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रोखठोक : न्याय का घंटा, चोरी हो गया!

कड़कनाथ मुंबैकर

बिलकिस बानो का मामला फिलहाल चर्चा में है। गोधरा कांड के दौरान उसके साथ बलात्कार किया गया। उसकी मां और तीन साल की बेटी की हत्या कर दी गई। बिलकिस ने न्याय के लिए संघर्ष किया। ११ दोषियों को उम्रकैद की सजा हुई। लेकिन आजादी के अमृत महोत्सव के दौरान उन ११ दोषियों को माफ कर दिया गया और उन पर फूल बरसाए गए। यह हिंदुत्व नहीं है। यह न्याय का घंटा चोरी हो जाने का परिणाम है!
कुछ चीजों को धर्म से परे देखना चाहिए। फिर चाहे आप धर्मनिरपेक्ष हों अथवा कट्टर हिंदूवादी या फिर कट्टर मुसलमान। परंतु हमारे शासकों के यह सब भूलने पर जनता से क्या उम्मीद की जा सकती है? गुजरात के बिलकिस बानो मामले में भी ऐसा ही हुआ है। शासक चुप हैं, ये समझा जा सकता है लेकिन समाज भी ठंडा, लुंज-पुंज हो गया है। वर्ष २००२ में गुजरात में हुए सांप्रदायिक दंगों में बिलकिस बानो के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया था। उसका घर जला दिया गया। बिलकिस की मां और उसकी तीन साल की बेटी की हत्या कर दी गई। इस प्रकरण को पहले दबाने का प्रयास किया गया। लेकिन बिलकिस अपने साथ हुए अन्याय के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ती रही। अंतत: सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई गुजरात के बाहर यानी महाराष्ट्र में करने का फैसला सुनाया। महाराष्ट्र में मुकदमा चला और बिलकिस के अपराधियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। सच कहें तो दुष्कर्म और हत्या के इस मामले के गुनहगारों को फांसी पर लटकाना चाहिए था। लेकिन आजीवन कारावास की सजा पर समेट दिया गया। परंतु अब आजादी के अमृत महोत्सव के उपलक्ष्य में गुजरात सरकार ने जेल के कैदियों को सार्वजनिक माफी देने की घोषणा की और बिलकिस के ११ गुनहगारों को ‘माफी’ देने का निर्णय लिया है। इन सभी गुनहगारों के बाहर आते ही उनका सत्कार किया गया। उनका जुलूस निकाला गया। यह सब हमारी हिंदू संस्कृति के अंतर्गत उचित है क्या? भाजपा जिस हिंदुत्व को लेकर जोश में है, उस हिंदुत्व में नारी शक्ति और महिलाओं के सम्मान को महत्वपूर्ण माना गया है। लेकिन यहां का हिंदुत्व बलात्कारियों को अभय देनेवाला और उनका सत्कार करनेवाला है। ताज्जुब ये है कि १५ अगस्त को आजादी के अमृत महोत्सव के दौरान लाल किले से प्रधानमंत्री द्वारा दिए गए भाषण में नारी शक्ति के गौरव का जिक्र किया गया। लेकिन उसी दौरान उन्हीं के राज्य गुजरात में एक बिलकिस बानो विलाप कर रही थी!
शरद पवार ने कहा कि प्रधानमंत्री जो कहते हैं, वैसा करते नहीं हैं। बिलकिस मामले में यह सच साबित हुआ।
उसका धर्म कौन-सा?
बिलकिस बानो कौन है? वह मुसलमान है, इस वजह से उसके साथ हुए बलात्कार, जुल्म, उसकी बेटी की हत्या माफ नहीं की जा सकती। बिलकिस की जगह हमारी मां, बहन होती तो? पड़ोसी पाकिस्तान और बांग्लादेश में हमारी हिंदू मां, बहनों पर अत्याचार होता है, उस वक्त हम आक्रोश करते हैं। लेकिन बिलकिस मामले में यह बेचैनी, वह संवेदना कहां गई? इन सभी मामलों के बाद न तो प्रधानमंत्री ने कुछ कहा और न ही हमारे गृहमंत्री ने। ऐसा क्यों? बादशाह जहांगीर ने अपने महल के प्रवेश द्वार पर एक न्याय का घंटा बांधा था। जिसे न्याय चाहिए होगा, ऐसे किसी भी नागरिक द्वारा यह घंटा बजाते ही बादशाह जहांगीर राजमहल के बरामदे में आ जाते थे। नागरिक की शिकायत सुनते और इंसाफ करते थे। एक बार राजधानी में चोरी के मामले काफी बढ़ गए। जहांगीर को प्रतिदिन पांच से पचास बार बाहर आकर चोरी की शिकायतें सुनने के बाद अधिकारियों को आदेश देना पड़ता था। अचानक एक बार घंटे की आवाज सुनाई देनी बंद हो गई। लगातार चार दिन सन्नाटा रहा। उस समय जहांगीर खुश हो गए और कोतवाल को बुलाकर बोले, ‘शाबाश! आपने राजधानी में चोरियों पर पूरी तरह से लगाम लगा दी। चार दिनों से किसी ने न्याय का घंटा नहीं बजाया।’ कोतवाल ने हाथ जोड़कर कहा, ‘गुस्ताखी माफ हो, जहांपनाह! घंटे की चार दिनों से आवाज नहीं आई, क्योंकि चार दिन पहले न्याय का हमारा घंटा ही चोरी हो गया है!’
हमारे देश में भी ठीक ऐसा ही घटित हुआ है क्या? यदि ऐसा नहीं होता तो एक अबला को न्याय दिलाने के लिए शासक आगे आ गए होते। समाज ‘जहांपनाह’ के दरबार में घुस गया होता!
बलात्कार को शाही मान्यता
बलात्कार और हत्या को शाही मान्यता और सामाजिक मान्यता देने की पद्धति घातक है। श्री अधिरंजन चौधरी द्वारा राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का ‘राष्ट्रपत्नी’ के रूप में उल्लेख करते ही स्मृति ईरानी से लेकर समस्त भाजपा को यह नारी शक्ति का अपमान लगा और न्याय के लिए वे सभी जुबानी घंटा बजाते रहे। स्मृति ईरानी का आक्रोश देखने लायक था। फिर बिलकिस मामले में ये सब घंटा ठंडा क्यों? बिलकिस एक स्त्री है। उसने अपनी इज्जत और अपनी बेटी गंवाई है। उस अन्याय के खिलाफ वह अकेले लड़ी। मोदी गुजरात जाते, तो उन्हें इस अत्याचार पीड़ित बहन के घर जाकर उसे सहारा देना चाहिए था। सवाल यहां हिंदू-मुसलमान का नहीं है, बल्कि हिंदुत्व की आत्मा और हमारी महान संस्कृति की गरिमा का है। गुजरात विधानसभा चुनाव में हिंदुओं का वोट मिले, इसके लिए बिलकिस के गुनहगारों को छोड़ दिया गया होगा, तो यह प्रवृत्ति देश के लिए घातक है। फिर देश को आतंकवादियों से खतरा है, ऐसा कहने का अर्थ नहीं है। खतरा तो देश में ही है। धर्म का रूपांतर धर्म कट्टरता और अराजकता में हो रहा है।
वह क्या कह रही है?
ऐसी बिलकिस बानो सभी समाजों में हो सकती हैं। वो कश्मीर घाटी में हैं। महाराष्ट्र में हैं। हर राज्य में हैं। वे हिंदू हैं, मुसलमान हैं, ईसाई हैं। न्याय के लिए उनका आक्रोश शुरू ही है। लेकिन कभी-कभी न्याय के घंटे तक हाथ पहुंचने से पहले ही उसका शरीर शव बन जाता है। उत्तर प्रदेश में ऐसी अनेक घटनाएं घटित हुई हैं। ‘जहांपनाह’ तक उनकी चीखें पहुंची ही नहीं। क्योंकि न्याय का घंटा ही चोरी हो गया! व्याकुल मन से बिलकिस बानो क्या कहती है वह देखो, ‘अब मैं क्या कहूं? दोषियों के बरी होने से न्याय व्यवस्था पर से मेरा विश्वास डगमगा गया है। मैं सन्न हो गई हूं। ऐसी स्थिति में किसी भी महिला को न्याय कैसे मिलेगा? अपने देश की सर्वोच्च न्याय व्यवस्था में मेरा विश्वास था। बिलकिस आगे जो कहती है, वह महत्वपूर्ण। ‘१५ अगस्त को इन ग्यारह दोषियों को मुक्त करने के फैसले का पता चलते ही २० साल पहले मेरे साथ जो हुआ वही आघात एक बार फिर दोहराया गया, ऐसा मैंने महसूस किया। मेरी और मेरे परिवार की जिंदगी तबाह करनेवाले, मेरी तीन साल की बेटी की हत्या करनेवाले ११ दोषी व्यक्ति अब आजाद घूम रहे हैं।’ सुप्रीम कोर्ट ने अब इस मामले में गुजरात सरकार को नोटिस जारी किया है। इस पर दो सप्ताह में सुनवाई होगी, लेकिन आज वो ११ लोग आजाद हैं और समाज खामोश है। क्या इसी को हमारी स्वतंत्रता कहा जाए? उसी आजादी का ‘अमृत महोत्सव’ मनाया गया। इसी स्वतंत्र भारत में सर्वोच्च न्यायालय है। लेकिन न्याय का घंटा चोरी हो गया है!
न्याय का घंटा चोरी होने पर बिलकिस हो या बिमला, तुम्हारे विलाप को पूछता कौन है?

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