मुख्यपृष्ठसंपादकीयरोखठोकरोखठोख : यही असली भूकंप है!

रोखठोख : यही असली भूकंप है!

संजय राऊत – कार्यकारी संपादक 

एकनाथ शिंदे मुख्यमंत्री बने व उनके मंत्रिमंडल में देवेंद्र फडणवीस को उपमुख्यमंत्री का पद स्वीकार करना पड़ा यही असली भूकंप है! श्री फडणवीस फिर आए लेकिन वे इस तरह से ‘आधे’ आएंगे, ऐसा किसी को नहीं लगा था! अब राज्य में क्या होगा?

उद्धव ठाकरे द्वारा मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा दिए जाने के कारण महाराष्ट्र में एक पर्व समाप्त हो गया। कुल मिलाकर ढाई वर्षों का ही यह कालखंड था, परंतु बुधवार की रात मुख्यमंत्री पद व विधायक के पद से इस्तीफा देकर वे मुक्त हो गए। पांच वर्ष के लिए स्थापित हुई महाविकास आघाड़ी की सरकार ढाई वर्षों में गिर गई, ऐसा कांग्रेस अथवा राष्ट्रवादी कांग्रेस के कारण नहीं हुआ। उद्धव ठाकरे ने इस्तीफा देते समय कहा, ‘मेरे ही लोगों ने धोखा दिया।’ चालीस विधायकों में से कुछ ने पहले शिवसेना के राज्यसभा के उम्मीदवार को गिराया और इसी समूह ने भारतीय जनता पार्टी के पांचवें उम्मीदवार को विधान परिषद के लिए जिताया। दगाबाजी के ये बीज बोए जाने के दौरान मुख्यमंत्री इन्हीं लोगों पर परिवार के घटक के रूप में विश्वास कर रहे थे। एक महानाटक में छत्रपति शिवराय के मुख से निकला एक ज्वलंत वाक्य है। छत्रपति कहते हैं, ‘शत्रु की फौज कभी मत गिनो। अपना फितूर कितना है ये गिनो!’
कुल कितने विधायक?
श्री एकनाथ शिंदे के साथ कितने विधायक हैं ये छोड़ दें, लेकिन ये सभी विधायक उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में शिवसेना के उम्मीदवार के रूप में विजयी हुए और उन्होंने ही उद्धव ठाकरे के खिलाफ बगावत की। दलबदल विरोधी कानून के तहत उनके विधायक का पद जा सकता है लेकिन महाराष्ट्र के राज्यपाल और सर्वोच्च न्यायालय ने दल बदलनेवालों को बल प्रदान किया। यदि किसी को पार्टी बदलनी होगी तो उसे जनता की नजरों के सामने बदलना चाहिए। उसमें जनता को मुंह दिखाने का सामथ्र्य होना चाहिए। हमारे लोकतंत्र को उसी समय बल मिलेगा जब दल बदलनेवाला इस्तीफा देकर पुन: जनता के बीच जाएगा। ऐसा नहीं करनेवाले को कानूनी तौर पर निष्कासित करना चाहिए और दलबदल विरोधी कानून का सम्मान रखना चाहिए, परंतु महाराष्ट्र में अलग कराया गया। दल बदलने की वजह से अयोग्य ठहराए जाने की आशंका वाले विधायकों ने महाराष्ट्र का राजनीतिक भविष्य तय किया और राज्यपाल महोदय ने इस संविधान से परे कृत्य के ‘पेड़े’ खाए!
किसका हिंदुत्व!
श्री दीपक केसरकर शिंदे गुट के प्रवक्ता हैं। उनमें अचानक हिंदुत्व और भाजपा के प्रति आत्मीयता उमड़ आई। ये समझने जैसी बात है। लेकिन केसरकर जिस सावंतवाड़ी निर्वाचन क्षेत्र से २०१९ में निर्वाचित हुए थे, वहां भाजपा के साथ युति होने के बावजूद केसरकर के खिलाफ राजन तेली नामक बागी को भाजपा ने खड़ा किया था और उसके प्रचार के लिए गोवा के मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत खुद आए। २०१९ के चुनाव में शिवसेना के ३० उम्मीदवार भाजपा समर्थित बागियों की वजह से पराजित हो गए। शिवसेना के विधायकों की संख्या कम हो और मुख्यमंत्री पद पर शिवसेना का दावा कमजोर हो इसके लिए यह खेल किया गया। शिंदे गुट में आज शामिल करीब १७ विधायकों को भाजपा ने आज सीधे गिराने का प्रयास किया यह सत्य है। दूसरा महत्वपूर्ण मुद्दा मतलब ४० विधायकों ने निश्चित तौर पर किस वजह से पार्टी छोड़ी? उन्होंने व उनके प्रवक्ता ने लगातार अलग-अलग कारण बताए।
१) मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे शिवसेना के विधायकों से नहीं मिलते हैं। कांग्रेस-राष्ट्रवादी लोगों के काम होते हैं। इन वजहों से पार्टी छोड़ी, ऐसा कहना गलत है। अजीत पवार अपने विधायकों के काम करते हैं, उसी तरह एकनाथ शिंदे भी करें इसलिए मुख्यमंत्री ठाकरे ने नगरविकास, समृद्धि महामार्ग जैसे मलाईदार विभाग शिंदे को दिए। यह पार्टी का वक्त था। उसे बिगाड़ा किसने?
२) शिवसेना विधायकों को निधि नहीं दी, ऐसा एक और कारण बताया गया। इसका करारा जवाब जयंत पाटील ने दिया। पाटील ने शिवसेना के बागियों के निर्वाचन क्षेत्र में निधि वितरण की सूची ही सार्वजनिक कर दी। कई प्रमुख बागियों के निर्वाचन क्षेत्र में डेढ़ सौ से ढाई सौ करोड़ तक की निधि दी गई। शिवसेना-भाजपा की सरकार रहने के दौरान शिवसेना के निर्वाचन क्षेत्रों में सिर्फ ६ फीसदी तो भाजपा के निर्वाचन क्षेत्रों में ९०-९५ फीसदी निधि जाती थी, ऐसा श्री पाटील कहते हैं, जो कि सत्य ही है।
३) श्री दीपक केसरकर कहते हैं, महाराष्ट्र में जो हुआ उसके लिए संजय राऊत जिम्मेदार हैं? शिवसेना का मुख्यमंत्री महाराष्ट्र में बना ये कोई अपराध है क्या?
४) कम-से-कम १६ विधायक ‘ईडी’ व अन्य निजी वजहों से भाग गए। इसलिए महाविकास आघाड़ी की सरकार अब अप्राकृतिक है, ऐसा जो कहते हैं उनकी आनेवाली सरकार उससे भी ज्यादा अप्राकृतिक होगी।
नई सरकार आई?
महाराष्ट्र में भूकंप आया और ऐसा भूकंप राजनीति में कभी आया ही नहीं था, ऐसा वर्णन एकनाथ शिंदे की बगावत को लेकर किया गया, लेकिन उस बगावत से बड़ा भूकंप ९ दिनों में हुआ। शिंदे की बगावत के पीछे चाणक्य कहकर संपूर्ण मीडिया देवेंद्र फडणवीस को श्रेय दे रहा था। लेकिन सत्य अलग ही था। ये बगावत सीधे दिल्ली के सूत्रों द्वारा कराई गई और महाराष्ट्र की भाजपा इस बारे में पूरी तरह से अंधेरे में थी। एकनाथ शिंदे उपमुख्यमंत्री और देवेंद्र फडणवीस मुख्यमंत्री बनेंगे, ऐसा जो कह रहे थे वे बाद में धराशायी हो गए। एकनाथ शिंदे मुख्यमंत्री बने और देवेंद्र फडणवीस ने शिंदे के हाथों को बल दिया। फडणवीस के लिए यह झटका है। महाराष्ट्र भाजपा का एकतरफा नेतृत्व शिंदे के हाथ में था। लेकिन अमित शाह से फडणवीस के संबंध अच्छे नहीं हैं। ‘मुझे उपमुख्यमंत्री का पद नहीं चाहिए। चंद्रकांत पाटील को वह दो। मुझे भाजपा का प्रदेशाध्यक्ष बनाओ’, उनका ऐसा निवेदन आखिरी क्षणों में ठुकरा दिया गया। किसी समय अपने ही जूनियर मंत्री रहे श्री शिंदे के मातहत काम करने की नौबत फडणवीस पर आई। यह उनके कर्मों का फल है। २०१९ में सत्ता का ५०-५० का फॉर्मूला उन्होंने ठुकरा दिया और महाविकास आघाड़ी की सरकार इसी वजह से निर्माण हुई। श्री उद्धव ठाकरे ढाई साल मुख्यमंत्री बने और अब बागी शिवसैनिक शिंदे को यह पद भाजपा हाईकमान ने दिया है। काल द्वारा फडणवीस से लिया गया यह बदला है।
महाराष्ट्र की राजनीति में अब आदर्श नहीं रहा है। उसकी खिचड़ी बन गई है। फिलहाल नया राज आया है। इसे जिसने लाया है, वे सुखी रहें। उद्धव ठाकरे ने मुख्यमंत्री का पद छोड़ा, परंतु राज्य के लोग उनके सत्ता त्यागने से दहल उठे।
ठाकरे ने यही कमाया है। शिंदे ने मुख्यमंत्री पद पाया। इस सबसे श्री फडणवीस के जीवन में भूकंप आया!

अन्य समाचार