मुख्यपृष्ठसंपादकीयरोखठोकरोखठोख : २०१४ के बाद की नई आजादी! स्वतंत्रता, तेरी व्याख्या क्या?

रोखठोख : २०१४ के बाद की नई आजादी! स्वतंत्रता, तेरी व्याख्या क्या?

कल १५ अगस्त यानी आजादी का अमृत महोत्सव। प्रधानमंत्री मोदी ने उत्सव मनाने के लिए कहा। घर-घर में तिरंगा बांटा गया। लेकिन किस स्वतंत्रता का यह अमृत महोत्सव है? कांग्रेस के आजादी की लड़ाई का योगदान भुलाया नहीं जा सकता और देश की स्वतंत्रता २०१४ के बाद मिली, ऐसा डटकर कहनेवाले लोग देश की सत्ता में हैं।

हमारे परमपूज्य प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने पूरी दुनिया में `आजादी का अमृत महोत्सव’ मनाने का फैसला  किया है और उसी के अनुसार आजादी का अमृत महोत्सव अब शुरू हो गया है। इसके तहत घर-घर में तिरंगा बांटने की पहल की जा रही है और कुछ करोड़ तिरंगे बांटे गए। कांग्रेस पार्टी ने देश के स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व किया। गांधी, नेहरू, पटेल, मौलाना आजाद समेत सावरकर, भगत सिंह, अशफाक उल्लाह खान, राजगुरु के साथ असंख्य क्रांतिकारियों ने स्वतंत्रता संग्राम में योगदान दिया। तिलक से लेकर नेहरू तक कांग्रेस नेताओं ने सबसे ज्यादा लड़ाई लड़ी और कारावास भोगा। लेकिन कांग्रेस को पूरी तरह से अलग रखकर आजादी का अमृत महोत्सव मनाया जा रहा है। औपचारिकता के तौर पर कल १५ अगस्त को गांधी जी का नाम लिया जाएगा। लेकिन कांग्रेस और उनके नेताओं का स्वतंत्रता संग्राम से कोई लेना-देना नहीं है, यह बताने के लिए पूरी कोशिशें पिछले ७-८ वर्षों से की जा रही हैं। वर्ष २०१४ में देश में मोदी का राज आया। भारतीय जनता पार्टी के कुछ उतावले लोग कहते हैं, `देश को असली आजादी वर्ष २०१४ में ही मिली है।’ ऐसा कहना या सोचना उस गौरवशाली स्वतंत्रता संग्राम का अपमान है। मंगल पांडेय, तात्या टोपे, झांसी की रानी से शुरू हुए इस संग्राम में हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, पारसियों सहित सभी ने योगदान दिया, लेकिन आजादी के अमृत महोत्सव में यह जांचने का समय आ गया है कि हमारे देश में लोकतंत्र और स्वतंत्रता वास्तव में कहां है?
कई सवाल और संकट!
देश के सामने ही नहीं, बल्कि संघर्ष के बाद मिली आजादी के सामने आज कई सवाल और संकट पहाड़ की तरह खड़े हैं। जिस नेक उद्देश्य के लिए हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने गुलामी की बेड़ियों को तोड़ दिया, क्या उस गुलामी का अंत सही अर्थों में हुआ है? इस पर लोगों के मन में संदेह है। वर्ष १९७५ के बाद देश की स्थिति स्वतंत्रता पर संकट और आपातकाल की थी। उस आपातकाल के खिलाफ जो जनसंघ के लोग लड़े व जेल गए, उनकी अगली पीढ़ी आज देश की सत्ता में है और देश में हर दिन आजादी और लोकतंत्र का गला घोंटने का काम चल रहा है। इंदिरा गांधी या कांग्रेस सरकारें `सीबीआई’ का दुरुपयोग करती हैं, ऐसी जिनकी आपत्ति थी, वे सीबीआई, आयकर व `ईडी’ जैसी एजेंसियों का इस्तेमाल राजनीतिक विरोधियों को खत्म करने के लिए कर रहे हैं और विपक्षियों की सरकार गिराने के लिए इन एजेंसियों का उपयोग निर्दयता के साथ किया जा रहा है। देश की वर्तमान स्थिति के बारे में मुख्य विपक्षियों का क्या कहना है, वह देखें-
देश के लोकतंत्र का दम घुट चुका है। वह सांस लेने के लिए छटपटा रहा है।
पी. चिदंबरम
ईडी, सीबीआई, इनकम टैक्स जैसी एजेंसियों का उपयोग भ्रष्टाचार रोकने के लिए नहीं, बल्कि राजनीतिक विरोधियों को खत्म करने के लिए किया जा रहा है।
वृंदा करात
हमारा सर्वोच्च न्यायालय भी दबाव में है। `मनी लॉन्ड्रिग कानून’ का दुरुपयोग शुरू है और सर्वोच्च न्यायालय उस कानून का विचार करने को तैयार नहीं है। किसी एक राजनीतिक दल का मामला किस न्यायाधीश के सामने जाना चाहिए इसकी `फिक्सिंग’ होती है।
कपिल सिब्बल
देश में विरोधी दलों के मतों को महत्व नहीं होगा, तो लोकतंत्र को खतरा है।
मुख्य न्या. रमण्णा
प्रमुख नेताओं की बीते आठ-पंद्रह दिनों की भूमिका `स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव’ पर सवालिया निशान पैदा करती है। वृंदा करात ने एक और बयान दिया। `हर घर तिरंगा’ के साथ ही ‘घर-घर संविधान’ यह अभियान भी चलाओ, ऐसा उन्होंने कहा। देश को आज संविधान बचाने की जरूरत है।
व्यक्ति प्रधान राजनीति
स्वतंत्रता के बाद के युग में हर भारतीय को देश निर्माण के लिए आग्रह किया जाना आवश्यक था, लेकिन व्यक्ति प्रधान राजनीति की तरह सार्वजनिक जीवन में भी व्यक्ति प्रधानता आई। श्री नरेंद्र मोदी भी इसके अपवाद नहीं साबित हुए। इसलिए स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव में भी अनंत समस्याएं हैं। श्री मोदी और उनका दल चुनाव जीतता है इसलिए वे महान साबित नहीं होते। चुनाव जीतने के लिए राजनीतिक और वित्तीय तंत्र से वे भली-भांति अवगत हैं। उन्हें बहुमत खरीदने आता है। विरोधियों की सरकारों को सहजता से गिराना आता है। क्योंकि भय पैदा करनेवाली `ईडी’ जैसी एजेंसियों का खुलेआम उपयोग हो रहा है। महाराष्ट्र में ऐसा ही कुछ किया गया है। बिहार में नीतीश कुमार ने भाजपा का साथ छोड़ दिया और तेजस्वी यादव के साथ सरकार बनाते ही भाजपा के सुशील मोदी ने धमकी देते हुए कहा कि `तेजस्वी यादव जमानत पर बाहर हैं यह न भूलें।’ इसका मतलब यह है कि हम तुम्हें कभी भी अंदर डाल सकते हैं, इसे इस अर्थ के रूप में लिया जाना चाहिए। अंग्रेज भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों के साथ इसी तरह व्यवहार कर रहे थे। साल २०१४ में देश को सच्ची आजादी मिली। उससे पहले सिर्फ अंधेरा था, ऐसा जो अब कह रहे हैं, उन्होंने वास्तव में आखिर क्या किया? इसके विपरीत सार्वजनिक, सरकारी उद्यमों को निजी उद्योगपतियों को बेचने की योजना बनाई। वर्ष १९४७ में स्वतंत्रता मिलने पर पंडित नेहरू प्रधानमंत्री हुए। नेहरू को लगता था कि औद्योगीकरण ही हिंदुस्थान की दरिद्रता को दूर करने का उचित तरीका है, जबकि गांधी जी ग्रामीण केंद्रित अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने के पक्ष में थे। इन दोनों दृष्टिकोणों में अंतर है, फिर भी दोनों की भूमिका राष्ट्र कल्याण की थी। आज महंगाई, बेरोजगारी पर एक भी नेता बात कर रहा है क्या? नोटबंदी के बाद औद्योगीकरण में गिरावट आई है। बेरोजगारी १५ करोड़ पर पहुंच गई। `अग्निवीर’ जैसी बकवास व निरर्थक योजनाओं की भूलभुलैया देशभक्ति के नाम पर लाई गई। लोग भूखे व कंगाल हैं और इसका एक ही उपाय है, वह मतलब राम मंदिर का घंटानाद व हिंदू-मुसलमानों में झगड़ा लगाना! आजादी का अमृत महोत्सव का यही उपहार है!
गंदगी साफ हुई क्या?
स्वतंत्रता के सामने आज चुनौतीपूर्ण स्थिति है। देश की गंदगी साफ करने के लिए मोदी आए लेकिन लाभ नहीं हुआ। कुछ उद्योगपतियों, व्यापारियों की गिरफ्तारी हुई लेकिन जो असल में जेल के भीतर जाने चाहिए थे, वे सभी भाजपा के दानदाता और सरकार के आश्रयदाता बन गए हैं। आज देश की निरंकुश सत्ता मोदी-शाह के हाथ में है लेकिन स्वतंत्रता की सुबह काले बादलों से ढकी हुई है। सार्वभौम लोकतंत्र का मंदिर खाली है। न्यायालय से लेकर समाचार पत्रों तक सभी दहशत के साये में हैं। चुनाव हो रहे हैं लेकिन सामने आ रहे नतीजों पर लोगों का भरोसा नहीं रहा। तिरंगा लहरा रहा है लेकिन संविधान पैदल है। देश में ऐसी भयावह, अराजक स्थिति पहले कभी पैदा नहीं हुई। फिर भी स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव मनाया जा रहा है। स्वतंत्रता और लोकतंत्र सांस लेने के लिए संघर्ष कर रहे हैं!
यह कैसी  स्वतंत्रता? साल २०१४ के बाद जो स्वतंत्रता मिली, वह यही है।
फिर भी हे स्वतंत्रता, अपनी परिभाषा बता!
आजादी का अमृत महोत्सव में भी तो तू बोल, अपनी व्याख्या बता!

अन्य समाचार