प्रदान करने का काम देवेंद्र फडणवीस करेंगे, यह अब तय हो चुका है। शिंदे द्वारा आयोजित स्नेहभोज में अजीत पवार शामिल नहीं हुए। अजीत पवार को मुख्यमंत्री बनना है और फडणवीस समर्थक भाजपाई विधायकों के लिए शिंदे बोझ बन गए हैं। शिंदे के कारण महाराष्ट्र में भाजपा को भारी नुकसान हो रहा है, ऐसा कहनेवाले प्रतिनिधिमंडल दिल्ली में अमित शाह से मिलते हैं और महाराष्ट्र में परिवर्तन होगा, उन प्रतिनिधिमंडलों से कहा जाता है। जबकि २०२४ के बाद भी मुख्यमंत्री के पद पर हम ही रहेंगे, ऐसा श्री अमित शाह का वचन होने की बात श्री शिंदे कहते हैं। यह अब सही नहीं रहा। अगर वादा निभाना होता तो अजीत पवार का घोड़ा मैदान में आया ही नहीं होता। महाराष्ट्र की राजनीति हिचकोले खा रही है और दिल्ली उस अस्थिरता का लाभ उठाना चाहती है।
शरद पवार की अजीत पवार से मुलाकात का विषय पीछे छूट गया है। उसका पीछे छूटना ही महाराष्ट्र के हित में है। अजीत पवार को अपने दम पर अपनी श्रेष्ठता साबित करनी है, तभी वे नेता साबित होंगे। उन्हें एक स्वतंत्र पार्टी बनाकर चुनाव लड़ना चाहिए। भाजपा की मदद से जो शिंदे ने किया, यदि अजीत पवार भी वही करेंगे तो उनकी राजनीति रेत के महल की तरह ढह जाएगी। क्योंकि राजनीति में बुर्जों का महत्व होता है। रेत के महलों का नहीं।
महाराष्ट्र की राजनीति में फिलहाल यही चल रहा है।

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