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रोखठोक : महाराष्ट्र की ये ऐसी मनौती, फरेबियों का व्यावसायिक हिंदुत्व खत्म करो!

  • कड़कनाथ मुंबैकर

श्री गणेश का सार्वजनिक उत्सव महाराष्ट्र की परंपरा है। तिलक ने गणपति को ‘राष्ट्रीय’ नेतृत्व दिया। उस समय स्वाधीनता की शपथ ली गई थी। आज महाराष्ट्र की प्रतिष्ठा खत्म करके मुंबई को लूटने का प्रण लिया गया है। श्री गणेश को ये सब खत्म करना होगा।
हिंदुस्थान देश उत्सवप्रिय और छुट्टीप्रिय है। इससे भी ज्यादा अर्थात यह एक चमचागीरी पसंद है। फिलहाल महाराष्ट्र में घर-घर में श्री गणेश का आगमन हुआ है। सार्वजनिक गणेश उत्सव भी धूमधाम से मनाए जा रहे हैं। इस पर्व में भी मनौती के गणपति अलग हैं। ईश्वर एक ही है। भले ही तैंतीस कोटि देवता होंगे, लेकिन श्री गणेश का रूप एक ही है। परंतु उसमें भी मनवांछित प्रदान करनेवाले गणपति अलग और उस गणपति के मंडप में लंबी-लंबी कतारें लगी हैं। क्योंकि इस गणपति के दर्शन के लिए गृहमंत्री अमित शाह, भाजपा के अध्यक्ष श्री नड्डा, अमिताभ बच्चन, जो कोई भी मुख्यमंत्री है वो, अंबानी, अदानी आदि ‘अमीर’ सेलिब्रेटी जाते रहते हैं। उनके लिए अलग मार्ग, अलग सुविधाएं, अलग प्रार्थना, लेकिन ये मनौती वाले भगवान असल में किस पर कृपा करते हैं? श्री अदानी अब दुनिया में तीसरे सबसे अमीर व्यक्ति बन गए हैं। कल तक ये स्थान मुकेश अंबानी का था। इस पर अब अदानी काबिज हो गए। एक भारतीय व्यक्ति वैश्विक अमीरों की सूची में शीर्ष स्थान पर पहुंच गया है, इसकी खुशी है। लेकिन एक व्यक्ति के अमीर बन जाने से देश और १३० करोड़ जनता अमीर बनेगी क्या? अमीरों की स्पर्धा में श्री अदानी आगे निकल गए। कौन से देवता ने उन्हें मनवांछित प्रदान किया, उन्हें मिला, लेकिन मुंबई-पुणे में मनौती वाले गणराय के सामने सालों-साल से घोर गरीब पीड़ितों की कतार पर कतार लगी है। उन कतारों को कम करने का कार्य अदानी, अंबानी जैसे ५० अमीर करते हैं, तो भी श्री गणेश उत्सव का कार्य सार्थक हो जाएगा।
श्रेय ठाकरे को ही!
महाराष्ट्र में आज पाबंदियों से मुक्त गणेश उत्सव मनाया जा रहा है। इसका श्रेय उद्धव ठाकरे को ही मिलना चाहिए। बीते दो वर्षों में जो कोरोना से लड़े, दो साल तक उन्होंने सख्त पाबंदियों को अमल में लाया, लोगों में जागरूकता लाई इसलिए आज का पाबंदियों से मुक्त, स्वच्छंद उत्सव मनाया जा रहा है। शिंदे-फडणवीस की सरकार ‘टपकी’ ये इस वजह से नहीं हुआ। एक साल तक तो सार्वजनिक गणेशोत्सव ‘मनाया’ ही नहीं गया। फिर भी लोग श्री गणेश की आराधना करते ही रहे। लोकमान्य तिलक ‘घरों के’ अर्थात महलों के गणेश को सड़क के पंडाल में ले आए। इसके पीछे एक राष्ट्रीय प्रेरणा थी। आज राजनीतिक गुटों-समूहों की प्रेरणा नजर आती है। सार्वजनिक गणेश उत्सवों पर कल शिवसेना का वर्चस्व था, आज भी है। लोकमान्य के काम को शिवसेना ने आगे बढ़ाया। लेकिन इस वर्चस्व को खत्म करने की विकृत स्पर्धा अब शुरू हो गई है। मुंबई पर से ‘मराठी’ वर्चस्व को समाप्त करना होगा, तो सार्वजनिक गणेशोत्सव मंडलों पर कब्जा कर लो या खरीद लो। इस नीति में तिलक-ठाकरे की राष्ट्रीय-महाराष्ट्रीय विचार पिछड़ गया और अलग झंडों और नेताओं की स्पर्धा शुरू हो गई है। ये तस्वीर महाराष्ट्र के लिए व्यथित करनेवाली है। महाराष्ट्र ये आपका-हमारा महाराष्ट्र रहेगा क्या? इस संदेह की सफेद पताका (आत्मसमर्पण की) आज फड़कने लगी है। श्री गणेश के समक्ष भ्रमित हुए लोगों को सद्बुद्धि देने की बड़ी चुनौती है!
अजेय गणेश
श्री गणेश बुद्धि के, सत्य और न्याय के देवता हैं। फिर भी इन तीन मुख्य चीजों का अकाल यहां क्यों पड़ना चाहिए? देवताओं की काशी में इस त्योहार के दौरान ऐसा महाप्रलय आया कि भगवान और मंदिर पानी में जलमग्न हो गए। यानी भगवान हैं तब भी दुख और सुख का चक्र अनवरत रूप से चलता रहेगा। लोकमान्य तिलक ने श्री गणराय को राष्ट्रीय कार्य के लिए चुना। पुराण के सभी देवी-देवताओं की कहीं-न-कहीं, कभी-न-कभी पराजय हुई है। लेकिन गणपति हमेशा अजिंक्य, अपराजित रहे हैं। सभी ज्ञात-अज्ञात युद्धों में श्री गणेश की जीत ही हुई है। लोकमान्य तिलक ने स्वतंत्रता संग्राम के लिए श्री गणेश को सेनापति के रूप में नियुक्त किया। उन्होंने गणपति से आह्वान किया। ‘घरों से, महलों से सड़क पर उतरें और राष्ट्रीय आंदोलन का नेतृत्व करें।’ तिलक चांदी के सिंहासन वाले गणपति को चटाई से बने पंडाल में ले आए। उन्हीं पंडालों से आगे चापेकर बंधु जैसे कई वीर और क्रांतिकारी तैयार हुए। तिलक ने श्री गणेश को बहुजनों का नेता बनाया। वर्ष १८९३ में कस्बे के गणपति से प्रारंभ करके तिलक ने पुणे में सार्वजनिक गणेशोत्सव का शुभारंभ किया। इस पर्व के बारे में तिलक ‘केसरी’ में लिखते हैं, ‘यह गणेशोत्सव जुलाहा, माली, बढ़ई, रंगरेज, ब्राह्मण, व्यापारी, मारवाड़ी, चर्मकार, कुंभार , सुनार, बनिया सभी ने मिलकर मनाया।’ यह तिलक महाराज आग्रहपूर्वक बताते हैं। तिलक ब्राह्मण थे, लेकिन उन्होंने बहुजन समाज, तेली-तंबोलियों की अगुआई भी की। इसके लिए उन्होंने श्री गणेश की सार्वजनिक तौर पर स्थापना की। उस उत्सव का एकमात्र उद्देश्य ‘राष्ट्र और महाराष्ट्र’ था। आज ऐसा ध्येय कहां दिखाई देता है? महाराष्ट्र का ऐसा कुछ बचा ही नहीं, तो देश का क्या होगा?
ये कैसे संत?
जिस सार्वजनिक गणेशोत्सव की शुरुआत महाराष्ट्र से हुई, उस महाराष्ट्र में सार्वजनिक का महत्व खत्म किया जा रहा है। महाराष्ट्र ही हिंदुत्व की मूल भूमि है। वीर सावरकर, शिवसेनाप्रमुख बालासाहेब ठाकरे और पहले सरसंघचालक यहीं पैदा हुए। उसी महाराष्ट्र में नकली हिंदुत्व को सिंहासन पर बैठाकर पालकी में घुमाया जा रहा है। पालकी के कहार कौन हैं, क्या ये श्री गणेश नहीं जानते हैं? रामदेव बाबा नामक एक नकली व्यापारी संत गणेशोत्सव की पूर्व संध्या पर मुंबई में प्रकट हुए और घोषणा की, ‘मुख्यमंत्री शिंदे ही हिंदुत्व के गौरव पुरुष होने के कारण शिवसेनाप्रमुख के विचारों के उत्तराधिकारी हैं!’ बाबा रामदेव का यह बयान यानी संत पद के लिए कलंक है। भाजपा कोई नौटंकी रचती है और उसके अनुसार कलाकार रंगमंच पर आते हैं और डायलॉग बोलकर चले जाते हैं। कल को ये नकली बाबा कश्मीर में जाकर गुलाम नबी आजाद से मिलेंगे और घोषित करेंगे, ‘आप ही असली राष्ट्रपुरुष और गांधी-नेहरू के उत्तराधिकारी हैं!’ राहुल गांधी सत्ता में आ रहे हैं, ऐसी भनक इन बाबाओं को लग गई तो वे सोनिया गांधी को राष्ट्रमाता और राहुल को नए पंडित नेहरू के तौर पर घोषित कर देंगे। श्री गणेश के पर्व पर ऐसी चमचागीरी का ‘मेला’ महाराष्ट्र बर्दाश्त नहीं करेगा। किसी समय इसी बाबा ने ‘मातोश्री’ पर आकर श्री उद्धव ठाकरे को भी हिंदुत्व के असली तारनहार होने का प्रमाण पत्र बहाल किया था। हालांकि यही बाबा दिल्ली के एक आंदोलन के दौरान आधी रात के समय ‘साड़ी-चोली’ पहनकर लड़कियों की पंजाबी वेशभूषा में भाग गए थे। ये भगोड़े महाराष्ट्र में आकर भगोड़ों को हिंदुत्व वीरों की उपाधि बहाल करते हैं। यह महाराष्ट्र और हिंदुत्व का अपमान है। महाराष्ट्र में इस बाबागीरी का जादू-टोना इस गणेशोत्सव में नष्ट हो जाए। श्री गणेश योद्धाओं के सेनापति हैं। न्याय करनेवालों के देवता हैं। श्री गणेश की कृपा से महाराष्ट्र लड़ता रहेगा और न्याय की रक्षा करेगा।
श्री गणेश के चरणों में महाराष्ट्र की यही मनौती है!

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