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रोखठोक : सजन रे झूठ मत बोलो…

 

संजय राऊत -कार्यकारी संपादक

नरेंद्र मोदी की तरह महाराष्ट्र के असंवैधानिक मुख्यमंत्री ‘खतरनाक’ तरीके से झूठ बोलते हैं। उद्धव ठाकरे पर आरोप लगाने और कीचड़ उछालने से शिंदे का ही असली चेहरा उजागर हो रहा है। जैसे प्रधानमंत्री हैं वैसे उनके चेले हैं, लेकिन यह महाराष्ट्र की परंपरा नहीं है।

प्रधानमंत्री मोदी अचानक अयोध्या पहुंचे और अयोध्या की सड़कों पर उन्होंने रोड शो किया। राम के नाम पर वोट मांगने का यह प्रयास बिल्कुल व्यर्थ है। तीसरे चरण के मतदान के लिए देश जब आगे बढ़ रहा है, तब कार्यवाहक प्रधानमंत्री मोदी राम के मंदिर में जाते हैं। मूर्ति के सामने ध्यानस्थ खड़े होने की तस्वीरें प्रकाशित की जाती हैं, जो सीधे तौर पर आचार संहिता का उल्लंघन है। प्रधानमंत्री पद पर बैठे व्यक्ति को तो कम-से-कम ऐसा व्यवहार नहीं करना चाहिए। हम अयोध्या स्थित राम मंदिर के मालिक हैं और इसीलिए देश के हिंदुओं को वोट देना चाहिए, ऐसा मोदी और उनके लोग मानते हैं, लेकिन इतना कुछ करने के बावजूद उत्तर प्रदेश में भी इस बार राम लहर नहीं उठी और उत्तर में भाजपा का खेल ४५ से ५० सीटों में ही सिमट रहा है। ये बात मोदी-शाह की धड़कनें तेज कर रही हैं।
राम का नाम, पैसे का इस्तेमाल, पुलिस, ईडी की दहशत, पाखंड को दरकिनार कर लोग हर जगह मतदान करने के लिए जा रहे हैं। मोदी ने अपने १० साल के कार्यकाल में देश को क्या दिया? इसका जवाब एक वाक्य में दिया जाए तो पिता को पिता मत मानो। मां को मां मत कहो। स्वार्थ महत्वपूर्ण है, मोदी ने यह नया आदर्श दिया और ऐसे आचरण करने वाले लोग जगह-जगह तैयार किए। यह तस्वीर इस बार बारामती लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र में प्रमुखता से दिखाई दी। जब मतदान हो रहा था तब इंदापुर के विधायक दत्ता भरणे मतदान केंद्र के बाहर खड़े होकर लोगों को धमका रहे थे। ‘अगर सुप्रिया सुले को वोट दिया तो याद रखना, बारामती से आपको बचाने कोई नहीं आएगा। सामना मेरे साथ है,’ ऐसी भाषा का वे उपयोग करते रहे। अजीत पवार ने इंदापुर के मतदाताओं को धमकी दी कि अगर उन्होंने उनकी पत्नी को वोट नहीं दिया तो वे पानी बंद कर देंगे।
दत्ता भरणे ने शरद पवार का साथ छोड़कर अजीत पवार का दामन थामा और अपने ही पिता के खिलाफ चुनौतीपूर्ण भाषा बोली। पिछले दस वर्षों में मोदी-शाह द्वारा बोया गया जहर उबल चुका है। इससे महाराष्ट्र की प्रतिष्ठा और संस्कृति नष्ट हो गई है।
दिमाग पर असर?
महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे का दिमाग पूरी तरह से खराब हो गया है। जब मोदी-शाह की सत्ता खत्म हो जाएगी, तब ऐसे लोगों का जीना और सड़कों पर चलना मुश्किल हो जाएगा। मोदी-शाह कोई अमरपट्टा पहनकर इस धरातल पर नहीं उतरे हैं। शिंदे बार-बार एक ही बात की रट लगा रहे हैं। देवेंद्र फडणवीस, गिरीश महाजन समेत भाजपा के पांच नेताओं को जेल में डालने, भाजपा के विधायकों को धमकाकर उनमें से २० से २५ विधायकों को तोड़ने और सरकार को मजबूत करने की साजिश उद्धव ठाकरे रच रहे थे, ऐसा मुख्यमंत्री शिंदे इस बीच बारंबार बोल रहे हैं। शिंदे के ये बयान खोखले और उनके मौजूदा मालिकों को खुश करने के लिए हैं। भाजपा के लोग आज किसी को भी अवैध तरीके से गिरफ्तार कर लेते हैं। केजरीवाल, सोरेन जैसे मौजूदा मुख्यमंत्रियों को प्रचार में भाग लेने से रोकने के लिए गिरफ्तार किया जाता है। ये विकृति भाजपा की है। असल में मोदी-फडणवीस-शाह की ‘तिकड़ी’ एकनाथ शिंदे, अजीत पवार और उनके साथ सात-आठ लोगों को गिरफ्तार करने वाली थी। इस ‘साजिश’ की भनक लगते ही शिंदे और उनके लोग तत्काल भाजपा में भाग गए। महाराष्ट्र में आज भी भगोड़े लोगों की जमात है, ये शिंदे ने दिखा दिया। अब फडणवीस आदि लोगों को जेल में डालने की साजिश थी, इस बात का शिंदे ने खुलासा किया है। फडणवीस, महाजन आदि के खिलाफ गंभीर आरोप हैं और उन सभी फाइलों को मौजूदा मुख्यमंत्री महोदय को देखना चाहिए और जनता की जानकारी के लिए सार्वजनिक करना चाहिए। गृहमंत्री रहते हुए फडणवीस छुपकर अपने विरोधियों के फोन सुनते थे। विरोधियों पर नजर रखी जाती थी और उसके लिए महानिदेशक स्तर के एक अधिकारी को विशेष रूप से नियुक्त किया गया था। उस अधिकारी रश्मि शुक्ला के खिलाफ केस दर्ज हुआ और मामला फडणवीस तक जा पहुंचा। इसी डर से भाजपा ने शिंदे आदि लोगों को ब्लैकमेल कर के महाविकास आघाड़ी की सरकार गिरा दी गई और नई सरकार आते ही फडणवीस ने रश्मि शुक्ला के खिलाफ दर्ज सभी मामले वापस लेकर अपना पीछा छुड़ा लिया। यह सीधे तौर पर सत्ता का दुरुपयोग और आतंकवाद है। इस मामले में गहन जांच करने में कोई दिक्कत नहीं थी। केवल खुद की खाल और कारावास बचाने के लिए ही शिंदे-फडणवीस ने मिलीभगत की और महाराष्ट्र की महाविकास आघाड़ी सरकार को गिरा दिया। शिंदे आज झूठ बोल रहे हैं। यह मोदी-फडणवीस के आपसी संबंधों का परिणाम है।
पार्टी छोड़ने की कोशिश
एकनाथ शिंदे ने पांच साल में तीन बार पार्टी छोड़ने की कोशिश की। कांग्रेस व राष्ट्रवादी कांग्रेस में शामिल होने की भी उनकी योजना थी। जब पृथ्वीराज चव्हाण मुख्यमंत्री थे, तब अहमद पटेल से हाथ मिलाकर वे कांग्रेस में जाने ही वाले थे, लेकिन आखिरकार मोदी-शाह ने उनमें यह हुनर ​​देखा और उनके खेल को प्रोत्साहित किया। यह खेल जल्द ही खत्म हो जाएगा। शिंदे के मुंह पर भाजपा का भोंगा है और उस भोंगे से वे हर दिन उद्धव ठाकरे पर नए आरोप लगा रहे हैं। शिंदे का नया आरोप उनके बिगड़ते मानसिक स्वास्थ्य का सबूत है। कहते हैं कि ठाणे के शिवसेना जिलाप्रमुख आनंद दिघे की संपत्ति पर उद्धव ठाकरे की नजर थी। उनकी मृत्यु के बाद दिघे की संपत्ति कहां है? ऐसा प्रश्न ठाकरे ने पूछा था, यह कहना हास्यास्पद है। मूलत: दिघे टेंभी नाका पर स्थित जिस आश्रमनुमा मठ में रहते थे, वह मठ ही उनकी संपत्ति थी और इस वास्तु पर शिंदे ने गैरकानूनी तरीके से कब्जा कर लिया है। खुद शिंदे की संपत्ति का दायरा भी असीमित है और पैसा ही उनका मुख्य हथियार है। इतनी सारी संपत्ति वैâसे जमा हुई? दिघे के नाम पर ये लोग पिछले दो साल से व्यापार करने लगे हैं। आनंद दिघे की आत्मा भी इससे व्यथित हो रही होगी। श्री शिंदे मंत्रालय में बैठकर दूसरे लोगों की ‘संपत्ति’ का हिसाब-किताब करते हैं, लेकिन ३०-३५ साल पहले ठाणे का एक साधारण रिक्शाचालक आज इफरात संपत्ति का मालिक वैâसे बन गया? उसी पैसे से वे विधायक और सांसद खरीदकर राज्य के मुख्यमंत्री बन जाते हैं और दिल्ली के नए पिता के चरणों में थैलियों के ढेर रख देते हैं। यह गौरव उन्हें आनंद दिघे की वजह से मिला या फिर शिवसेना, ठाकरे परिवार की वजह से? इसका खुलासा एक बार होना ही चाहिए। दिघे मोदी की तरह ढोंगी फकीर नहीं थे। वे एक सच्चे फकीर थे। उस फकीर के नाम पर ठाणे में कई लोगों ने पैसा कमाया। उससे रिक्शा की जगह मर्सिडीज के बेड़े, बंगले, इस्टेट खड़े किए।
शिंदे आज दूसरे के घर पर पत्थर फेंक रहे हैं। उनका शीशे का घर ढहने के कगार पर है!
वह दिन दूर नहीं है!
शिंदे की मौजूदा बात सुनकर मुझे ‘तीसरी कसम’ फिल्म का एक गाना याद आता है। मुकेश अपनी दर्द भरी आवाज में कहते हैं…
‘सजन रे झूठ मत बोलो
खुदा के पास जाना है…’
शिंदे को यह नहीं भूलना चाहिए। सच बोलने के लिए भी मर्द का सीना चाहिए। क्या उनके पास वो है?

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