मुख्यपृष्ठसंपादकीयरोखठोकरोखठोक : मुंबई में गुजराती कब आए? वैभव किसने बढ़ाया?

रोखठोक : मुंबई में गुजराती कब आए? वैभव किसने बढ़ाया?

  • संजय राऊत – कार्यकारी संपादक

राज्यपाल श्री कोश्यारी ने मुंबई के बारे में एक बयान दिया। गुजराती-राजस्थानी नहीं रहेंगे तो मुंबई आर्थिक राजधानी नहीं रहेगी, ऐसा उन्होंने कहा। राज्य में आक्रोश भड़कने के बाद राज्यपाल ने माफी मांगी लेकिन सवाल कायम है! मुंबई और गुजराती बंधुओं का रिश्ता क्या है? गुजराती मुंबई में कब आए?

राज्यपाल कोश्यारी ने आखिरकार महाराष्ट्र की जनता से माफी मांग ली है। छत्रपति शिवाजी महाराज और महाराष्ट्र के बारे में गलत बयान देने के कारण पंडित नेहरू और मोरारजी देसाई को भी माफी मांगनी पड़ी थी। नेहरू और मोरारजी देसाई ने इतिहास के गलत संदर्भों का आधार लेते हुए बयान दिया था। इस वजह से महाराष्ट्र में गुस्से की आग भड़क उठी थी। नेहरू जैसे लोकप्रिय नेता को भी महाराष्ट्र से माफी मांगनी पड़ी थी। महाराष्ट्र के स्वाभिमान से किसी ने खेल किया तो मराठी माणुस भड़क उठता है। यह इतिहास है। श्री कोश्यारी ने अपने एक भाषण में क्या कहा? ‘गुजराती और मारवाड़ी लोग मुंबई में हैं इसलिए मुंबई को आर्थिक राजधानी का दर्जा प्राप्त है। गुजराती-मारवाड़ी लोगों को बाहर निकाला गया तो मुंबई में पैसा नहीं बचेगा।’ राज्यपाल का यह बयान बिना उद्देश्य के कैसे  हो सकता है? मुंबई के गुजराती-मारवाड़ी समाज के लोगों को भी श्री कोश्यारी का यह बयान पसंद नहीं आया और उन्होंने राज्यपाल के भाषण की निंदा की। अधीर रंजन चौधरी द्वारा राष्ट्रपति का उल्लेख ‘राष्ट्रपत्नी’ के तौर पर करते ही जो गुस्से से लाल हो गए थे, उन्होंने महाराष्ट्र और शिवराय के अपमान के बारे में विरोध भी नहीं जताया। यह भी महाराष्ट्र का अपमान ही है।
अधिकार किसका?
महाराष्ट्र और विशेषकर मुंबई में गुजराती समाज पहले से है। लेकिन मुंबई पर अधिकार और वर्चस्व मराठी माणुस का ही रहेगा। मुंबई में मराठी लोगों का ‘प्रतिशत’ कम हो गया है। मुंबई की आर्थिक बागडोर मराठी लोगों के पास नहीं है, फिर भी इस मुंबई को मराठी लोगों ने ही बनाया है, ऐसा इतिहास कहता है। मुंबई पर मराठियों का राज कभी नहीं था, ऐसा कहने का बार-बार प्रयास हुआ। मुंबई पर कभी मराठियों ने राज नहीं किया। हालांकि गुजरात ने किया है, ऐसा संदर्भ आज भी कई लोग देते रहते हैं। यह सत्य नहीं है। सत्य और इतिहास ऐसा है कि मुंबई पर इतिहासकाल में राज करनेवाले गुजराती यानी मुसलमान सुल्तान थे। लेकिन उनका कर्तव्य ऐसा था कि फिरंगियों के सतत हमले से परेशान होकर उन्होंने मुंबई फिरंगियों को दे डाली! सन् १५३४ में बहादुरशाह बेगदा ने यह करार किया! दूसरे की संपत्ति तीसरे को देकर खुद की जान बचाने की दलाली इस बेगदा ने की। मराठी शासकों ने फिरंगियों के साथ युद्ध में अपनी जान दे दी। तभी शत्रु मुंबई को ले पाए। मुंबई के लिए मराठी और मराठे अपना खून बहा देते हैं, यह इतिहास है। श्री कोश्यारी जैसे महान व्यक्ति को इसे समझ लेना चाहिए। मुंबई में मराठी माणुस सतत श्रम करता रहा और संकटों से लड़ता रहा। बाकी जो लोग आए वे लक्ष्मी दर्शन के लिए।
अंग्रेजों ने नींव रखी
मुंबई में विकास की नींव किसने रखी और आज जो मुंबई का ‘आर्थिक महत्व’ है, वह किसके कारण निर्माण हुआ? गुजराती समाज का उसमें कितना योगदान है? यह नई पीढ़ी को समझ लेना चाहिए। पुराने समय के अध्ययनशील पत्रकार पू.रा. बेहरे ने इस बारे में बहुमूल्य जानकारी अपनी पुस्तक में दी है। यह पुस्तक भी अब दुर्लभ हो गई है। वर्ष १६६८ में मुंबई ईस्ट इंडिया वंâपनी के कब्जे में आ गई। सर जॉर्ज ऑक्जेंडन इस वंâपनी के मुंबई के पहले गवर्नर हुए। मुंबई को नाविक और व्यापारिक वेंâद्र बनाने का निश्चय इसी गवर्नर ने किया। लेकिन दूसरे वर्ष ऑक्जेंडन की मृत्यु हो गई। उनकी जगह जिराल्ड एंजिअर मुंबई का गवर्नर बना। ऑक्जेंडन की संकल्पना को साकार करने के लिए एंंजिअर ने कड़ी मेहनत की। आधुनिक मुंबई के व्यापारिक वैभव की नींव इसी अंग्रेज अधिकारी ने रखी। उस पर दूसरा कोई भी दावा नहीं कर सकता। विदेशी नहीं, गुजराती नहीं, राजस्थानी नहीं, दक्षिण का नहीं, पंजाबी नहीं। मराठों ने भी कभी यह दावा नहीं किया। एंजिअर सूरत का भी गवर्नर था। वर्ष १६७२ में वह मुंबई में आकर बस गया। उसने पहले यहां अंग्रेजी कानून लागू किया और मुंबई शहर की नींव रखी। उसने मुंबई में टकसाल की शुरुआत की, प्रिंटिंग प्रेस की स्थापना, हॉस्पिटल बनाया, ग्राम पंचायत का निर्माण किया। बाहर के लोगों ने मुंबई में आकर बसने की शुरुआत कर दी। सूरत के गुजराती बनियों को मुंबई में आकर रहने का आमंत्रण एंजअर ने ही दिया था।
गुजराती कब आए?
मुंबई में गुजराती लोग वर्ष १६६९ से रहने आए। वे किन परिस्थितियों में यहां आए इसका लिखित सबूत उपलब्ध है। ‘इंग्लिश रिकॉर्ड ऑन शिवाजी’ इस पुस्तक में २६ नवंबर, १६६९ का एक पत्र प्रकाशित हुआ है। वह पत्र यानी- उन दिनों (सन् १६६९) सूरत के गुजराती बनियों का धार्मिक कारणों से मुसलमान शासक भयंकर उत्पीड़न करते थे। हमारे मंदिर भ्रष्ट न हों और हमारे परिवार का धर्म परिवर्तन न हो इसलिए ये लोग मुसलमानों को बड़ी-बड़ी निधि देते थे। फिर भी उनका उत्पीड़न कम नहीं हो रहा था इसलिए उन्होंने देश त्याग करने का निश्चय किया। सूरत के पुराने रईस तुलसीदास पारख की प्रतिमा को भी मुस्लिमों ने मलीन किया। इस घटना से तुलसीदास का हृदय द्रवित हो गया। अपने घर की आबरू चली गई ऐसा उन्हें लगा। अपनी जाति पर संकट आया है, यह समझकर बनियों ने सूरत छोड़ने का निश्चय किया। लेकिन गुजरात से भागने से पहले इन बनियों के पांच प्रतिनिधि भीमजी पारख के नेतृत्व में जिराल्ड एंजिअर से आकर मिले। अपने ऊपर आए संकट की जानकारी दी। सूरत से हम भागकर आएं तो मुंबई द्वीप में हमें सुरक्षा मिले, ऐसी विनती की। एंंजिअर से उन्होंने सुरक्षा मांगी। ये लोग आए तो मुंबई का वैभव बढ़ाने में मदद मिलेगी। इसकी पहचान उसने कर ली। लेकिन उसे यह भी लगा कि मौजूदा स्थिति में उन्हें सुरक्षा देना खतरनाक साबित हो सकता है। मुंबई की ही सुरक्षा की पूरी तैयारी नहीं है, ऐसे में मुस्लिम बादशाह का क्रोध अपनी ओर खींचने का कोई मतलब नहीं है। आप अमदाबाद के ‘शाह’ से मिलें और अपनी बात रखें। फिर स्थिति देखकर धीरे-धीरे अपनी संपत्ति और पत्नी-बच्चों को मुंबई लाएं। ऐसा उसने इस गुजराती प्रतिनिधियों को समझाया। यह सलाह मानकर ये लोग सूरत गए और अगले कुछ दिनों में आठ हजार बनिए अपनी पत्नी-बच्चों को लेकर सूरत से निकले और मुंबई पहुंचे। सूरत के महाजन यानी बनिया लोगों ने मुंबई आने से पहले एंजिअर से कुछ आश्वासन और अधिकार मांगे। एंजिअर ने वंâपनी की तरफ से उनकी मांगों को स्वीकार करने का आश्वासन इन महाजनों को दिया। इन लोगों को एंजिअर ने व्यापार और अन्य मिलाकर दस रियायतें दीं और ये सहूलियतें मिलने के बाद हीr वे मुंबई में आए। पहले जान बचाने के लिए और बाद में व्यापार में भाग्य आजमाने के लिए गुजराती समाज ने मुंबई में आश्रय लिया और वे यहां रह गए। महाराष्ट्र के वे घटक बन गए।
नाना शंकरशेठ किसके?
कई पारसी और मराठी लोगों ने मुंबई का वैभव बढ़ाया। जगन्नाथ उर्फ  नाना शंकरशेठ का मुंबई की शान में अद्वितीय महत्व है। वे स्वयं बड़े धनाढ्य थे। उन्होंने अपनी उपलब्धियों से संपत्ति अर्जित की और मुंबई का वैभव बढ़ाने के लिए खर्च किया। मुंबई का विकास और असंख्य जनहित का कार्य करने के लिए नाना शंकरशेठ अपनी संपत्ति प्रवाहित करते रहे। मुंबई का वैभव बढ़ाने में और एक नाम भाऊ दाजी लाड का भी है। मराठी अमीर लोग कभी व्यापारिक प्रवृत्ति से पेश नहीं आए। अपनी मुंबई के लिए उन्होंने अपना सर्वस्व अर्पित किया। गुजराती, पारसी, मराठी का त्रिवेणी संगम मुंबई में महत्वपूर्ण साबित होता है। मुंबई में आए गुजराती समाज जिस तरह से दूध में शक्कर मिल जाती है उसी तरह घुल गए। मुंबई की अर्थव्यवस्था वे चलाते हैं, यह सही है। लेकिन इससे श्रमिकों का महत्व कम नहीं होता। गुजरात और महाराष्ट्र पहले एक ही राज्य थे। अब वे जुड़वां भाई बन गए हैं। फिर बेवजह दूध में नमक क्यों डाला जाए? गुजराती और मारवाड़ी लोगों ने मुंबई में आकर कारोबार किया और पैसा कमाया, टाटा से लेकर अंबानी तक सभी का मुंबई में आवास है यह भी गौरव की निशानी है। बड़ौदा का विकास सयाजीराव गायकवाड ने किया। इंदौर पर होलकर और ग्वालियर पर सिंधिया का वर्चस्व है। अगर मुंबई की अर्थव्यवस्था गुजराती-राजस्थानी लोगों के हाथ में है तो उसमें बुरा क्यों लगे? मुंबई का सिनेजगत तब भी और आज भी पंजाबी लोगों के नियंत्रण में है। लेकिन लता मंगेशकर तेजी से चमक रही थीं। महाराष्ट्र के भूगोल पर मुंबई है और मुंबई पर मराठी लोगों का पहला अधिकार है। पैसे से वह कमजोर हो सकता है और अब तो मराठी लोगों के पैसा कमाने की बात करें तो अपराध साबित होता है। मराठी लोगों के शक्कर कारखाने, कपड़ा मिलें और अन्य उद्योगों को ‘ईडी’ ने ताले लगा दिए और मराठी उद्यमियों के पीछे जांच लगा दी। राज्यपाल महोदय, कभी इस पर भी बोलिए। पैसा मिले उस मार्ग से मिलने का अवसर आज एक ही प्रांत और समुदाय को मिल रहा है। लिहाजा, मुंबई का ही नहीं, बल्कि अन्य प्रांतों की भी अर्थव्यवस्था बिगड़ गई!
राज्यपाल कोश्यारी ने अब महाराष्ट्र से माफी मांग ली है। इसलिए इस मुद्दे पर पर्दा गिर गया है, फिर भी मुंबई के खिलाफ साजिश जारी रहेगी। उसे हमेशा के लिए रोका जाना चाहिए!

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