मुख्यपृष्ठनए समाचाररोखठोक : विष्णु के तेरहवें अवतार और ईवीएम का शस्त्र!

रोखठोक : विष्णु के तेरहवें अवतार और ईवीएम का शस्त्र!

संजय राऊत -कार्यकारी संपादक

भारतीय लोकतंत्र ‘ईवीएम’ के कारण संकट में आ गया है। समूचे विश्व ने ‘ईवीएम’ को रद्द कर दिया, लेकिन मोदी-शाह ने ईवीएम से गठबंधन किया, जो अटूट है। लोकतंत्र बचाना है तो ‘मतपत्रिका’ पर चुनाव होना चाहिए। श्रीमान मोदी श्रीराम की उंगली पकड़कर राम मंदिर की ओर निकल पड़े हैं। वे विष्णु के तेरहवें अवतार भी हैं। फिर ‘मतपत्रिका’ पर चुनाव कराने में इतना भय क्यों?

अयोध्या में राम मंदिर का भव्य उद्घाटन २२ जनवरी को होगा। देश की दृष्टि से यह आनंद का समारोह है। प्रधानमंत्री मोदी इस आनंद समारोह के केंद्र बिंदु रहेंगे और उस समारोह के बाद भाजपा जल्द ही लोकसभा चुनाव की दिशा में कदम बढ़ाएगी। श्रीराम के धर्म समारोह में सराबोर वातावरण में ही लोगों से मतदान करा लिया जाए, ऐसा विचार भाजपा के प्रमुख नेताओं ने किया होगा तो उसमें गलत कुछ भी नहीं है। मोदी और शाह सभी फैसले ‘समय’ और ‘मुहूर्त’ देखकर लेते हैं। ३० अप्रैल के बाद का समय भाजपा के दो प्रमुख नेताओं के लिए शुभ नहीं, ऐसा एक अच्छे ज्योतिषी ने टीवी पर आकर कहा है। ऐसे में लोकसभा चुनाव ३० अप्रैल से पहले समाप्त करके अच्छा मुहूर्त साधा जाए, ऐसा हो सकता है। लेकिन तब भी ३० अप्रैल के बाद के अशुभ काल को वे कैसे टालेंगे? वक्त को थाम लेने की विद्या और ललाट पर लिखे भाग्य-अभाग्य को बदलने का तंत्र किसी के भी पास नहीं है। जितना हो गया, उतना पर्याप्त है। देश एक बार भाजपा मुक्त हो जाए, इस भूमिका में जनता है।
मंदिर समारोह की साजिश
राम मंदिर समारोह के बाद देश का सामना लोकसभा चुनाव से होगा, इसीलिए मंदिर समारोह की साजिश रची गई है। इस पूरे समारोह में ‘फोकस’ केवल प्रधानमंत्री मोदी पर रहेगा, ऐसी योजना है। राम का सहारा और ‘ईवीएम’ की मदद इन दो पैरों पर भाजपा के यश का संतुलन खड़ा है। विकास के नाम पर शोर है। समाज का कोई भी वर्ग सुखी नहीं है। यह अस्वस्थ समाज भाजपा को मतदान नहीं करता, फिर भी भाजपा जीतती है। उसके लिए लोकसभा चुनाव से पहले ईवीएम के नतीजे निकालो। २०२४ के चुनाव भी ‘ईवीएम’ पर कराए गए तो मोदी ४०० से ज्यादा सीटें जीत जाएंगे, ऐसा सैम पित्रोदा जैसे विशेषज्ञ का कहना है। पित्रोदा राजनीतिज्ञ नहीं हैं। राजीव गांधी के समय में जो ‘टेलिकम्युनिकेशन’ क्रांति हुई, उसके सूत्रधार पित्रोदा थे। इसलिए उनकी बात में अर्थ है। मध्य प्रदेश विधानसभा के नतीजे जिस तरह से सामने आए, उसे देखकर देश के मतदाताओं का इस चुनाव प्रणाली पर से विश्वास उठ गया। शिवराज सिंह चौहान किसी भी परिस्थिति में मुख्यमंत्री पद पर दावा न कर पाएं, ऐसी पद्धति से मध्य प्रदेश के नतीजे निकाले गए। भाजपा को मध्य प्रदेश में १६३ सीटें मिलना संभव ही नहीं था। यह चमत्कार ‘ईवीएम’ के कारण हुआ, ये अब सभी कह रहे हैं। ये सब बिल्कुल सहजता से किया जाता है। लोकसभा और विधानसभा में ३० से ३५ फीसदी निर्वाचन क्षेत्रों के ‘ईवीएम’ की हैकिंग की जाती है। ईवीएम सोर्स कोड (Source Code) का स्वतंत्र ऑडिटिंग हुआ तो मशीन के घोटाले का खुलासा हो जाएगा। ईवीएम हैकिंग करके भाजपा विगत कुछ वर्षों से जीत रही है। उन्हें जीतने पर और मोदी के चमत्कार पर, दैवीय शक्ति पर इतना विश्वास है तो मतपत्रिका पर चुनाव कराना चाहिए। भाजपा ये कभी नहीं करेगी।
सब ‘हैक’ होता है
दूरसंचार क्षेत्र में काम करनेवाले एक विशेषज्ञ मुझसे मिले। उन्होंने कहा, ‘‘एक ओटीपी के कारण किसी का पूरा बैंक खाता हैक हो सकता है। पृथ्वी से रिमोट के जरिए चंद्रयान, मंगलयान को नियंत्रित किया जा सकता है तो फिर ईवीएम किस खेत की मूली है?’’ भारत में ईवीएम से चुनाव कराना एक धोखा है। मतपत्रिका पर ही चुनाव कराना चाहिए। जब तक ईवीएम है, तब तक भाजपा है। ईवीएम पर विश्वास नहीं किया जा सकता, ऐसा सैम पित्रोदा क्यों कहते हैं, ये समझ लें।
ईवीएम पूरी तरह से टेक्निक और टेक्नोक्रैट्स की गिरफ्त में है और टेक्नोक्रैट्स ऐसे सरकार की गिरफ्त में है, जिसका लोकतंत्र पर भरोसा नहीं। लोकतंत्र पर कब्जा करने के लिए ही ईवीएम का इस्तेमाल किया जा रहा है। ईवीएम को अपने तरीके से नियंत्रित करना संभव है।
भारत में फिलहाल इस्तेमाल होनेवाला ईवीएम पूरी तरह से ‘निर्दोष’ नहीं है, (stand alone) ये साबित हो चुका है।
ईवीएम मशीन के साथ जब वीवीपैट मशीन को जोड़ा जाए तो मूल समस्या और बढ़ जाती है। वीवीपैट एक अलग ‘डिवाइस’ है, जिसमें हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर का समावेश होता है।
वीवीपैट को ईवीएम से जोड़ने के लिए एक स्पेशल कनेक्टर का उपयोग किया जाता है, जिसे एसएलयू कहते हैं। इस एसएलयू में ही घोटाला करने की क्षमता है।
एसएलयू कनेक्टर ही वीवीपैट को सूचना देता है कि किस बटन से भाजपा को वोट मिला, किस बटन से कांग्रेस को और किस बटन से अन्य दलों को वोट मिले। मतदान से पहले यह ‘प्रोग्राम’ मशीन में डाला जाता है।
एसएलयू को जोड़ने के बाद ईवीएम केवल मतदान तक ही सीमित (stand alone) मशीन नहीं रह जाती। उससे अन्य कई काम कराए जाते हैं, जिस पर वर्तमान में संदेह और चर्चा हो रही है।
वीवीपैट मशीन से जो कागज बाहर निकलता है, वो फिलहाल थर्मल प्रिंटर से निकलता है। वह चार-पांच दिन ही सुरक्षित रहता है। उसके ऊपर की स्याही उड़ जाती है। उसकी जगह ऐसे प्रिंटर का इस्तेमाल होना जरूरी है, जिससे निकला हुआ कागज कम से कम दो-चार महीने टिका रहे। वीवीपैट रसीद पर हमने किसे मतदान किया, वह दिखता है।
ईवीएम घोटाला होता ही है, यह पक्का विश्वास है इसीलिए भाजपा ईवीएम हटाने के लिए तैयार नहीं।
सैम पित्रोदा का कहना है कि वीवीपैट की ईवीएम से बाहर आनेवाली रसीद मतदाता के हाथ में दी जाए। उस रसीद को मतदाता दूसरे स्वतंत्र ‘बाक्स’ में मतपत्रिका जैसे डालते हैं, वैसे डालें। यह बॉक्स किसी भी इलेट्रॉनिक डिवाइस से जुड़ा हुआ न हो। उसके बाद बॉक्स में मौजूद शत-प्रतिशत ‘रसीद’ की गणना की जाए।
भारत ही नहीं, विश्व के सभी दूरसंचार विशेषज्ञ मानते हैं कि ‘ईवीएम’ में वास्तव में समस्या है। घोटाला कैसे किया जाता है, यह दिखाने के बावजूद चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट इसे मानने को तैयार नहीं। इस मामले में उनकी भूमिका स्वच्छ नहीं है।
ईवीएम एक समस्या है और दुनिया के सभी लोकतांत्रिक देशों ने ‘ईवीएम’ प्रणाली को रद्द कर दिया। फिर भारत में ही ईवीएम का हठ क्यों? मोदी के नेतृत्व में अयोध्या में राम मंदिर तैयार हुआ। राम की उंगली पकड़कर मोदी अयोध्या के मंदिर की ओर चल पड़े हैं, ऐसे पोस्टर्स हर जगह लग गए। जिनमें श्रीराम को सहारा देने का बल है और जिन्हें विष्णु का तेरहवां अवतार कहा जाता है, वे ‘बैलेट पेपर’ यानी मतपत्रिका से क्यों घबरा रहे हैं? ‘ईवीएम’ कांड करने का एक तंत्र है। पहले ओपिनियन पोल के माध्यम से जीत का ढोल पीटा जाता है और हर राज्य में जहां ‘कांटे की टक्कर’ है, ऐसे निर्वाचन क्षेत्रों में आपराधिक प्रवृत्ति का सहारा लेकर वोट हासिल किए जाते हैं। जबकि तेलंगाना, कर्नाटक को छोड़ दिया जाता है, यह खेल है।
‘ईवीएम’ कहीं नहीं
दुनिया के विकसित, आधुनिक और विज्ञानवादी देशों में ईवीएम पर प्रतिबंध है। अमेरिका और इजरायल में भी ‘बैलेट पेपर’ पर विश्वास किया जाता है। इंग्लैंड और  फ्रांस जैसे देशों ने ‘ईवीएम’ का उपयोग कभी किया ही नहीं। अमेरिका, नीदरलैंड, जर्मनी, इटली जैसे देशों ने ‘ईवीएम’ का उपयोग किया, लेकिन बाद में उसे बंद कर दिया। ईवीएम में सिक्योरिटी और एक्युरेसी (सुरक्षा और अचूकता) नहीं है, यही उसका कारण है। ‘ईवीएम’ नहीं होगा तो भाजपा नगरपालिका का चुनाव भी नहीं जीत पाएगी। ईवीएम मतलब ही भाजपा, मोदी और शाह है। लोकतंत्र को बचाना है तो भाजपाविरोधी दलों को ईवीएम के विरोध में एक साथ आना होगा। भारत के लोकतंत्र की हत्यारी ईवीएम है और ईवीएम देश में तानाशाही का बीज बो रही है। लोकतंत्र और देशभक्ति की परवाह करनेवाले नागरिकों को विशेष रूप से युवाओं को सड़कों और सोशल मीडिया पर इस समस्या को लेकर आंदोलन शुरू करना होगा। ‘ईवीएम’ पर चुनाव हो रहे होंगे तो चुनावों का ही बहिष्कार करने की घोषणा करके भारत की तानाशाही की ओर दुनिया का ध्यान आकर्षित कराना होगा। ‘ईवीएम की हेराफेरी में देश उलझ गया है। उस हेराफेरी में इन लोगों ने श्रीराम को भी उलझा दिया है। धार्मिक उन्माद का वातावरण निर्माण कर वे चुनाव लड़ेंंगे। इस बार चार सौ सीटें जीतेंगे, ऐसा वे आज कह रहे हैं, क्योंकि ईवीएम उनके हाथ में है। जो विरोधी चुनकर आएंगे, उन्हें निलंबित करना और खाली संसद में भाषण देना।
विष्णु के तेरहवें अवतार का ये कार्य है!

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